अक्सर मम्मास बॉय की धडल्ले से आलोचना कहूं या फिर यूं कहें कि मजाक उड़ाई जा रही है। अरे ये जो बॉय हैं, यानि लड़के इनको इनकी मां ने ही इन्हें जन्म दिया और उसे पाला -पोसा है। यही गर्ल्स यानि लड़कियों पर भी लागू होता है। जाहिर सी बात है कि सभी मम्मास के बॉय और गर्ल ही हैं। मम्मास बॉय को ही टार्गेट पर रख कर रील्स बना कर मजाक उड़ाई जा रही है। इनमें दिखाया जाता है कि शादी के बाद भी पति अपनी मां से बात-बात पर सलाह मशविरा करता है।
ललिता जोशी
जब से सोशल मीडिया का हमारे जीवन में प्रभाव बढ़ा है या यूं कहे की इसकी दखलंदाजी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है तो इस कारण रिश्तों की परिभाषा भी बदलती जा रही है। चाहे वो युवा पीढ़ी हो या फिर बुजुर्ग पीढ़ी सभी इससे प्रभावित हुए हैं। समाज के सभी वर्गों के लोग सोशल मीडिया को देखते हैं और उस पर चलते हुए ट्रेंड्स से प्रेरित होते हैं और कब ये ट्रेंड हमारे समाज में अपने पैर पसार लेते हैं ये मालूम ही नहीं चलता। जब कुछ अनहोनी होती है तो सोशल मीडिया को जिम्मेदार ठहराया जाता है। आज सभी मोबाइल के प्रभाव में हैं और उससे प्रभावित भी। जैसे मनुष्य की जिंदगी में पंच तत्वों की आवश्यकता होती है और अब ये छठा तत्व मोबाइल भी मानव जीवन के लिए उतना ही अहम है जितने की ये पंचतत्व। मोबाइल अगर छूट जाए तो प्राण हलक में ही आ जाते हैं। अब तो छह माह से कम उम्र के बच्चे भी मोबाइल की चपेट में आ चुके हैं।
आज की आपा-धापी भरी जिंदगी में माता-पिता चाहे नौकरीपेशा वाले हों या फिर हाउसवाइफ, अभी अपने काम करने के लिएअपने बच्चों को बहलाने के मोबाइल का झुनझुना पकड़ा देते हैं और बच्चे भी मस्त हो जाते हैं, मोबाइल में और अभिभावक अपने काम में। मोबाइल की अपनी एक पैरलेल पाठशाला चलती है। मोबाइल के विभिन्न ऐप्प्स भी प्रशिक्षण संस्थाओं से कम नहीं हैं, साथ ही मोबाइल एक वर्कशॉप और प्रयोगशाला भी बन चुका है। अपनी जेन जी का धामल भी सोशल प्लेटफॉर्म्स से ही शुरू हुआ था। उसकी धमक सभी ने देखी और नतीजे भी भुगते।
आजकल जब कभी हम फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब इत्यादि को एक्सैस करते हैं तो कई विषय सामने आते हैं, जो घरों से शुरू होकर सामाजिक से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक के होते हैं। जो घरों के रिश्तों, समाज और देश की सोच को प्रभावित करते हैं। वैसे तो कई विषय इन पर ट्रेंडिंग हैं। सास-बहू, पिता-पुत्र, भाई-भाई ,भाई -बहन और पति-पत्नी और न जाने कितने ही रिश्ते हैं, जिन पर सोशल मीडिया में भड़ास निकाली जाती है। ऐसे ही एक अवधारणा सामने आई वो है मम्मास बॉय और इन ब्वयाज पर की गई टिप्पणियां। अक्सर मम्मास बॉय की धडल्ले से आलोचना कहूं या फिर यूं कहें कि मजाक उड़ाई जा रही है। अरे ये जो बॉय हैं, यानि लड़के इनको इनकी मां ने ही इन्हें जन्म दिया और उसे पाला -पोसा है। यही गर्ल्स यानि लड़कियों पर भी लागू होता है। जाहिर सी बात है कि सभी मम्मास के बॉय और गर्ल ही हैं।
मम्मास बॉय को ही टार्गेट पर रख कर रील्स बना कर मजाक उड़ाई जा रही है। इनमें दिखाया जाता है कि शादी के बाद भी पति अपनी मां से बात-बात पर सलाह मशविरा करता है। अपना सुख-दुख, अच्छा-बुरा अपनी मां को बताता है। ऐसे पतियों की सोशल मीडिया पर मम्मास बॉय कहकर खिल्ली उड़ाई जाती है। अरे भाई जिस मां को हम अपने होश संभालते ही देखते हैं, उसके साथ अपना अच्छा बुरा देखते हुए बड़े होते हैं, तो उनकी एक आदत हो जाती है और चाहे-अनचाहे बेटा अपनी मां के साथ अगर अपनी बातें शेयर कर ले तो आफत आ जाती है सब को। अगर यही लड़कियां जब पत्नी बनकर ससुराल जाती हैं तो मां को ससुराल की मिनिट और सेकेंडों की खबर ऐसे देती हैं, जैसे वो किसी खबरिया चैनलों की रिपोर्टर हों। तब ये मम्मास गर्ल अक्सर अपनी विश्वसनीय सलाहकार, मार्गदर्शक अपनी ममा से सब कुछ यानि सबकुछ डिस्कस करती हैं, तो तब इन मम्मास गर्ल्स की खिल्ली का क्या?
कई बार तो लड़कियों के मायके का इतना हस्तक्षेप होता है कि नौबत तलाक तक आ पहुंचती है और घर टूट जाते हैं। अभी अपने देश में बेंगलुरु और दिल्ली में ऐसे केस हुए जहां लड़कों ने पत्नी के घर वालों के हस्तक्षेप के चलते आत्मह्त्या ही कर डाली। ऐसे ही लड़की के साथ भी होता है, जो अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं यहां किसी की आलोचना नहीं कर रही हूं, लेकिन मैं दोनों पक्षों की समा लोचना कर रहीं हूं। किसी को एक को टार्गेट करके उसको सूली पर चढ़ा कर अपना फैसला नहीं करना चाहिए। एक नए रिश्ते में जब कोई लड़का या लड़की बंधते हैं तो उनको उस में ढलने में समय लगता है। जब दोनों का आपसी तालमेल हो जाएगा तो मम्मास बॉय और मम्मास गर्ल जीवन साथी बन पाएंगे। आजकल कोई बाल विवाह तो होते नहीं कि बच्चियों को कोई अक्ल नहीं है और उन्हें कदम कदम पर मार्गदर्शन की जरूरत पड़े। हां एक बात तो जरूर है न गलत किजिए न ही गलत सहिए। हम सभी अपनी अपनी मम्मास बॉय और गर्ल हैं।

