Wednesday, March 18, 2026
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घोषित बनाम अघोषित आपातकाल

भारतीय संविधान का निर्माण इस भावभूमि पर हुआ था कि यह देश विधिक रूप से एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य होगा, जहां प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी दी जाएगी। यह संविधान न केवल शासन की सीमाएं तय करता है, बल्कि नागरिकों को मौलिक अधिकारों का ऐसा सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है, जिसकी अनुपस्थिति किसी भी लोकतंत्र को निरर्थक बना सकती है। परंतु विडंबना देखिए कि इसी संविधान के दायरे में रहते हुए देश को न केवल घोषित आपातकाल का भयावह दौर देखना पड़ा, बल्कि आज एक ऐसा समय भी आया है, जब बिना किसी औपचारिक उद्घोषणा के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है। यह अघोषित आपातकाल है—विधिक परिधियों से बाहर नहीं, किंतु विधिक प्रक्रिया के भीतर उसकी आत्मा को खोखला कर देने वाली वह स्थिति जिसमें संविधान जीवित है परंतु मौलिक अधिकार मृतप्राय हैं।

घोषित आपातकाल भारत में 25 जून 1975 को अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था। इस अनुच्छेद में यह प्रावधान है कि यदि राष्ट्र की सुरक्षा को बाह्य आक्रमण या आंतरिक संकट से खतरा हो, तो राष्ट्रपति के परामर्श से प्रधानमंत्री आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक अस्थिरता और न्यायिक फैसले के बाद उत्पन्न स्थिति को आधार बनाते हुए देश में आंतरिक संकट की घोषणा कर दी। इसके परिणामस्वरूप नागरिकों के मौलिक अधिकारों तक को निलंबित कर दिया गया। इस अवधि में प्रेस की स्वतंत्रता पर रोके लगा दी गई। न्यायपालिका निष्क्रिय कर दी गई। विपक्षी दलों के नेताओं को गैरकानूनी अधिनियमों के तहत वर्षों जेल में रखा गया। रेलवे कर्मचारियों की ऐतिहासिक हड़ताल का दमन, जेपी आंदोलन पर बलप्रयोग और न्यायालयों में अधिकारों की समाप्ति—यह सब घोषित आपातकाल की वे घटनाएं थीं, जो केवल शासन नहीं, बल्कि संवैधानिक भावना को कुचलने के रूप में दर्ज हैं। परंतु वह आपातकाल घोषित था। जनता को पता था कि उनके अधिकार निलंबित हैं। अखबारों की स्याही सूख गई थी, परंतु वह स्याही सिसकियों के रूप में पाठकों के मन तक पहुंचती थी। संघर्ष स्पष्ट था। सत्ता और नागरिक आमने-सामने खड़े थे।

अब स्थिति इससे भी अधिक भयावह है। आज आपातकाल की कोई घोषणा नहीं हुई है, अनुच्छेद 352 का प्रयोग नहीं हुआ है, परंतु उस समस्त वातावरण को पुनर्जीवित कर दिया गया है, जिसमें जनता मौन है, बुद्धिजीवी भयभीत हैं, पत्रकार सलाखों के भीतर हैं, न्याय में विलंब को न्याय मान लिया गया है और असहमति को राष्ट्रद्रोह के समकक्ष स्थापित कर दिया गया है। आज भारत में विचार की स्वतंत्रता को सबसे बड़ा खतरा है। संवैधानिक ढांचे के भीतर रहते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विधिक प्रतिबंधों के माध्यम से इस सीमा तक नियंत्रित कर दिया गया है कि नागरिक अपने ही देश में आत्म-सेंसरशिप की अवस्था में जीने को विवश हैं। भारत में (राजद्रोह), (धार्मिक वैमनस्य) और विशेष रूप से विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम जैसे कठोर विधानों का प्रयोग स्वतंत्र पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों, शिक्षाविदों और छात्रों पर किया जा रहा है। छात्रों की आवाज को समाप्त करने के लिए छात्र संघ चुनाव को सरकारों द्वारा समाप्त कर दिया गया। हर आवाज को दबाने के तोर- तरीके अपनाए जाने लगे हैं। इस पूरे परिदृश्य में सत्ता और विपक्ष की भूमिका भी निरीक्षण की अपेक्षा रखती है। घोषित आपातकाल के समय विपक्ष एकजुट होकर जनता के साथ खड़ा हुआ था। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, और अनेक राजनेताओं ने कारावास की यातना भोगी किंतु सत्ता के समक्ष झुके नहीं। उनके लिए लोकतंत्र केवल एक राजनैतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श था। उन्होंने संविधान की रक्षा को सर्वोपरि माना। वहीं आज की स्थिति में विपक्ष बिखरा हुआ है, और जनहित के मुद्दों पर उसका स्वर या तो मौन है या दबा हुआ है। अघोषित आपातकाल में स्वतंत्र पत्रकारिता भी मर चुकी है मजदूरों के छात्रों के किसानों के मुद्दे अब न्यूज चैनलों में दिखाई नही पड़ते है।

स्वतंत्र पत्रकार और विपक्ष के नेता ऐसे चैनल को गोदी मीडिया कहकर पुकारा जा रहा है। यह कमजोरी अघोषित आपातकाल की स्वीकृति जैसी प्रतीत होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण केवल विधिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट है। जब राष्ट्रवाद की परिभाषा सत्ता द्वारा नियंत्रित की जाने लगे, जब धार्मिक असहमति को अपराध मान लिया जाए, और जब नागरिकों के विचारों को ‘देशद्रोह’ से जोड़कर देखा जाए-तब संविधान केवल ग्रंथ बन जाता है और लोकतंत्र एक अभिनय।

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