Sunday, April 5, 2026
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अय्याशी और क्रूरता की देवी थी क्लियोपेट्रा

एपी भारती |

एक समय ’वीनस‘ देवी की प्रतिमूर्ति मानी गई क्लियोपेट्रा के बारे में तमाम तरह के किस्से हैं। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में सहमति नहीं है। इसके बावजूद एक राय पर सब सहमत हैं कि 2000 वर्षों पूर्व यह महिला बड़ी क्रूर और अय्याश थी। इसने दो देशों पर अप्रत्यक्ष रूप से शासन किया।

माना जाता है कि उसका जन्म 79 ईसा पूर्व यूनान में हुआ था। उसके पिता सिकंदर के सेनानायक टालेमी के वंशज थे। ऐश्वर्य के बीच पली बढ़ी क्लियोपेट्रा बहुत सुंदर और स्वस्थ थी। यूनानी, मिस्री एवं कई भाषाएं उसने सीख ली थी। बचपन से वह खुले विचारों की थी। माना जाता है कि 12 वर्ष की आयु पूरी करते-करते वह अपना कौमार्य गंवा चुकी थी।

अठारह वर्ष की उम्र में उसका विवाह टालेमी-11 से हुआ। युवराज टालेमी और क्लियोपेट्रा के विचारों में जमीन-आसमान का अंतर था। टालेमी उसकी अय्याशियों से परेशान था। नतीजा चार वर्ष तक दोनों नाम मात्रा के पति-पत्नी थे और एक दिन टालेमी मरा पाया गया। जनता ने मन ही मन हत्या की दोषी क्लियोपेट्रा को माना।

उसके बाद उसकी शादी सम्राट टालेमी-14 से हुई। वह पहले से ही क्लियोपेट्रा के हुस्न का दीवाना था। उसे पाकर तो टालेमी-14 ने अपना सबकुछ क्लियोपेट्रा को सौंप दिया। एक समय वह आया जब टालेमी-14 अपने मनोरंजन गृह का होकर रह गया और राजपाट क्लियोपेट्रा के हुक्म से चलने लगा।

यह सब कुछ मिस्र में हो रहा था। अब क्लियोपेट्रा नग्न नृत्य समारोहों का आयोजन कर रही थी। अय्याशी में उसने सारी हदें तोड़ दी। वह भरे दरबार में किसी भी दरबारी को बाहों में भर लेती। फिर वह उसे अपने शयन कक्ष में ले जाती। उसकी दासियों को अर्ध नग्न रहना पड़ता।

जब वह शहर में घूमने निकलती तो आगे रास्ते के दोनों तरफ जल्लाद हाथों में कोड़े लेकर चलते। क्लियोपेट्रा के रथ के आगे और पीछे अर्धनग्न दासियां और पारदर्शी पोशाक में खुले रथ पर सवार क्लियोपेट्रा होती। जल्लाद रास्तों के किनारे महारानी के दशनार्थ खड़े लोगों पर कोड़े बरसाते चलते। यौवन का प्रदर्शन देखने को लोग कोड़े खाकर भी डटे रहते।

मिस्र में यौवन का सार्वजनिक प्रदर्शन, वह भी रानी के द्वारा पहली बार हो रहा था। यह आश्चर्य था। जब-जब क्लियोपेट्रा ने काहिरा या अन्य किसी मिस्री शहर में यौवन की खुली नुमाइश की, लोग गालियांे और मार की चिंता किये बगैर एक दूसरे को धकियाते, एक दूसरे पर गिरते पड़ते क्लियोपेट्रा के काफिले के इर्द-गिर्द रहे।

जब देशभक्त और संस्कृति प्रेमी लोगों ने बार-बार यह बेहूदा प्रदर्शन और उस पर मनचलों का व्यवहार देखा तो वे आग बबूला हो गये। वे महारानी के विरूद्ध आवाज उठाने लगे। फलस्वरूप क्लियोपेट्रा के विरोधियों और समर्थकों में खूनी संघर्ष छिड़ गया। विरोधी भारी पड़े। क्लियोपेट्रा समर्थक दरबारी भी विद्रोहियों के हाथों मौत के घाट उतारे गये। क्लियोपेट्रा ने भयंकर दमन किया परंतु विरोध उत्तरोत्तर बढ़ता गया। हारकर क्लियोपेट्रा को रातों-रात चोरी से मिस्र छोड़ना पड़ा। वह रोम पहुंची और इटली के राजा जूलियस सीजर से मिलने का प्रयास किया। देशभक्त इतालवी कर्मचारी इस कुख्यात सुंदरी का परिचय पाकर दंग रह गये।

कहीं इटली का हाल भी मिस्र जैसा न हो जाए, यही सोचकर उन्होंने क्लियोपेट्रा को सम्राट से न मिलने दिया। तब ऐसा माना जाता है कि एक कालीन विक्रेता को उसने पटाया। वह एक कालीन में घुस गई। जब कालीनों का बंडल विक्रेता ने रोम के दरबार में खोला तो उसमें से क्लियोपेट्रा निकल खड़ी हो गई। इस पर विक्रेता ने हैरत का नाटक किया।

उसके रूप-यौवन से सम्राट सीजर और दरबारियों की आंखें चुंधिया गईं। क्लियोपेट्रा ने झुककर निवेदन किया, ’’मैं मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा सम्राट के समक्ष शरणार्थी के रूप में उपस्थित हूं। आपके कर्मचारियों ने मुझे मिलने न दिया, इसलिए मुझे यहां तक आने का यह रास्ता चुनना पड़ा।

उसे शरण ही नहीं, राजमहल में विशेष स्थान मिला। 56 वर्षीय सीजर उस पर मर मिटा। उसने शादी का प्रस्ताव रखा तो क्लियोपेट्रा ने शर्त रखी कि बेटा पैदा हुआ तो राजगद्दी का वारिस वही बनेगा। सीजर ने प्रस्ताव स्वीकार किया।

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