Saturday, February 21, 2026
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चौड़ी हुई आर्थिक विषमता की खाई

Samvad

पिछले एक दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी सम्मानजनक रफ़्तार से आगे बढ़ रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार पिछले तीन वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने सुधार की कई मंजिलें तय की हैं। अर्थव्यवस्था में व्यवस्थित तरीके से विस्तार हुआ है। वित्त वर्ष 2024 में वास्तविक जीडीपी का स्तर वर्ष 2020 के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक हो गया है। दुनिया की कुछ ही अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिन्होंने ऐसी संवृद्धि को बरकरार रख पाने में कामयाबी पायी है। सर्वेक्षण बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2025 के लिए आशावादी है। व्यापक और समावेशी विकास की उम्मीद की जा रही है। समावेशी विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत के नीति नियंताओं ने ‘ट्रिकल-डाउन’ के सिद्धांत पर भरोसा जताया। तमाम सामाजिक-आर्थिक नीतियों के सृजन में इसी सिद्धांत को आधार बनाया गया है। हालांकि 1991 में भारत ने उदारीकरण अपनाने के साथ ही इस सिद्धांतको अंगीकार कर लिया था। पिछले एक दशक सरकार से नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की गाड़ी त्वरित गति से आगे बढ़ रही है।

‘ट्रिकल-डाउन’ यानी रिसाव के सिद्धांत के मुताबिकधनी लोगों को दिए जाने वाले फायदे अंतत: समाज के निचले तबके तक रिस-रिसकर पहुंचते हैं। इस सिद्धांत की मान्यता है कि मुक्त बाजार की व्यवस्था में अगर कुछ लोग बहुत अधिक तरक़्की करते हैं तो उसमें कोई गलत बात नहीं। क्योंकि उनकी दौलत उनके खर्चों के माध्यम से रिस कर नीचे आएगी जिससे समाज के निचले तबकों को भी फायदा पहुंचेगा। रिसाव की यह मान्यता पिछली सदी के 70वें दशक से खास लोकप्रिय हुई। 1980 के दशक में अमेरिका में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन में प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की आर्थिक नीतियाँ इसी मान्यता के जेरे-असर थीं। ज्ञातव्य हो कि अर्थशास्त्र की मूलभूत अवधारणाओं में ‘ट्रिकल-डाउन’ नाम का कोई बुनियादी सिद्धांतकभी नहीं रहा। इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल हास्य कलाकार विल रोजर्स ने अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर की आर्थिक नीतियों की आलोचना करने के लिए किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 73 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए भाषण में संपत्ति का सृजन करनेवाले कारोबारी वर्ग को कर आदि में रियायतें देने बात कही थी। प्रधानमंत्री का कहना था कि इस कदम से अर्थव्यवस्था में निजी पूंजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। धनाढ्य वर्ग और व्यापारियों को उद्योग व व्यापार में सुगमता प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने अनेक सकारात्मक कदम उठाए। कारपोरेट करों में कटौती समेत कई प्रोत्साहन दिए गए।

वर्ष 2019-20 में कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी कर दिया गया। साथ ही सरकार ने नई निगमित घरेलू कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्स की दर को 15 प्रतिशत कर दिया गया। लेकिन इन रियायतों के अपेक्षित नतीजे नहीं दिखते। टैक्स में कटौती इस उम्मीद में की गई थी कि कॉरपोरेट सेक्टर में निजी निवेश बढ़ेगा। वित्तीय वर्ष 2020 और 2021 में निजी पूंजी निर्माण यानी नई मशीनरी और उपकरणों के खरीद में लगातार कमी दर्ज की गई। हालांकि अगले दो वर्षों 2022 और 2023 में निजी पूंजी निर्माण में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई। वित्तीय वर्ष 2019 और 2023 के दौरान निजी गैर-वित्तीय निगमों का सकल अचल पूंजी निर्माण 34.1 प्रतिशत से बढ़कर 34.9 प्रतिशत ही हुआ। जाहिर है, निजी सेक्टर ने इन छूटों का उपयोग अपने प्लांटों का विस्तार करने के बजाए देनदारियों को चुकाने में किया। वर्ष 2019-23 की अवधि में सरकारी पूंजीगत व्यय ही अर्थव्यवस्था के पहिये को गति देने में सहायक हुआ। केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय 2019-20 के जीडीपी के 1.67 फीसदी से बढ़कर चालू वर्ष में 3.2 फीसदी तक पहुंच गया है।आर्थिक सर्वेक्षण-2024 बताता है कि वित्त वर्ष 20 से केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में साल दर साल 28.2 प्रतिशत की रफ्तार से वृद्धि हुई है।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण यानी पीएलएफएस के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों के दौरान श्रम के अनौपचारिकरण में वृद्धि हुई है। कृषि में श्रम भागीदारी दर में इजाफा हुआ है। विकास की बुनियादी समझ कहती है कि अर्थव्यवस्था में विकास के साथ खेती में लगी श्रमशक्ति घटनी चाहिए और विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में श्रम भागीदारी दर बढ़नी चाहिए। लेकिन इसके बरक्स खेती के कामों में लगे लोगों की संख्या 2018-19 के 42.5 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 46.1 फीसदी हो गई। इस असंबद्धता की बड़ी वजह है कि कॉरपोरेट सेक्टर रोजगार सृजित करने के मामलों में फिसड्डी साबित हो रहा है। पीएलएफएस के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवाओं के लिए नौकरियों का टोटा पड़ा है। वर्ष 2012 से 2023 के दौरान बेरोजगारी दर दोगुनी हो गई है।

पिछले एक दशक के दौरान देश में प्रतिव्यक्ति आय में तकरीबन 35 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है। वर्ष 2014-15 में प्रति व्यक्ति आय 72,805 रुपये थी जो 2022-23 में बढ़कर 98,374 रुपये हो गई। इसमें सालाना चक्रवृद्धि दर पर मात्र 3.83 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। चूंकि, वास्तविक मुद्रास्फीति पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता है, इसलिए प्रति व्यक्ति आय के स्तर में वास्तविक इजाफा और भी कम रह जाएगा। यदि हम शीर्ष की 1 प्रतिशत आबादी के अलावा बाकी के 99 प्रतिशत आबादी के प्रति व्यक्ति आय को देखें तो इसमें मामूली वृद्धि ही दिखती है। इतना ही नहीं, आर्थिक विषमता की खाई भी गहरा गई है। पेरिस स्थित शोध संगठन वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब की ओर से हाल में जारी एक शोधपत्रके मुताबिक देश के शीर्ष एक फीसद तबके की आमदनी में हिस्सेदारी अपनी ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई है। साल 2023 तक सबसे अमीर एक फीसद भारतीयों के पास देश की आय का 22.6 फीसद हिस्सा था।

घरेलू बचत के मोर्चे पर भी बहुत आशाजनक माहौल नहीं दिखता। वित्त वर्ष 2022 में शुद्ध घरेलू बचत दर 7.3 प्रतिशत से घटकर 5.3 प्रतिशत के स्तर पर आ पहुंची है। यह गत 47 वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वहीं दूसरी तरफ परिवारों पर देनदारी यानी ऋण का बोझ बढ़ रहा है। क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में कुल खुदरा ऋण यानी रिटेल लोन जीडीपी का 12.1 प्रतिशत था जो 2023 में बढ़कर 19.4 प्रतिशत हो गया। वहीं देश में धनकुबेरों की संख्या में वृद्धि हो रही है। दुनिया के अमीर लोगों की ‘फोर्ब्स’ सूची के अनुसार वर्ष 2014 से 2022 के दौरान, भारतीय अरबपतियों की शुद्ध संपत्ति में 280 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय आय में 27.8 प्रतिशत वृद्धि हुई है।

ट्रिकल-डाउन के समर्थकों का तर्क है कि धनी लोगों और कॉरपोरेट के हाथों में अधिक धन होने से व्यय, बचत, निवेश और रोजगार आदि को बढ़ावा मिलता है। इससे सभी को लाभ होता है। लेकिन भारत के मौजूदा आर्थिक नतीजे बताते हैं कि देश में ट्रिकल-डाउन कारगर नहीं दिखता। आर्थिक नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो सिर्फ गिने-चुनों को लाभ पहुंचाने के बजाए सभी के लिए हितकारी हों। भारतीय ज्ञान परंपरा में कहा ही गया है-‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’। यही सूक्ति समग्र आर्थिक नीतियों का प्रेरक दर्शन बने, तभी बृहतर कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा।

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