Saturday, March 14, 2026
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आंकड़ों के भ्रमजाल की मजबूरी

Samvad 52


SATENDRA RANJANआज यह आम समझ है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की रोजी-रोटी के मुद्दों पर कोई ठोस प्रगति किए भी राजनीतिक बहुमत जुटाने में सक्षम बनी हुई है। ऐसा करने में वह सियासी नैरेटिव पर पूरा कंट्रोल कर लेने की वजह से कामयाब हुई है। कई समीक्षक इसे इस रूप में भी कहते हैं कि मौजूदा दौर में भाजपा ने राजनीति और आर्थिकी को अलग कर दिया है। यानी उसकी राजनीतिक सेहत पर सामान्यत: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों की माली हालत कैसी है। बड़ी संख्या में लोग, जो इस सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं का शिकार बने हैं, वे भी मतदान के दिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपना भरोसा जताते दिखते हैं। यह मानना तार्किक नहीं होगा कि नैरेटिव पर यह कंट्रोल भाजपा सरकार ने सिर्फ मीडिया को डरा कर हासिल किया है। बल्कि उसकी इस सफलता का संबंध भी उसकी आर्थिक प्राथमिकताओं से ही है। नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों ने अर्थव्यवस्था पर गिने-चुने कारोबारी घरानों का एकाधिकार कायम करने का मार्ग प्रशस्त किया है। चूंकि मेनस्ट्रीम मीडिया पर ज्यादातर इन्हीं घरानों का स्वामित्व है, इसलिए स्वाभाविक है कि वे संस्थान दिन-रात मोदी सरकार का गुणगान करते हैं। वे और अन्य कारोबारी घराने भाजपा को बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधन भी मुहैया कराते हैं, जिससे उसने सोशल मीडिया पर भी अपना दबदबा बना रखा है।

बहरहाल, यह भी भाजपा के शक्तिशाली बने रहने की कहानी का सिर्फ एक पक्ष है। इसका दूसरा, और कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि भाजपा आज पिछले तीन दशकों में प्रचलित रहे लगभग सभी प्रमुख विमर्शों का प्रतिनिधित्व कर रही है। अपनी ‘मंदिर’ की विशेष राजनीति के साथ उसने ‘मार्केट’ और ‘मंडल’ की परिघटनाओं को भी काफी हद तक खुद में समाहित कर लिया है। चूंकि पिछले तीन- साढ़े तीन दशकों में इन तीनों विमर्शों का देश के जन मानस पर इतना वर्चस्व बना रहा है कि आज जो भी राजनीतिक चर्चा में शामिल होता है, वह तीन में से ही किसी एक कोण से बोल रहा होता है। और आज वे तर्क अंतत: भाजपा को मजबूत करते हैं। लेकिन इन तीनों कोण मिल कर भी आमजन के सामने वास्तविक प्रश्नों का उत्तर देने में अक्षम हैं।

बहरहाल, इस प्रकरण का एक दूसरा पक्ष भी है। वह यह कि भूख, बेरोजगारी और अभाव से जूझ रहे लोगों को ‘मार्केट’ की चमक, धार्मिक और जातीय पहचान की बहसों से हमेशा के लिए संतुष्ट रख पाना असंभव है। इस बात को विपक्षी दल समझने की भले जरूरत ना महसूस करें, लेकिन वर्तमान सत्ता-तंत्र इसे अवश्य समझता है। यहां सत्ता-तंत्र से हमारा अभिप्राय सिर्फ भाजपा नेतृत्व से नहीं है। बल्कि मौजूदा राजनीतिक-अर्थव्यवस्था (पॉलिटिकल इकॉनमी) से लाभान्वित और इसे संचालित करने वाले पूरे वर्ग से है। यह तबका समझता है किआम जन के जीवन स्तर में सुधार के बिना आधुनिक युग में कोई सत्ता-तंत्र अपनी जन-वैधता लंबे समय तक कायम नहीं रख सकता।

जबकि उनकी मुश्किल यह है कि मौजूदा पॉलिटिकल इकॉनमी का आम जन के हितों से सीधा अंतर्विरोध है। आर्थिकी की मौजूदा दिशा पर चलते हुए यह संभव नहीं है कि बहुसंख्यक जनता के जीवन स्तर में सुधार को भी सुनिश्चित किया जाए। ऐसा उन उपायों के जरिए भी नहीं किया जा सकता, जिनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘रेवड़ी संस्कृति’ कह कर आलोचना तो करते हैं। यह दीगर बात है कि चुनावी तकाजों के कारण खुद उनकी सरकार ने इस संस्कृति को बढ़ावा देने में सबसे बड़ा योगदान किया है। सत्ता-तंत्र के सामने यह अंतर्विरोध एक गंभीर चुनौती है। इसीलिए दुनिया के अन्य कई हिस्सों की तरह भारतीय शासक वर्ग की भी गढ़े गए और गलत ढंग से पेश आंकड़ों पर निर्भरता बढ़ती चली गई है। उन्होंने इनके जरिए जमीनी हकीकत के ठीक उलटी तस्वीर गढ़ने की कोशिश की है। अब देखने की बात यह है कि इस तरीके से वे जनता की निगाह में अपनी वैधता को कितने समय तक बचा पाते हैं। इस दौर की सच्चाई यह है कि आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और यहां तक कि निराधार आंकड़ों को गढ़ने की प्रवृत्ति भी प्रचलन में आ गई है।इस सिलसिले में हाल की कोशिशों पर हम ध्यान दे सकते है:

नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने बहुआयामी गरीबी सूचकांक को आधार बना कर यह दावा किया कि गुजरे दस काल में भारत में गरीबी इतनी तेजी से घटी है कि अब देश की सिर्फ पांच प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने 2022-23 में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर घरेलू उपभोक्ता खर्च सर्वे रिपोर्ट जारी की, जिसमें दावा किया गया कि शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में पिछले दस वर्षों में परिवारों का उपभोक्ता खर्च तेजी से बढ़ा है। यह वृद्धि ग्रामीण इलाकों में ज्यादा रही है। इस आधार पर इस समझ को झुठलाने की कोशिश की गई कि वर्तमान सरकार के शासनकाल में ग्रामीण एवं कृषि अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त होती चली गई है। साथ ही इसके जरिए आर्थिक गैर-बराबरी बढ़ने की हकीकत को झूठलाने की कोशिश की गई है।

इसके साथ ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर के उत्तरोत्तर अधिक तेज होते जाने के लिए भी नए आंकड़े जारी किए गए। प्रयास यह बताने का रहा है कि मोदी सरकार की अर्थनीति से सर्वांगीण विकास हो रहा है और इसके लाभ सभी तबकों को मिल रहे हैं। इस तरह इस धारणा को चुनौती दी गई है कि वर्तमान सरकार मोनोपोली कारोबारी घरानों के हित में काम कर रही है और उसकी नीतियों की वजह से आम जन की जेब से धन का बड़े कारोबारी घरानों को ट्रांसफर हो रहा है। सरकार का आज मीडिया पर पूरा नियंत्रण है। इसलिए वह जो कहानी बताना चाहती है, वह उसी रूप में देश की बहुत बड़ी आबादी तक पहुंच जाती है। सरकारी कहानी में आम तौर पर इतने अधिक और इतनी बड़ी संख्या में छिद्र मौजूद रहते हैं कि विशेषज्ञ उन्हें तुरंत सामने ला देते हैं। यह दीगर बात है कि मीडिया चूंकि उनकी बातों को जगह नहीं देता, इसलिए सरकार का नैरेटिव जनता के एक बड़े हिस्से के बीच टिकाऊ बना रहता है।

विशेषज्ञों ने बताया कि सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे अब सिर्फ पांच प्रतिशत लोग रह गए हैं, इसके विपरीत असली सूरत यह है कि देश पर भूख एवं कुपोषण का साया गहराता चला जा रहा है। आज भी गरीबी और अभाव भारत की हकीकत हैं, बनावटी आंकड़ों से राजनीतिक विमर्श में इस हकीकत को ढका जा सकता है, लेकिन उससे भारतीय समाज की जमीनी हकीकत नहीं बदल सकती। घरेलू उपभोक्ता खर्च सर्वे को लेकर यह बात सामने आई कि इस बार एनएसओ ने इस सर्वेक्षण की विधि बदल दी, जिसके बाद 2011-12 में हुए सर्वे से ताजा निष्कर्षों की तुलना करना अतार्किक हो गया। सरकार अपने दावों से अपना राजनीतिक मकसद साधने में फिलहाल कामयाब हो सकती है, लेकिन उसका परिणाम देश की मूलभूत समस्याओं के और गंभीर रूप लेने के रूप में सामने आ रहा है।


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