Sunday, May 31, 2026
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Kartik Purnima 2025: 5 नवंबर को मनाई जाएगी कार्तिक पूर्णिमा, जानिए गंगा स्नान का महत्व और व्रत कथा

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। भारतीय संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। वर्ष के बारह महीनों में कार्तिक मास को आध्यात्मिक और शारीरिक ऊर्जा संचय का सर्वश्रेष्ठ काल कहा गया है। इस दिन देवों की दीपावली मनाई जाती है, जिसे देव दीपावली भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु, भगवान शिव और माता गंगा की आराधना से जीवन के अंधकार रूपी तामसिक वृतियों का नाश होता है और मनुष्य के भीतर दिव्यता का प्रकाश प्रकट होता है।

कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का महत्व

शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु विविध देवी देवताओं का पूजन करते और मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं। जनमानस के अंदर स्थित आसुरी वृतियों के नाश व दैवीय शक्तियों के उत्थान के लिए कार्तिक पूर्णिमा को लक्ष्मी नारायण की महाआरती करके दीप प्रज्ज्वलित करते हैं। ताकि हम अपने भीतर देवत्व धारण कर सकें अर्थात सद्गुणों को अपने अंदर समाहित कर सकें, नर से नारायण बन सकें

तिथि

पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि 04 नवंबर 2025 को प्रात:काल 10:36 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 05 नवंबर 2025 को सायंकाल 06:48 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदया तिथि को आधार मानते हुए इस साल कार्तिक पूर्णिमा का पावन पर्व 05 नवंबर बुधवार को मनाया जाएगा।

यह दिन वैष्णव भक्त शैव भक्त और सिख धर्म के लिए भी विशेष है

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व सिर्फ वैष्णव भक्तों के लिए ही नहीं शैव भक्तों और सिख धर्म के लिए भी बहुत ज्यादा है। विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य यानी मछली के रूप में थे। भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। इससे सृष्टि का निर्माण कार्य फिर से आसान हुआ।

शिव भक्तों के अनुसार इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार कर दिया जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए। इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेक नामों में से एक है। इसलिए इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहते हैं।

इसी तरह सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा के दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म हुआ था। इस दिन सिख सम्प्रदाय के अनुयाई सुबह स्नान कर गुरुद्वारों में जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताए रास्ते पर चलने की सौगंध लेते हैं। इसे गुरु पर्व भी कहा जाता है। इस तरह यह दिन एक नहीं बल्कि कई वजहों से खास है। इस दिन गंगा-स्नान,दीपदान,अन्य दानों आदि का विशेष महत्त्व है। इस दिन क्षीरसागर दान का अनंत महत्व है,क्षीरसागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल में मनाया जाता है

श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करें

कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद भगवान श्री सत्यनारायण के व्रत की कथा अवश्य ही सुननी चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान श्री हरि की गंध, अक्षत, पीले लाल पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, दूर्वा, शमी पत्र, पीपल के पत्तों एवं गंगाजल से पूजन करने से व्यक्ति को जीवन में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहता है। वह इस लोक में समस्त सांसारिक सुखों को भोगते हुए अंत में स्वर्ग को प्राप्त होता है। इस दिन सायंकाल घरों, मंदिरों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी/नदियों को भी दीपदान किया जाता है।

दीपदान का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रत्येक मनुष्य को दीपदान अनिवार्य रूप से करना चाहिए। स्कन्द पुराण में ब्रह्मा जी ने नारद जी को कार्तिक मास में दीपदान की महिमा के बारे में विस्तार से बताया है। उनके अनुसार कार्तिक माह में दीपदान से राजसुय यज्ञ और अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान करने का पुण्य जन्म जन्मांतर तक अक्षय रहता है। पूरे वंश में किसी को भी नरक का मुँह नहीं देखना पड़ता है।

इस दिन संध्याकाल में जो लोग अपने घरों को दीपक जला कर सजाते है उनका जीवन सदैव आलोकित प्रकाश से प्रकाशित होता है उन्हें अतुल लक्ष्मी, रूप, सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है, माँ लक्ष्मी ऐसे लोगो के घरों में स्थाई रूप से सदैव निवास करती है। इसीलिए इस दिन सभी को अपने घर के आँगन, मंदिर, तुलसी, नल के पास, छतों और चारदीवारी पर दीपक अवश्य ही जलाना चाहिए।

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