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भ्रष्टाचार व्यापक समस्या

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किसी भी लोकतांत्रिक समाज में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील और दूरगामी परिणामों वाला विषय होता है। हाल के समय में भारत में यह बहस तेज हुई कि क्या आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं, जैसे भ्रष्टाचार, मुकदमों की लंबित संख्या और न्यायाधीशों की कमी के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। यह विवाद तब सामने आया जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ाहमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका शीर्षक से एक संशोधित अध्याय शामिल किया गया। इस अध्याय की प्रस्तुति को लेकर देश के प्रधान न्यायाधीश ने आपत्ति जताई और संकेत दिया कि यह विषय जिस तरह से रखा गया है, वह एक सोची-समझी कोशिश भी हो सकती है। यद्यपि यह बहस जारी है कि बच्चों को किस उम्र में किस प्रकार की नागरिक शिक्षा दी जानी चाहिए, लेकिन एक बात स्पष्ट है, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों और घटनाओं को केवल पाठ्यपुस्तक से हटाकर सार्वजनिक चर्चा से समाप्त नहीं किया जा सकता।

न्यायपालिका किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में अत्यंत सम्मानित और विशिष्ट स्थान रखती है। वह संविधान की संरक्षक होती है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है और राज्य तथा नागरिकों के बीच उत्पन्न विवादों का अंतिम निर्णय देती है।

इसलिए न्यायपालिका की निष्पक्षता और ईमानदारी पर जनता का विश्वास लोकतंत्र की स्थिरता की आधारशिला है। कार्यपालिका और विधायिका जहां राजनीतिक वातावरण में कार्य करती हैं और चुनावी जवाबदेही के अधीन रहती हैं, वहीं न्यायपालिका की वैधता उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और नैतिक गरिमा पर टिकी होती है। यही कारण है कि यदि न्यायपालिका के किसी सदस्य पर भी अनैतिक आचरण का आरोप लगता है, तो उसका प्रभाव व्यापक और गहरा होता है। हाल के वर्षों में कुछ मामलों ने न्यायिक जवाबदेही को लेकर असहज प्रश्न खड़े किए हैं। विशेष रूप से दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा से जुड़ा विवाद काफी चर्चा में रहा। समाचारों में यह आरोप सामने आया कि उनके निवास से करोड़ों रुपये के आंशिक रूप से जले हुए नोट बरामद हुए। यद्यपि उनके विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया आरंभ किए जाने की बात कही गई, परंतु अभी तक वह अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी है और वे पद पर बने हुए हैं। यह मामला ही नहीं, बल्कि अतीत में अन्य न्यायाधीशों से जुड़े आरोप भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि गंभीर आरोपों की जांच और दंड की प्रक्रिया कितनी जटिल और लंबी है।

यह कहना गलत होगा कि भ्रष्टाचार केवल न्यायपालिका तक सीमित है। भ्रष्टाचार एक व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक समस्या है, जो शासन के सभी अंगों विधायिका, कार्यपालिका और प्रशासनिक संस्थाओं को प्रभावित करती है। फिर भी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रभाव विशेष रूप से घातक होता है। यदि लोगों को यह विश्वास हो जाए कि न्याय खरीदा या प्रभावित किया जा सकता है, तो कानून का शासन कमजोर पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में लोग न्याय पाने के लिए वैधानिक रास्तों के बजाय अन्य उपायों का सहारा लेने लगते हैं, जिससे सामाजिक अस्थिरता और अराजकता बढ़ सकती है।

भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सामने एक और बड़ी चुनौती लंबित मामलों का भारी बोझ है। विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित हैं। न्यायाधीशों की कमी, अपर्याप्त आधारभूत संरचना, जटिल प्रक्रियाएं और बार-बार स्थगन, ये सभी कारण मिलकर समस्या को और गंभीर बनाते हैं। शैक्षिक पाठ्यक्रम से जुड़ा विवाद एक गहरे दार्शनिक प्रश्न को जन्म देता है, क्या बच्चों को संस्थागत कमजोरियों से परिचित कराया जाना चाहिए, या उन्हें केवल आदर्श सिद्धांतों तक सीमित रखा जाना चाहिए? एक पक्ष यह मानता है कि कम उम्र में ऐसी जानकारी देने से संस्थाओं के प्रति सम्मान घट सकता है। दूसरा पक्ष कहता है कि लोकतंत्र में सजग और जागरूक नागरिक तैयार करना आवश्यक है। यदि बच्चों को संतुलित और तथ्यपूर्ण जानकारी दी जाए, जिसमें समस्याओं के साथ-साथ सुधार की प्रक्रियाओं और ईमानदार उदाहरणों का भी उल्लेख हो—तो यह शिक्षा नकारात्मकता नहीं, बल्कि जागरूकता पैदा करेगी। यह भी सच है कि भारतीय न्यायपालिका ने अनेक ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से साहस और स्वतंत्रता का परिचय दिया है। अदालतों ने मौलिक अधिकारों का विस्तार किया, पर्यावरण संरक्षण को मजबूती दी, लैंगिक समानता को प्रोत्साहित किया और कई संवेदनशील मामलों में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की। अनेक न्यायाधीशों ने निष्कलंक सेवा और उच्च नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसलिए भ्रष्टाचार पर चर्चा करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कुछ आरोपों के आधार पर पूरी संस्था को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।

समय-समय पर न्यायिक सुधारों के प्रस्ताव भी सामने आते रहे हैं। इनमें एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र की स्थापना, संपत्ति की पारदर्शी घोषणा, आंतरिक आचार संहिता को सुदृढ़ करना, अदालतों का डिजिटलीकरण और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना शामिल हैं। ई-कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई और आॅनलाइन केस ट्रैकिंग जैसी तकनीकी पहलें पारदर्शिता बढ़ा सकती हैं और अनियमितताओं की संभावनाओं को कम कर सकती हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर भी बहस जारी है। किंतु हर सुधार में यह संतुलन बनाए रखना होगा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित न हो, साथ ही जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा संयमित, तथ्यों पर आधारित और सुधार की भावना से प्रेरित होनी चाहिए। अतिरंजित आरोप या राजनीतिक हमला संस्था को कमजोर कर सकते हैं, जबकि मौन या इनकार से समस्या गहरी हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह अपनी कमजोरियों को स्वीकार करे और उन्हें सुधारने का साहस दिखाए। पाठ्यपुस्तक से जुड़े विवाद के मूल में यही द्वंद्व है, संस्था की प्रतिष्ठा बनाम पारदर्शिता।

यदि शैक्षिक सामग्री से समस्याओं का उल्लेख हटा भी दिया जाए, तो वास्तविकता नहीं बदलती। बल्कि जागरूक नागरिक ही भविष्य में सुधार की राह प्रशस्त कर सकते हैं। नागरिक शिक्षा का उद्देश्य प्रचार नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझ विकसित करना होना चाहिए।

वास्तव में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न इसलिए गंभीर है क्योंकि यह न्याय की नैतिक नींव को हिला सकता है। जवाबदेही की प्रक्रियाओं को मजबूत करना, लंबित मामलों को कम करना और न्यायाधीशों की कमी दूर करना अत्यंत आवश्यक है। सबसे बढ़कर, जनता का विश्वास बनाए रखना ही सर्वोपरि है। लोकतंत्र अपनी कमियों को स्वीकार करने से कमजोर नहीं होता; वह तब कमजोर होता है जब वह उन्हें छिपाने का प्रयास करता है।

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