Thursday, June 11, 2026
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वंशवाद की राजनीति पर विरोधाभास

Samvad


nirmala Raniदेश में किसी भी राजनैतिक दल का कोई भी नेता वंशवाद या परिवारवाद को लेकर सार्वजनिक चर्चा करे या न करे परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस विषय पर प्राय: मुखरित होकर बोलते रहते हैं। पहले तो उनके द्वारा चिन्हित परिवारवाद का अर्थ नेहरू गांधी परिवार ही हुआ करता था, परंतु जैसे-जैसे अनेक क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने यह महसूस करना शुरू किया कि उनकी व उनके दल की अपनी क्षेत्रीय राजनीतिक अस्मिता यहां तक कि उसकी पहचान तक के लिये भाजपा बड़ा खतरा हो सकती है और उन्होंने भाजपा के साथ चलने के बजाये आत्म निर्भर होना शुरू किया, तब ही से उन क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को भी परिवारवादी व वंशवादी कहकर संबोधित किया जाने लगा। परंतु सवाल यह है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठने के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनेकानेक बार राजनीति में परिवारवादी व वंशवादी व्यवस्था पर प्रहार करते रहते हों तो निश्चित रूप से इस विषय पर चिंतन-मंथन किया जाना जरूरी है कि वास्तव में प्रधानमंत्री का वंशवाद विरोधी विलाप कितना सही है?

पिछले दिनों गुजरात व हिमाचल प्रदेश विधान सभा और दिल्ली नगर निगम सहित देश के कई राज्यों में लोकसभा व विधानसभा के उपचुनाव संपन्न हुए। इनमें केवल गुजरात विधानसभा में रिकार्ड जीत हासिल करने व रामपुर विधान सभा के अतिरिक्त लगभग सभी चुनाव-उपचुनाव भाजपा हार गई। हिमाचल प्रदेश में जहां भाजपा से कांग्रेस ने सत्ता छीन ली वहीं दिल्ली नगर निगम जहां लगभग 15 वर्षों से भाजपा सत्ता में थी, उसे आम आदमी पार्टी के हाथों बुरी तरह पराजित होना पड़ा। अब सवाल यह है कि हिमाचल में भाजपा राज्य की सत्ता से बाहर हुई।

उस राज्य से जहां के जे पी नड्डा पार्टी के सबसे बड़े यानी अध्यक्ष पद पर आसीन हैं, ने तो दिल्ली में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गुजरात परिणामों से उत्साहित होकर यहां तक कह दिया कि वंशवाद, परिवारवाद,अकर्मण्य नेता व गैर जिम्मेदारना विपक्ष के कारण गुजरात में कांग्रेस की ये हालत हुई है। परंतु उन्होंने अपने गृह राज्य में अपनी पार्टी की दुर्दशा का कारण नहीं बताया। इसी तरह राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का है। तो क्या प्रधान मंत्री के कथनानुसार हिमाचल के लोगों ने भी वंशवाद के खिलाफ वोट दिया?

चुनाव परिणामों के अतिरिक्त भी प्रधानमंत्री के वंशवाद का विरोध महज एक विलाप ही समझ आता है, क्योंकि गत दिनों हरियाणा में आदमपुर विधानसभा सीट से भाजपा ने कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए नेता स्व भजन लाल के पौत्र और कुलदीप विश्नोई के पुत्र भव्य विश्नोई को उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया। उपचुनाव में मिली जीत के फौरन बाद ही उन्हें विधानसभा में लेखा समिति का सदस्य बनाया गया है। चंद दिनों पूर्व कुलदीप बिश्नोई, उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई और सुपुत्र विधायक भव्य विश्नोई तीनों को ही भाजपा की हरियाणा राज्य कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया गया।

भजन लाल परिवार के यही सदस्य जब कांग्रेस में रहकर या अपनी पार्टी बनाकर राजनीति करें तो वही वंशवादी राजनीति का प्रतीक और जब उन्हें भाजपा रेवड़ियां बांटे तो यह वंशवाद के विरुद्ध जनता के गुस्से का परिणाम? आखिर यह कैसा तर्क है? पूरी भाजपा वंशवाद के कुल दीपकों से भरी पड़ी है। जिस तरह अमित शाह के सुपुत्र जय शाह को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया उसी तरह पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महा आर्यमन सिंधिया को मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन सदस्य बनाकर उनकी भविष्य की तरक़्की की बुनियाद डाली गई। यह अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि इसलिए सत्ता द्वारा संरक्षण प्राप्त हैं, क्योंकि यह सभी वंशवादी राजनीति के ही कुलदीपक हैं।

कांग्रेस पार्टी के ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे अनेक नेता जो कांग्रेस में रहकर अपनी खानदानी राजनीति का चिराग रौशन किया करते थे वे अपनी उसी वंशवादी व परिवारवादी योग्यता के आधार पर सिर्फ इसलिए भाजपा में ऊंचा मुकाम हासिल करते हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री देश को कांग्रेस मुक्त करने का आह्वान करते रहते हैं। इसलिए कांग्रेस के किसी भी वंशवादी से उनका कोई बैर नहीं बशर्ते कि वह कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो। फिर चाहे वह मेनका गांधी और उनके पुत्र वरुण गांधी ही क्यों न हों। रहा सवाल प्रधानमंत्री के अनुसार चुनाव परिणामों को वंशवाद के साथ साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता के गुस्सा दर्शान का परिणाम बताना तो यह बात भी न्यायसंगत इसलिए प्रतीत नहीं होती, क्योंकि गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान ही भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सुबूत मोरबी झूला पुल हादसे के रूप में सामने आया।

जनमत तो भ्रष्टाचार विरोधी तब जरूर माना जाता जब मोरबी और उसके आसपास की सीटें भाजपा हार जाती परंतु आश्चर्यजनक तरीके से वह वहां भी सारी सीटें जीत गई। इसलिए इन चुनाव परिणामों को वंशवाद या परिवारवाद की राजनीति पर अथवा भ्रष्टाचार पर प्रहार कहना कतई मुनासिब नहीं है। गुजरात चुनाव नरेंद्र मोदी की उसी छवि का परिणाम है जो उन्होंने गुजरात में अर्जित की है। अब मीडिया के माध्यम से वे अपनी उस विशेष छवि से छुटकारा पाने के लिए भले ही परिवार और वंशवाद की बात करते रहें परंतु उनके यह तर्क ही अपने आप में काफी विरोधाभास भी पैदा करते हैं।


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