जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सारा बारबर द्वारा किए गए शोध के अनुसार जब किसी एक ही मिथ्या कथन को बारंबार दोहराया जाए तो जन-जन के चेतन और अवचेतन मन में उस कथन की सत्यता पर विश्वास हो जाता है। शोध के इस निष्कर्ष के चलते मुझे अब समझ में आ गया है कि अच्छे दिन वास्तव में आ चुके हैं, ऐसा मुझे क्यों लगता है ? वरना अपनी दकियानूसी विचारधारा के चलते कल तक महंगाई और भ्रष्टाचार का रोना रोया करता था। यही नहीं अपितु इस शोध के चलते यह भी अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि सक्रिय राजनीति में रहते हुए किस तरह से लंबे समय तक राजनीति में टिके रहना संभव हो जाता है।
आम नागरिक जिस राजनीतिक शख्सियत के प्रति थोड़ा बहुत भी विश्वास रखते हो या नहीं रखते हो, उन्हें सुन-सुन कर उन्हें विकास के अग्रदूत के रूप में नवाज दिया करते है। जिसके चलते तमाम छोटे बड़े राजनेताओं के नाम के आगे कुछ विशिष्ट उपाधियां जड़ित हो जाती है। इससे यह होता है कि जब कभी राजनेता का खयाल आता है या कि उन्हें देखने सुनने का अवसर मिलता है, तब संबंधित राजनेता को दी गई तमाम उपाधियां दिल और दिमाग पर इस कदर छा जाती है कि उनका हर कथन पत्थर की लकीर के समान दिखाई देने लगता है। कभी-कभी तो कुछ एक राजनेता वाककला में कितने निपुण होते हैं कि उन्हें सुनते रहने से ही अंतर्मन में दिव्य आनंद की अनुभूति हुआ करती है।
ऐसे में न तो कोई जन समस्या की टीस होती है और न ही विकास की चिंता। बस ऐसा लगता है जैसे वह बस बोलते ही बोलते जाएं और हम सुनते ही सुनते जाएं। ऐसा होने पर आम नागरिक राजनेता का दीदार करते हुए उन्हें सुनने के आनंद में ही डूब कर रह जाता है। दरअसल राजनेताओं के मुखारविंद से विकास झरता है। व्यवहारिक जीवन में आग में बाग लगाने वाले को दृढ़ इच्छाशक्ति से परिपूर्ण माना जाता है। लेकिन राजनीति में सफेद झूठ को भी रंगीन बनाकर परोसा जाता है। आंकड़ों की सहायता से झूठ को सच और सच को झूठ सिद्ध करना बहुत आसान होता है।
लेकिन राजनीति में आंकड़ों के फेर में बिना उलझे केवल और केवल अपने वाकचातुर्य से जनता जनार्दन को शीशे में उतारने की कला में राजनेता दक्ष होते हैं। वैसे भी राजनीति में तो बोलते के बुरे बिकते ही हैं। उस पर यदि लच्छेदार भाषा में विकास, विकास और विकास ही विकास करने का बारंबार दावा कर दिया जाएं , नागरिकों को तो अगल-बगल, ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं, गरज यह कि हर तरफ विकास ही विकास दिखाई देने लगता है, उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के दो तीन दशकों के पश्चात तत्कालीन दिग्गज राजनेताओं ने तमाम तरह के लोक लुभावन नारे ईजाद करते हुए राजनीतिक सफलता प्राप्त की थी। शायद कि उन्होंने ऐसा निष्कर्ष पहले ही निकाल लिया हो! अन्यथा ऐसा नहीं होता कि आजकल की राजनीति में घिसे पीटे नारों और वादों की सहायता से चुनाव दर चुनाव चुनावी वैतरणी पार करते नेता लोग दिखाई देते। दरअसल बीते दौर के नारे आज भी देश-प्रदेश में दोहराए जाते हैं।

