Saturday, March 21, 2026
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बैंड उद्योग गुजर रहा मुश्किल दौर से

चाइना निर्मित उत्पाद ने मेरठ के प्रसिद्ध उद्योग के लिए खड़ी कर दी दिक्कतें, कभी कोरोना का पड़ता रहा असर

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: क्रांतिधरा की जली कोठी क्षेत्र में किसी समय एशिया की सबसे बड़ी वाद्य यंत्रों की मार्केट पर कभी चाइना निर्मित उत्पाद तो कभी कोरोना का असर पड़ता रहा है। इसका परिणाम है कि समूची दुनिया को अपने वाद्य यंत्रों से निकलने वाली सुरीली धुनों के उपकरण बनाने वाले कारीगरों के जीवन में अब पहले जैसे सुर-ताल नहीं रह गए हैं।

दुर्गा पूजा, मोहर्रम तक में बजते हैं वाद्य यंत्र

तुरही, यूफोनियम, बिगुल, कॉर्नेट, बैगपाइप, ट्रॉम्बोन और शहनाई समेत सभी वाद्ययंत्र मेरठ में बनाए जाते हैं। शादियों में बारात के आगे बजाए जाने वाले इन साजों का निर्माण जली कोठी बाजार और इसके आसपास की संकरी गलियों में कुटीर उद्योग की तरह लगाई गई फैक्ट्रियों में होता है। शहीद स्मारक के सामने नादिर अली बिल्डिंग के बराबर से एक सड़क जली कोठी होते हुए छतरी वाला पीर चौराहे तक जाती है।

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लगभग हर समय जाम से जूझने वाली इसी जली कोठी सड़क के दोनों ओर बैंड बाजे का व्यापार करने वाली दुकानें बरबस ही सबाक ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। दुकानों में सजाए गए सभी तरह के साज और ड्रम यहां बनते हैं। इनका प्रयोग शादी विवाह के साथ-साथ दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, क्रिसमस समेत विभिन्न खुशी के अवसरों के इतर मोहर्रम में ढोल ताशे के रूप में किया जाता है।

इमाम बख्श ने 1885 में बनाया ब्रास बैंड

सियालकोट के रहने वाले इमाम बख्श सेना के बैंड में मास्टर थे, रिटायरमेंट के बाद उन्होंने मेरठ में ही रहकर अपना एक बैंड बनाया। जिसके लिए पेरिस की कंपनी की एजेंसी भी ली। इसके बाद उन्होंने बैंड के लिए जरूरी वाद्य यंत्र बनाने का काम मेरठ में ही शुरू किया। उन्हीं की बनाई हुई इस कंपनी को बाद में उनके पुत्र नादिर अली और इशहाक अहमद ने आगे बढ़ाया।

जिनसे चलता हुआ यह सिलसिला आफताब अहमद और वर्तमान में फाइज आफताब के हाथों में पहुंच चुका है। कंपनी का कारोबार किसी समय कई मुल्कों तक फैला हुआ था, लेकिन वर्तमान में मेरठ से देश के विभिन्न कोनों में जरूर ब्रास बैंड और संबंधित वाद्य यंत्र भेजे जाते हैं। इस सिलसिले में नादिर अली कंपनी के प्रबंधक एकके बनर्जी बताते हैं कि विदेश में लो पिच पर काम करने वाले वाद्य यंत्रों की मांग ज्यादा है।

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जिनको तैयार करने में अधिक परिश्रम की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत भारत में हाई पिच पर काम करने वाले वाद्य यंत्रों को पसंद किया जाता है। बदलते समय के साथ कंपनी के पास अब लो पिच पर वाद्य यंत्र तैयार करने वाली टीम का भी अभाव हो चला है।

कारोबार पर लॉकडाउन का सीधा असर

नादिर अली कंपनी के प्रबंधक एके बनर्जी बताते हैं कि एक दशक पहले कुछ राज्यों से वाद्य यंत्रों की डिमांड कुछ कम हुई। जिसका पता लगाया गया, तो जानकारी मिली कि चाइना ने बहुत अच्छी पॉलिश और फिनिशिंग के साथ अपना माल भारतीय मार्केट में उतार दिया है। जो हिंदुस्तानी वाद्य यंत्रों के मुकाबले थोड़ा सस्ता भी मिला है। हालांकि यह स्थिति ज्यादा लंबे समय नहीं चली।

कुछ महीने बाद ही देश के विभिन्न राज्य में काम करने वाले व्यापारियों ने सीधा संपर्क किया और अपने आॅर्डर देने शुरू किए। कारण पूछने पर व्यापारियों ने बताया चाइनीस ब्रास बैंड की क्वालिटी बहुत हल्की होती है। इनकी लाइफ भी नहीं है, इसके अलावा रीसेल वैल्यू कुछ भी नहीं रह जाती है। इसके विपरीत मेरठ में बनने वाले ब्रास बैंड कम से कम दो दशक तक बेहतर काम करते रहते हैं।

प्लास्टिक स्किन के काम पर आई बहार

वाद्य यंत्र निर्माता व विक्रेता व्यापार एसोसिएशन के सचिव हाजी रहमतुल्ला का कहना है कि किसी समय मेरठ में ब्रास बैंड क्षेत्र में एशिया की सबसे बड़ी मार्केट हुआ करती थी। यहां बनाए हुए वाद्य यंत्र जर्मनी, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, स्वीडन समेत विभिन्न देशों में निर्यात किए जाते थे। लेकिन पिछले दो दशक के दौरान इसमें बहुत उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। पहले जो कंपनियां यूके पेरिस इंग्लैंड जैसे देशों में काम करती थी, उन्होंने लेबर सस्ती होने के कारण चाइना को अपना बाजार बना लिया।

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अब मेड इन चाइना के नाम से कई देशों के कंपनियों का बैंड बाजे का सामान भारत समेत विभिन्न देशों में भेजा जा रहा है। जिसका सीधा असर मेरठ की ब्रास बैंड मार्केट पर पड़ा है। हाजी रहमतुल्ला बताते हैं कि किसी समय यहां 100 से अधिक थोड़ी बड़ी इकाइयां स्थापित थी। लेकिन आज इनकी संख्या आधे से भी कम रह गई है। वहीं फैक्ट्री में काम करने वाले कार्यक्रमों की संख्या में भी भारी गिरावट आई है।

फैक्ट्री में काम करने के तौर तरीकों में भी बदलाव आया है। पहले जहां श्रमिक बिहार पर काम करते थे, वहीं अब अधिकतर काम ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता है। मेरठ के इस कारोबार में प्लास्टिक स्क्रीन का काम काफी उछाल पर है। जिसके कारण वाद्य यंत्रों का यह काम गिरते गिरते संभालने की स्थिति में आ रहा है।

घटती चली गई कारीगरों की मजदूरी

मेरठ के ब्रास बैंड उद्योग से जुड़े अनेक कारीगरों की कई पीढ़ियों ने अपने हाथों से इस हुनर को संवारा है। ज्यादातर कारीगर जली कोठी क्षेत्र में ही संकरी गलियों में अपने परिवारों के साथ रहकर जीवन यापन कर रहे हैं। सलीम बताते हैं कि उनके वालिद दोस्त मोहम्मद और बेटे समीर ने भी इसी काम को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया है। वहीं उनके भाई नईम और अन्य परिजन भी ब्रास बैंड के कारीगर हैं। वहीं शाहरूख का कहना है कि उनके वालिद शफीकुददीन और भाई भी इसी काम में लगे हैं।

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नदीम और उमरदीन भी 15 साल से ब्रास बैंड के काम में लगे हुए हैं। इन सभी का कहना है कि मौजूदा दौर में सब काम ठेकेदारी प्रथा से होने लगे हैं। जितना काम करेंगे, उतनी मजदूरी उन्हें मिल जाती है। इन सभी को प्रतिदिन 400-600 रुपयेके बीच मजदूरी मिल पाती है। जिसमें रोजाना की जरूरतें भले ही पूरी हो जाती हों, लेकिन किसी सुख-दुख की घड़ी में उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। इनको संतोष है, तो बस इस बात का, कि मजदूरी के लिए कहीं दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता। दिन भर काम करने के बाद वे अपने परिवार के साथ समय गुजार लेते हैं।

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