- गांव में अपनी कलाकारी दिखा रहे लोग
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: 15 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू हो रहे हैं और बाजारों में नवरात्रों की चहल-पहल शुरू हो गई है। जहां शहरों की दुकानों में सांझी मां की मूर्तियां बननी शुरू हो गई है। वहीं, गांव की औरतें अपनी कलाकारी से सांझी तैयार कर रही है। गांव की बात करें तो गांव में औरतें चिकनी मिट्टी से सांझी तैयार करती है
और साथ में सितारे, मां के सिंगार का सामान, बैंडबाजा, छोटे-छोटे भाई-बहन आदि बनाकर खूबसूरत रंगों के साथ मां की प्रतिमा तैयार करती है। वहीं, अगर शहरों की बात की जाए तो आजकल मशीनों द्वारा सांझी तैयार की जाती है और मशीनों से ही उन पर रंग किए जाते हैं और ही फ्रेम में सांझी के सभी सामान को बनाया जाता है।
सांझी मां की मूर्ति इको फ्रेंडली
जनवाणी ने मेरठ के अजंता मूर्ति केंद्र से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचने के लिए सांझी मां की मूर्तियों को इको फ्रेंडली बनाया गया है और लोगों ने पहले ही मां की मूर्तियों को एडवांस बुक कर लिया है। उन्होंने बताया कि छोटी मूर्तियां सैकड़ों की तादाद में तैयार की गई है और बड़ी मूर्तियां केवल उतनी ही तैयार होती है। जितनी बुकिंग आती है उन्होंने बताया कि 100 रुपये से लेकर 25000 तक की मूर्तियां तैयार की गई।
…लेकिन शहरों में हो गई लुप्त
सभी ने शारदीय नवरात्रों के दौरान सांझी मां का आरता री आरता मेरी सांझी माई आरता गीत तो जरुर सुना होगा गांव में इस गीत का काफी प्रचलन है, लेकिन शहरों में यह परंपरा लुप्त होती जा रही है। अब सब कुछ आधुनिक होता जा रहा है। जहां पहले मिट्टी नहीं गोबर की सांझी पूजी जाती थी। वहीं, अब कांच के टुकड़ों से सजी गोबर की सांझी मिट्टी की खूबसूरत प्रतिमा में ढल गई है। सौहार्द, एकता और त्योहारी उल्लास की प्रतीक सांझी अब रस्म निभाने तक शेष रह गई है।

गांव की बात करें तो गांव में पूरे नौ दिन तक सांझी माता के रूप में पूजा का सिलसिला बड़ी जोर शोर से चलता रहता है। हर दिन महिलाएं वह कन्याएं सांझी के सामने एकत्रित होकर आरता री आरता मेरी सांझी माई आरता गीत गाती है और भोग लगती है। पूरे नौ दिन तक यही क्रम चलता रहता है और नौवें दिन कन्याएं सांझी पूजन के लिए मोहल्ले के घरों में जाकर सांझी का पूजन कर गीत गाती है
और नेक के तौर पर उन्हें पैसे मिलते हैं और वहीं अगर शहरों की बात की जाए तो वहां इस त्योहार का कोई बोल बाला नहीं है। कम लोग ही वहां सांझी रखते हैं और रखते भी है तो उनकी स्थापना घर के मंदिर में ही करते हैं और साधारण तौर पर मां दुर्गा, काली की आरती गाकर पूजन करते हैं।
गांव में सब मिलते, गाते हैं गीत
सांझी केवल मान्यता या पूजन नहीं है बल्कि गांव के लोगों के लिए आपस में मिलने, गीत गाने, बतियाने का माध्यम है नवरात्री से पहले अमावस्या को हर घर के बाहर दीवार की सफाई होती है और दीवार लीपकर चूल्हे की पीली मिट्टी या गोबर से सांझी बनाते हैं उन्हें चूड़ी, कांच, बिंदी, सितारे, रोली, गेरू, फूल, पत्ते से सजाते हैं और सभी आपस में एक दूसरे के घर सांझी को देखने जाते है नौ दिन सुबह शाम सांझी की पूजा कर गांव की औरतें लड़कियां मिलकर गीत गाती है पूरे नौ दिन गांव में इस त्योहार से शोभा बनी रहती है।

