- नहीं चेते तो और भी अधिक गहरा सकता है संकट, घटते जलस्तर के बीच
- भारत में मिस मैनेजमेंट के कारण आने वाले समय में पैदा होगा और भी पानी का गंभीर संकट
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जल संरक्षण के लिए वर्ष में कोई एक या दो दिन नहीं, बल्कि वर्षभर हर समय हर व्यक्ति को इस भावना के साथ चिंतन करने की जरूरत है कि पानी आज की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन के लिए बहुत बड़ी जरूरत है। पानी के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ऐसा नहीं कि भारत में पीने के पानी की बहुत बड़ी किल्लत है। बल्कि यूं कहना ज्यादा उचित होगा कि भारत में मिस मैनेजमेंट के कारण आने वाले समय में पानी का गंभीर संकट पैदा होने वाला है। अब भी समय है, अगर हम चेत जाएं और अपने अपने दायित्वों की पूर्ति करें तो आने वाली पीढ़ी को उनकी जरूरत के लिए पीने का पानी उपलब्ध करा सकते हैं।
यह कहना है इंजीनियर बीडी शर्मा का, जो 38 वर्ष उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में अपनी सेवा दे चुके हैं। इसके बाद 10 वर्ष तक चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर स्थित सर छोटू राम इंस्टीट्यूट आॅफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी मेरठ में सहायक प्रोफेसर के रूप में शिक्षण कार्य का अनुभव प्राप्त कर चुके हैं। वर्तमान में वे इंडियन वाटर रिसोर्सेज सोसायटी मेरठ सेंटर के कन्वीनर हैं।
जल संरक्षण और वर्षा जल पुनर्भरण (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) इनके जीवन का लक्ष्य है। अब तक 165 सरकारी और निजी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करा चुके हैं। जिनमें औघड़नाथ मंदिर, कमिश्नर कार्यालय, कमिश्नर आवास, डीएम आवास, पीएसी बटालियन, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के अलावा विभिन्न संस्थाएं शामिल हैं। इंजीनियर बीडी शर्मा का कहना है वर्तमान में जो पानी हमारे पास मौजूद है

उसके प्रति गंभीर होने की आवश्यकता है हम देर कर चुके हैं, लेकिन अभी इतनी देर नहीं हुई है कि स्थिति को संभाला न जा सके। इंजीनियर बीडी शर्मा का कहना है कि उत्तर प्रदेश में दो लाख 75 हजार सरकारी भवन हैं, जहां रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लागू किए जाने की योजना वर्ष 2002 से चल रही है, लेकिन अभी तक केवल 60 हजार भवन ही 21 वर्षों में इस योजना से जुड़े जा सके हैं।
इसे साफ है कि पानी की दिन प्रतिदिन होने वाली किल्लत को लेकर कोई गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। एक आदेश भवनों के निर्माण को लेकर भी है, जिसमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बिना भवन का नक्शा पास ही नहीं हो सकता, लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं हो पाता। अन्य विकल्पों की बात बहुत बाद की है, पहले हम बरसात के पानी को संरक्षण देकर वापस जमीन को लौटाने की दिशा में कदम उठाएं,
तो इसका बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। उन्होंने 165 स्थानों पर लगाए गए प्रोजेक्ट प्रोजेक्ट की वर्तमान स्थिति के बारे में बताया कि जहां प्रतिवर्ष एक मीटर तक जलस्तर नीचे जाने की रिपोर्ट रही है। वहीं रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगने के बाद जलस्तर के गिरने में बहुत कमी आई है। अगर इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाए तो निश्चित रूप से जल स्तर के गिरने का सिलसिला काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
उनका कहना है कि पृथ्वी गृह को अंतरिक्ष से देखने पर 70 प्रतिशत भाग नीला और 30 प्रतिशत भाग भूरा दिखाई देता है। नीला रंग जल और भूरा रंग भूमि क्षेत्र को दर्शाते हैं। पृथ्वी पर मौजूद 97 प्रतिशत पानी खारे समुन्द्री जल के रूप में है। जबकि दो प्रतिशत धुर्वों पर जमी बर्फ के रूप में और एक प्रतिशत वाष्प, पृथ्वी पर सतही व भूगर्भीय जल के रूप में उपलब्ध है।

इस एक प्रतिशत जल की मात्रा से ही पृथ्वी पर निवास कर रही करीब सात अरब जनसंख्या, पशु-पक्षी और वनस्पति की पूर्ति होती है। इसके अलावा वर्षा जल एक अनमोल प्राकृतिक उपहार है जो लगभग पूरी पृथ्वी को बिना किसी भेदभाव के पूरा करता है।
परंतु पक्का प्रबंधन के अभाव में वर्षा जल स्थिति में बहता हुआ नदी, नालों से हुआ समुद्र के खारे पानी में मिलकर खारा बन जाता है। इसलिए वर्तमान जल संकट को दूर करने के लिए वर्षाजल संचयन ही एकमात्र विकल्प है। यदि वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था हो तो जल संकट से जूझते शहर अपनी शिकायतों के लिए जल संग्रहण पा सकेंगे।

