जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय की है। यह मामला आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद मानी जाती है।
क्या है मामला?
भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार में चुनाव से पहले मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया है, जिसका उद्देश्य सूची से अपात्र नामों को हटाकर केवल पात्र नागरिकों को शामिल करना बताया गया है। लेकिन इस फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कदम चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और इससे हजारों योग्य मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उठाए सवाल
मामला अवकाशकालीन पीठ के समक्ष न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की बेंच में आया, जहां याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने चुनाव आयोग के 24 जून के निर्देश को संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 325 और 326 का उल्लंघन बताया और आयोग को नोटिस जारी करने की मांग की।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की याचिका
इस मामले में याचिकाकर्ताओं में राजद सांसद मनोज झा, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) जैसे संगठन शामिल हैं। इनका कहना है कि चुनाव से ऐन पहले किया गया यह पुनरीक्षण, निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव पर सवाल खड़े करता है। महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि आयोग को अन्य राज्यों में भी ऐसे निर्देश जारी करने से रोका जाए।
चुनाव आयोग की सफाई
दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह विधिसम्मत और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा रही है। आयोग का कहना है कि वह बिहार में चुनाव से पहले मतदाता सूची को शुद्ध कर समय पर चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
क्या होगा 10 जुलाई को?
अब सबकी निगाहें 10 जुलाई पर टिकी हैं, जब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए इस कदम की वैधता क्या है और क्या यह भारत के संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अनुरूप है।

