Monday, April 13, 2026
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भारत,रूस और चीन की दोस्ती से अमेरिका को झटका

संजय सिन्हा

भारत और रूस के रिश्तों को लेकर अगर किसी देश को सबसे ज्यादा समस्या है तो वो अमेरिका है। इसी बीच परिस्थितियां कुछ इस तरह से बनी हुई हैं कि चीन-भारत और रूस मिलकर पूरी दुनिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं। चीन में एससीओ की मीटिंग के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हुई जिसमें दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ ऐतिहासिक संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच बहुमुखी सहयोग रहा है। वे इस सहयोग को आगे और भी बढ़ाना चाहते हैं। उधर एससीओ में भारत-रूस और चीन की रिश्तों के रंग दिखे। जहां रूस और भारत की दोस्ती पहले से ही मजबूत है, वहीं भारत और चीन के बीच विश्वास बहाली और रिश्ते ठीक करने की कोशिश जारी है। भारत-रूस-चीन का साथ आना दुनिया में क्या असर डालेगा। अमेरिका और पश्चिमी जगत इसे कैसे देख सकता है और ये किस दिशा में जा रहा है। उधर रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का ट्रंप प्रशासन रूस से दोस्ती को लेकर भारत पर भड़का हुआ है। उसका आरोप है कि भारत रूस से तेल खरीदकर उसकी वित्तीय मदद कर रहा है। इस कारण अमेरिका की यूक्रेन में युद्धविराम की कोशिशें नाकाम हो रही हैं।

वहीं, भारत का कहना है कि वह वैश्विक तेल की कीमतों को स्थिर रखने और अपनी बड़ी आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल खरीद रहा है। ऐसे में रूसी तेल खरीद पर भारत और अमेरिका के बीच गतिरोध बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अमेरिका के कहने पर रूस का साथ छोड़ सकता है। पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत का कहना है कि अभी कोई वर्ल्ड ऑर्डर है ही नहीं, अभी तो दुनिया में जंगलराज जैसी स्थिति है, जिसका जो मन आता है करता है। इसलिए भारत, रूस और चीन की कोशिश ये होगी कि किसी तरह से एक मल्टीलेटरल सिस्टम, मल्टीपोलर वर्ल्ड बने जिसमें बने कायदे कानूनों को सब मानें। अभी हालात ये हैं कि जिन देशों ने पुराना सिस्टम बनाया था उन्होंने ही वह तोड़ा है। अमेरिका और पश्चिमी जगत की एकतरफा सोच (यूनिलेटरलिजम) की वजह से सारे मल्टीलेटरल इंस्टिट्यूट्शन की अहमियत कम हुई है।

ग्लोबल साउथ के देशों का ये मानना है कि मल्टीलेटरल और मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर होना चाहिए। अगर भारत, रूस और चीन एक दूसरे साथ ईमानदार रहेंगे तो इस दिशा में अहम योगदान दे सकते हैं। अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर भी कहती हैं कि ये अमेरिका के खिलाफ नहीं है पर एकतरफा सोच के खिलाफ है। ये रूल बेस्ड ऑर्डर के पक्ष में है यानी अंतराष्ट्रीय स्तर पर कुछ नियम कायदे लागू रहें और सभी इन्हें मानें।मीरा शंकर कहती हैं कि यूएस का बाजार दुनिया में अब भी सबसे बड़ा है और सबके लिए महत्वपूर्ण है, भारत के लिए भी अहम है। हमारे यहां बनने वाले सबसे ज्यादा सामान वहां बिकते हैं। ये करीब 41 बिलियन डॉलर का सरप्लस है यानी भारत के हित में व्यापार है। ये न तो हमारा चीन के साथ होता है न रूस के साथ होता है। चीन हमें काफी सामान बेचता है और वहां भारत को 100 बिलियन डॉलर का घाटा है क्योंकि चीन भारत से लेता बहुत कम है। हम रूस से तेल खरीद रहे हैं, इस वजह से व्यापार बढ़ा है नहीं तो दोनो देशों के बीच व्यापार काफी कम था।रूस भी भारत से बहुत कम खरीदता है। वह कहती हैं कि यूएस का बाजार जो भारत के लिए एक रोल प्ले करता है उसकी अहमियत न तो चीन न रूस पूरी कर पाएगा।

उन्होंने कहा कि एक तरीके से हमें चतुराई से चलना पड़ेगा जिससे हम चीन के साथ रिश्ते को सुधार सकते हैं, रूस के साथ रिश्ते और मजबूत कर सकते हैं पर हमें यूएस से भी बातचीत जारी रखनी पड़ेगी। मीरा शंकर कहती हैं कि अमेरिका और पश्चिमी जगत को अपना व्यवहार भी देखना पड़ेगा कि क्यों ये देश (भारत-रूस-चीन) साथ आए हैं। यूएस सबसे बड़ी अर्थव्वस्था है तो वे सोचते हैं कि जो भी चाहें कर लें। बाकी देशों को ये देखना होगा कि वे किस तरह एक दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाए और रूल बेस्ड ऑर्डर को मजबूत करें। अनिल त्रिगुणायत ने कहा कि पश्चिमी जगत माइंडसेट ही अलाइंस माइंडसेट है इसलिए वे इसे एंटी वेस्ट के तरह से ही देखेंगे पर यह अप्रोच भारत का नहीं है, न रूस का है न अभी तक चीन का है। मीरा शंकर ने कहा कि चीन और भारत के बीच जो विश्वास टूट गया था, उसे एक एक कदम उठाकर बढ़ाना पड़ेगा, एकाएक नहीं। साथ ही हर कदम के बाद वेरिफाई करना पड़ेगा ताकि भरोसा बढ़े।

भारत और रूस की दोस्ती कितनी मजबूत है, इसका तो सबसे बड़ा सबूत यही है कि भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेतुके टैरिफ बम के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदकर यूक्रेनी जंग को फंड करने का आरोप लगाया है और भारत पर कुल मिलाकर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है। ट्रंप को लगा कि भारत पीछे हट जाएगा लेकिन उनका दांव उल्टा पड़ गया. भारत ने न सिर्फ अमेरिका और यूरोप को उसके खुद के रूसी व्यापार का आईना दिखाया बल्कि तेल खरीदना जारी रखते हुए चीन में पुतिन के साथ गर्मजोशी से मुलाकात की। दोस्ती पहले से कहीं मजबूत है, यह दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

(लेखक एक सीनियर जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं)

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