Saturday, March 14, 2026
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मोबाइल फोन का बच्चों पर प्रभाव

BALWANI


अमृता |

पहले समय के हमारे बचपन के वे दिन कितने सुहाने हुआ करते थे। जब मोबाइल, स्मार्टफोन, और कंप्यूटर जैसी गैजेट का हमारे दिनचर्या पर नियंत्रण नहीं था! मोबाइल का बच्चों पर प्रभाव दूर -दूर तक नहीं था! स्कूल के बाद दोस्तों के साथ मिलकर खेलना, कहानियों की किताबें पढ़ना आदि यह सब कितना वास्तविक था। लेकिन आज के आधुनिक समय में आप अपने बच्चों को एक मोबाइल फोन दे दीजिए वो अपनी जिंदगी इन्हीं में बना लेते हैं।

मोबाइल फोन विज्ञान के अन्य चमत्कारों में से एक है। इसका अविष्कार इंसानों द्वारा की गई सबसे उपयोगी और हानिकारक चीजों में से एक है। मोबाइल फोन ने न सिर्फ दूर बैठे लोगों को संचार के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ा है, बल्कि टेक्नोलॉजी की इस दुनिया में इंसानों के लिए और भी कई ऐसे रास्ते खोल दिए हैं, जिससे लोगों की जिंदगी आसान हो गई है। मोबाइलफोन का अविष्कार 3 अप्रैल 1973 को मार्टिन कूपर ने किया था। सन् 1983 में यह सिर्फ अमेरिका के बाजार में उपलब्ध था। भारत में पहली मोबाइल सर्विस 1995 में शुरू की गई थी। जैसा कि हम सब जानते है, मोबाइल जितना ही हमारे लिए लाभदायक है, उतना ही हानिकारक भी है! वैसे तो स्मार्टफोन की उपयोगिता पर बहस नहीं की जा सकती है, मोबाइल फोन धीरे-धीरे हमारे जीवन का खास हिस्सा बन चुका हैं । कुछ मामलों में तो ये बेहद जरूरी भी है, क्यों कि अगर आप आॅफिस में है या आप अपने बच्चें से दूर हैं, तो एक यही सबसे सही तरीका है, उनसे संपर्क करने का। आज इनका उपयोग रोजमर्रा के कार्यों के प्रबंधन के लिए किया जाता है जैसे – मीटिंग शेड्यूल, दस्तावेज भेजना और प्राप्त करना, प्रस्तुतिकरण, अलार्म आदि देना!

पहले समय के हमारे बचपन के वे दिन कितने सुहाने हुआ करते थे। जब मोबाइल, स्मार्टफोन, और कंप्यूटर जैसी गैजेट का हमारे दिनचर्या पर नियंत्रण नहीं था! मोबाइल का बच्चों पर प्रभाव दूर-दूर तक नहीं था! स्कूल के बाद दोस्तों के साथ मिलकर खेलना, कहानियों की किताबें पढ़ना आदि यह सब कितना वास्तविक था। लेकिन आज के आधुनिक समय में आप अपने बच्चों को एक मोबाइल फोन दे दिजीए वो अपनी जिंदगी इन्हीं में बना लेते हैं। और यही मोबाइल के बहुत ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों में सबसे ज्यादा मानसिक बीमारियों की समस्या देखने को मिल रही है। जब बच्चे मोबाइल को अपने आंखों के बहुत पास रखकर देखते हैं तो आंखों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे उनकी आंखें भी कमजोर हो जाती हैं तथा भूख कम लगना, चिड़चिड़ापन, नींद कम आना, गुस्सा आना आदि विकार भी उत्पन्न होते है!

वर्ल्ड हेल्थ आॅर्गनाइजेशन ने जून 2018 में आॅनलाइन गेमिंग को एक मानसिक स्वास्थ विकार? घोषित किया था! डब्लूएचओ ने इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन आॅफ डिजीज के ताजा अपडेट में यह भी कहा कि गेमिंग और बच्चों में मोबाइल की लत कोकीन और जुए जैसे चीजों की लत जैसी हो सकती है! अन्य विख्यात अस्पतालों द्वारा की गई स्टडी में यह बात सामने आई है कि करीब 50 प्रतिशत भारतीय बच्चें जो मोबाइल के बिना नहीं रह पाते हैं, वे रीढ़ की हड्डी की समस्या से पीड़ित हैं। हमारे देश में तकरीबन 96 प्रतिशत बच्चे ऐसे घरों में रह रहे हैं, जहां स्मार्टफोन/मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा है। 15-16 साल के 65 प्रतिशत बच्चों ने और 11-12 साल के 28 प्रतिशत बच्चों ने आॅनलाइन पोर्न देखा है तथा अश्लील तस्वीरों के माध्यम से ही उनको सेक्स की जानकारी मिली।

जिस उम्र में हमारे बच्चों को जीवन की अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहना चाहिए ,वे बच्चे अपना ज्यादा समय मोबाइल पर बिताते हैं, जिससे कि बच्चों में लाइफस्टाइल डिस आॅर्डर हो जा रहा है। हर अभिभावक को हिदायती तौर पर यह चेतावनी दी जा रही है कि वे अपने तीन साल तक के बच्चों को टीवी तथा मोबाइल से दूर रखें। मोबाइल का बच्चों पर प्रभाव न पड़े, इसके लिए कोशिश करें कि जितना अधिक हो, अपने बच्चे के साथ वक्त बिताएं, ताकि उसे मोबाइल पर समय न बिताना पड़े। साथ ही बच्चों को प्रकृति वातावरण में जाकर गेम खेलने के लिए प्रेरित करें। इसके अलावा बच्चों को उनकी हाॉबी के हिसाब से डांस, पेंटिंग, म्यूजिक आदि में इन्वाल्व करें!

अत: सभी अभिभावकों को अपने बच्चों को समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि, मोबाइल के फायदे और नुकसान दोनों है। इसलिए आवश्यकता अनुसार ही इसका इस्तेमाल करना लाभकारी हो सकता है।


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