
भारतीय राजनीति का इतिहास संघर्षों, विचारधाराओं और नेतृत्व के प्रयासों से भरा पड़ा है। यहां सत्ता केवल चुनावी समीकरणों से तय नहीं होती, बल्कि यह भी तय होती है कि समाज की संवेदनाओं को कितनी समझदारी और मर्यादा के साथ संभाला जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति की भाषा जिस तरह गिरती चली गई है, वह केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि देश की संस्कृति और लोकतंत्र के मूल्यों के लिए खतरा बन गई है। आज राजनीति केवल नीतियों और जनहित के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि व्यक्तिगत हमलों, अपमान और गाली-गलौज तक सीमित हो गई है। विशेषकर जब माताओं और परिवारों को राजनीतिक युद्ध का हथियार बनाया जाता है, तब लोकतंत्र की गरिमा पर गहरा प्रश्नचिन्ह उठता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार अपनी मां का नाम लेकर जनता की भावनाओं को जोड़ते हैं। उन्होंने मंचों और रैलियों में कहा कि ‘मेरी मां का अपमान देश की मां का अपमान है।’ यह कथन सुनने में भावुक और गौरवपूर्ण लगता है। लाखों भारतीय इस बयान को सुनकर प्रेरित होते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि अगर नरेंद्र मोदी की मां देश की मां हैं, तो क्या राहुल गांधी की मां देश की मां क्यों नहीं हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी के लिए ‘जर्सी गाय’ शब्द का इस्तेमाल किया। यह केवल व्यंग्य नहीं था, बल्कि किसी महिला की अस्मिता को चोट पहुंचाने वाला हमला था। गाय भारतीय संस्कृति में पूजनीय मानी जाती है, लेकिन ‘जर्सी गाय’ कहकर यह संदेश दिया गया कि सोनिया गांधी विदेशी हैं, उनका योगदान व्यर्थ है। यह अपमान केवल उनके लिए नहीं था, बल्कि हर उस महिला के लिए था जिसने समाज में योगदान देने का प्रयास किया। 2012 मे मोदी ने अपने भाषण में ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’ का जिक्र किया। क्या 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड किसी की मां, पत्नी नहीं थी? यह बयान राजनीतिक मतभेद का हिस्सा नहीं था, बल्कि महिलाओं के सम्मान पर हमला था। उस समय सुनंदा जीवित थीं और यह टिप्पणी उनके और उनके परिवार के लिए अपमानजनक थी। इस प्रकार के बयान यह दशार्ते हैं कि राजनीति में व्यक्तिगत जीवन को हथियार बना देना सामान्य हो गया है।
2018 में मोदी ने ‘कांग्रेस की विधवा’ शब्द का इस्तेमाल किया। भले ही उन्होंने सीधे नाम नहीं लिया, लेकिन निशाना स्पष्ट था। यह टिप्पणी न केवल सोनिया गांधी का अपमान थी, बल्कि समाज के उन लाखों विधवाओं का भी अपमान थी जो पहले से ही कठिनाइयों में जीवन जी रही हैं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि राजनीति में मातृत्व और सम्मान केवल सत्ता पक्ष तक सीमित हो गया है। इन सभी बयानों से यह साफ होता है कि राजनीति में माताओं और परिवारों का इस्तेमाल केवल भावनात्मक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
सोनिया गांधी की स्थिति उस परिस्थिति का उदाहरण है। लेकिन राजीव गांधी से विवाह के बाद से उन्होंने इस देश में अपना जीवन समर्पित किया और राजनीति में सक्रिय होकर कांग्रेस का नेतृत्व किया। बावजूद इसके उन्हें विदेशी कहकर, ‘जर्सी गाय’ कहकर और ‘कांग्रेस की विधवा’ कहकर अपमानित किया गया। मातृत्व को राजनीतिक दलों के हिसाब से बाँटना लोकतंत्र और संस्कृति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
एक और शर्मनाक घटना टीवी डिबेट के दौरान हुई। आज तक न्यूज चैनल पर एक लाइव डिबेट के दौरान भाजपा के प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने कांग्रेस प्रवक्ता सुंदर सिंह राजपूत को अभद्र भाषा में गालियां दीं। यह घटना जून 2025 में हुई थी, जब दोनों के बीच कश्मीर के हालात पर तीखी बहस चल रही थी। इस दौरान शुक्ला ने राजपूत की मां को लेकर अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसे एंकर ने माइक म्यूट कर रोकने की कोशिश की, लेकिन शुक्ला ने फिर से वही भाषा दोहराई। इस अभद्रता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भाजपा प्रवक्ता की आलोचना हुई। इससे पहले भी, आलोक शर्मा, जो कांग्रेस के प्रवक्ता पर भी महाराष्ट्र के लोगो को अपमानित करने का आरोप लगा है लेकिन यह भी दर्शाता है कि टीवी डिबेट्स में अभद्र भाषा का इस्तेमाल एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में टीवी डिबेट में अनेकों बार मां , बहनों, पत्नी इत्यादि का अपमान व्यक्तिगत रूप से किया जाने लगा । मीडिया की मयार्दा पर भी सवाल उठते रहे है ।
यह सब देखकर सवाल उठता है कि क्या राजनीति केवल गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का खेल बनकर रह जाएगी? क्या जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दों से भटकाकर केवल विरोधियों की मांओं और पत्नियों पर कटाक्ष करना ही राजनीति का असली उद्देश्य है? लोकतंत्र की आत्मा इस तरह के व्यवहार से आहत होती है। भारतीय इतिहास में नेताओं ने परिवार को राजनीति से अलग रखने की परंपरा निभाई। महात्मा गांधी ने कभी अपने परिवार को राजनीति का विषय नहीं बनने दिया। पंडित नेहरू ने कभी किसी की मां या पत्नी पर कटाक्ष नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष की नीतियों की आलोचना की, लेकिन कभी व्यक्तिगत जीवन पर सवाल नहीं उठाए। यह शालीनता भारतीय राजनीति की ताकत थी। लेकिन आज वह शालीनता गायब हो गई है।
मणिपुर में हाल के वर्षों में हुई हिंसा और संघर्षों में महिलाओं के खिलाफ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से अपमानजनक घटनाएँ दर्ज हुई हैं। मोदी का मौन रहना त्रसदी से कम नही था , मणिपुर में महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधियाँ शामिल रही हैं उनका अपमान केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज और समुदाय की गरिमा पर भी चोट पहुँचाई गई।
सच यह भी है कि सियासत में माताओं का इस्तेमाल केवल भावनात्मक हथियार के रूप में हो रहा है। एक मां को मंच पर सजाकर वोट माँगे जाते हैं और दूसरी मां को गालियां देकर राजनीतिक भीड़ को खुश किया जाता है। यह प्रवृत्ति खतरनाक है। यह लोकतंत्र को खोखला करती है और समाज में असमानता और नफरत को गहरा करती है। भारत को इस प्रवृत्ति से बचाना होगा। राजनीति में आलोचना रहे, कटाक्ष रहे, लेकिन माताओं और परिवार को राजनीति से दूर रखना होगा। तभी लोकतंत्र अपनी असली गरिमा में जिंदा रह पाएगा। अन्यथा यह गिरावट हमें उस अंधेरे में ले जाएगी जहां राजनीति केवल अपमान और गाली का पर्याय बनकर रह जाएगी। आज जरूरत है कि प्रधानमंत्री स्वयं यह पहल करें। अगर वे सचमुच अपनी मां को देश की मां मानते हैं, तो उन्हें यह भी कहना चाहिए कि राहुल गांधी की मां भी देश की मां हैं। देश मे किसी भी मां को भी अपमानित नहीं किया जाना चाहिए । केवल इतना कह देने से राजनीति की भाषा बदल जाएगी, संवाद का स्तर ऊंचा होगा और समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। लेकिन अगर यह नहीं हुआ, तो इतिहास गवाह रहेगा कि इस दौर में मातृत्व भी राजनीति का शिकार हो गया था।

