
लोकसभा चुनाव आने वाले हैं। इससे कुछ महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल पुरानी चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को सूचना के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक करार दिया और हुए तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने आदेश के बाद अब चुनावी बांड जारी करने वाला बैंक, यानी भारतीय स्टेट बैंक, चुनावी बांड प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों का विवरण और अन्य जानकारी चुनाव आयोग (ईसीआई) को सौंपगा। चुनाव आयोग इसे 13 मार्च तक आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा। सबसे पहले तो हम यह समझते हैं कि चुनावी यानी इलेक्टोरल बॉन्ड क्या है। 2017 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम पेश की थी। 2 जनवरी 2018 को केंद्र सरकार ने इसे नोटिफाई किया। इलेक्टोरल बॉन्ड एक तरह का प्रोमिसरी नोट होता है, जिसे बैंक नोट भी कहते हैं। इसे कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है। ये बॉन्ड एक हजार, 10 हजार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ के गुणक में उपलब्ध था। कोई भी भारतीय बैंक को केवायसी डीटेल देकर भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से इन्हें खरीद सकता था। बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान गुप्त रहती थी। इसे खरीदने वाले व्यक्ति को टैक्स में छूट भी मिलती थी। किसी व्यक्ति या कंपनी की तरफ से खरीदे जाने वाले चुनावी बांड की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी। इसे खरीदने वाला इस बॉन्ड को अपनी पसंद की अधिकृत पार्टी, उसे पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट मिला होना चाहिए, को डोनेट कर सकता था। राजनीतिक दलों को इन्हें एक निर्धारित समय के भीतर भुनाना होता था। ये बॉन्ड जारी करने के बाद 15 दिन तक वैध रहते हैं।
2017 में अरुण जेटली ने इसे पेश करते वक्त दावा किया था कि इससे राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाली फंडिंग और चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी। काले धन पर अंकुश लगेगा। दूसरी ओर इसका विरोध करने वालों का कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान जाहिर नहीं की जाती है, इससे ये चुनावों में काले धन के इस्तेमाल का जरिया बन सकते हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि इस स्कीम को बड़े कॉपोर्रेट घरानों को ध्यान में रखकर लाया गया है। इससे ये घराने बिना पहचान उजागर हुए जितनी मर्जी उतना चंदा राजनीतिक पार्टियों को दे सकते हैं। इसका फायदा ज्यादातर सत्तारूढ़ पार्टियों ने उठाया। 2017 से 2022 तक इलेक्टोरल बॉन्ड से बीजेपी को 5271.97 करोड़ रुपए मिले। कांग्रेस को इस दौरान इलेक्टोरल बॉन्ड से सिर्फ 952.29 करोड़ रुपए मिले। तृणमूल कांग्रेस को 767.88 करोड़ तो एनसीपी को 63.75 करोड़ रुपए मिले। एडीआर के मुताबिक जो दल पिछले 5 साल से विपक्ष में है, उसे 1 प्रतिशत से भी कम का चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिला।
दिलचस्प बात है कि चुनावी साल 2019 में बीजेपी को रिकॉर्ड 2555 करोड़ रुपए का चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड से मिला। इस साल कांग्रेस को 317 करोड़ रुपए ही मिल पाए। एसबीआई और ईडी के पास चंदा देने वालों की सारी जानकारियां हैं और दोनों ही सरकार के अधीन है। दूसरी पार्टी को जो भी लोग चंदा दे रहे हैं, उसके घर पर ईडी पहुंच जा रही है। दानकर्ता डर के कारण अन्य दलों को चंदा नहीं दे रहे हैं। सरकार होने का फायदा सीधे तौर पर बीजेपी को हो रहा है। इसके विरोध में सबसे बड़ा तर्क दिया गया कि इलेक्टोरल बॉन्ड में पारदर्शिता नहीं होने की वजह से कॉरपोरेट सेक्टर ज्यादा हावी होंगे। नीति बनाने में आम नागरिकों की बजाय चंदा देने वालों को ज्यादा तरजीह मिलेगी। जो पैसा देगा, सरकार भी उसी के लिए काम करेगी, फिर आम नागरिकों का क्या होगा? अगर यह प्रक्रिया पारदर्शी होती है, तो कॉरपोरेट सेक्टर का दबदबा कम होगा।
इलेक्टोरल बॉन्ड पर रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने भी चिंता जाहिर की थी। बैंक का कहना था कि इससे कालाधन पर रोक नहीं लगेगी। बैंक ने इसे डीमैट प्रारूप में जारी करने की सिफारिश की। बैंक का कहना था कि भौतिक रूप में इसे रखने से शेल कंपनियां गलत इस्तेमाल कर सकती हैं। आरबीआई ने सरकार के उस फैसले पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने का अधिकार एसबीआई के पास है। आरबीआई का कहना था कि मुद्रा का मुद्दा हमारे एकाधिकार क्षेत्र में था, जिसे संशोधित कर आरबीआई की शक्ति को कमजोर किया गया। 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर सभी चुनाव आयुक्तों की एक बैठक हुई थी।
बैठक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोति ने सवाल उठाए थे और इलेक्टोरल बॉन्ड को अपारदर्शी बताया था। चुनाव आयोग के अनुसार चुनावी बांड व्यक्तिगत उम्मीदवारों और नए राजनीतिक दलों के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। ऐसे में इन लोगों को बड़े स्तर पर चंदा कैसे मिलेगा? इसके अलावा यह विरोधाभास है कि इस योजना को लेकर चार याचिकाएं दाखिल की गई थीं। 2017 में ही कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन सुनवाई 2019 में शुरू हुई। 12 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया कि वे 30 मई, 2019 तक में एक लिफाफे में चुनावी बॉन्ड से जुड़ी सभी जानकारी चुनाव आयोग को दें। हालांकि, कोर्ट ने इस योजना पर रोक नहीं लगाई। बाद में दिसंबर, 2019 में याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने इस योजना पर रोक लगाने के लिए एक आवेदन दिया। इसमें मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया कि किस तरह चुनावी बॉन्ड योजना पर चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक की चिंताओं को केंद्र सरकार ने दरकिनार किया था।


