जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: अवैध कॉलोनियां काटने वाले संगठित गिरोह की तर्ज पर लगातार अपने पांव पसार रहे हैं। ज्यादातर का कनेक्शन सत्ताधारियों व मेडा के अफसरों से है, जिसके चलते लगता है कि इन्हें लूट की खुली छूट मिल गयी है। इस सारी कारगुजारी का बीज पूर्व में यहां टाउन प्लानर रहे विजय सिंह ने रोपा था, जो अब वटवृक्ष बन गया है। अपने कार्यकाल में विजय सिंह ने महानगर में अवैध कॉलोनियों व निर्माणों का जाल बिछवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हो सकता है कि इसकी कीमत आने वाले समय में वर्तमान वीसी समेत दूसरे ईमानदार अफसरों को चुकानी पड़े। विजय सिंह यहां से जा चुके हैं, लेकिन उन्होंने कोई ऐसी जगह नहीं छोड़ी, जहां अवैध निर्माण या कॉलोनियां नहीं काटी गयी हों। विजय सिंह जाते जाते लावड़ रोड, मवाना रोड, रोहटा रोड, बागपत रोड, भोला रोड, पल्लवपुरम, भावनपुर जैसे तमाम इलाकों में अवैध कॉलोनियां आबाद करा गए। लावड़ रोड की यदि बात करें तो इस इलाके को अवैध कॉलोनियों की मंडी कहा जा सकता है। यहां तमाम बड़ी-बड़ी अवैध कॉलोनियां हैं।
इस इलाके में अवैध कॉलोनियां ही नहीं बल्कि तथाकथित बिल्डरों ने बड़े कांप्लेक्स खड़े कर दिये हैं। ऐसा करने वाले बिल्डरों के खिलाफ जनवाणी की मुहिम के बाद सोफीपुर श्मशान घाट के बराबर में बड़े कांप्लेक्स पर पूर्व वीसी अभिषेक पांडे ने कार्रवाई की थी, तब से यह कांप्लेक्स उजाड़ ही पड़ा है। इसको बनाने वाले तथाकथित बिल्डर दोबारा से इसको आबाद करने की हिम्मत नहीं जुटा सके। हालांकि सूत्रों की मानें तो इसको ध्वस्त किया जाना था, लेकिन बाद में सील की कार्रवाई कर छोड़ दिया गया, यह बात अलग है कि सील की टेप का वहां कोई अतापता नहीं है। जो कॉलोनियां काटी जाती हैं, जब तक उसमें सभी मकान व प्लाट बिक नहीं जाते, तब तक ऐसी कॉलोनियों का नामकरण नहीं किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि प्राधिकरण का कोई अफसर यदि लिखा पढ़ी करनी चाहे तो किस नाम से करे और यह रास्ता भी प्राधिकरण के फॉर सेल अफसर ही सुझाते हैं।
छोटी कॉलानियों पर ही गरजता है मेडा का बुलडोजर
अवैध कॉलोनी ही नहीं, लावड़ रोड पर अवैध विवाह मंडप, मार्केट और कई दूसरी कच्ची कॉलोनियों का काम फ्लोर पर है। यहां अब तक दर्जन भर से ज्यादा तो बड़ी कॉलोनियां काटी जा चुकी हैं और ये दर्जन भर कॉलोनियां लावड़ रोड के एक छोटे से हिस्से में काट दी गयी हैं। इनसे दोगुनी ज्यादा का शहर में काम चल रहा है। प्राधिकरण के कुछ अफसरों को दो तीन बीधा की अवैध कॉलोनी तो नजर आती हैं, लेकिन 50 या फिर उससे ज्यादा बड़े आकार की बड़ी कॉलोनियां नजर नहीं आती हैं। हो ये रहा है कि छोटी-छोटी कॉलोनियों पर कार्रवाई कर वहां खड़े होकर फोटो खिंचवाकर शासन तथा मीडिया को भेजी जाती हैं, ताकि उनका प्रकाशन कराकर खुद पीठ थपथपाई जा सके। इतना ही नहीं ऐसी कारगुजारियों से शासन में बैठे सीएम योगी के अधिकारियों को भी धोखा देने का काम किया जा रहा है।
तस्करी की तर्ज पर चलता है प्रवर्तन दल का खेल
पुरानी फिल्मों में दिखाया जाता था कि ड्रग्स और गोल्ड की तस्करी करने वालों की मदद करने वाले कुछ अधिकारियों को विलेन खुद ही अपना थोड़ा बहुत माल पकड़वा देता था और इसकी आड में विलेन अपना बड़ा सामान निकालकर ले जाता था। इस काम में वो अफसर ही विलेन की मदद करते थे, जिन्हें सरकार तस्करी रोकने के लिए वेतन दिया करती थी। इस समय उसी तर्ज पर प्राधिकरण के कई अधिकारी और इंजीनियर काम कर रहे हैं, दो-चार बीघे वाली कॉलोनियों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है, लेकिन जो बड़ी कॉलोनियां पर पूरी कृपा बरसायी जा रही है।
कुछ ऐसा होता है संगठित गिरोह
यहां अवैध कॉलोनियां काटने का धंधा करने वाले एक संगठित गिराह की तर्ज पर काम करते हैं। इसमें अवैध कॉलोनी (कच्ची कॉलोनी) काटने वाला खुद सर्वेसर्वा होता है। इसके अलावा सत्ताधारी दल का कोई नेता जरूर जुड़ा होता है। कुछ बाउंसर भी रखे जाते हैं। बड़ा मददगार मेरठ विकास प्राधिकरण होता है, जिसके अफसर ही ऐसी कॉलोनियों को पल्लवित करते हैं। प्राधिकरण के अफसरों के अलावा इनकी पकड़ पीवीवीएनएल के अफसरों तक होती है। भले ही नियम हो कि किसी भी अवैध कॉलोनी को बिजली का कनेक्शन नहीं दिया जाएगा, लेकिन इनका पैसा बोलता है। इसके चलते कनेक्शन भी मिल जाता है। ऐसे लोगों का कहीं कोई काम नहीं रुकता।
तीन साल में सबसे ज्यादा अवैध कॉलोनियां
महानगर में बीते तीन साल के दौरान सबसे ज्यादा करीब 34 फीसदी अवैध कॉलोनियां आबाद हुई हैं। गूगल इमेजिंग मैच सर्च कर इसकी जानकारी की जा सकती है। जिसको कोई भी देख सकता है। महानगर का जितना भी आउटर इलाका था, उन सभी में अवैध कॉलोनियां आबाद करा दी गयीं। इन तमाम अवैध कॉलोनियों के पीछे टीपी विजय सिंह की मुख्यत: कारगुजारी थी।

