चतुर सुजान ने जमाना देखा है। उनके सर के सफेद बाल यूं ही सफेद नहीं हुए हैं। उन्हें जिंदगी का अच्छा खासा अनुभव है और उन्होंने काफी हद तक जिंदगी को निकट से भी देखा है। आमतौर पर वह बिना भूमिका बनाएं ‘टू द पॉइंट’ बात किया करते हैं। हालांकि उनकी बात एक नजर में किसी को नागवार गुजर सकती है। लेकिन जिंदगी में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब उनके द्वारा कही गई बात शिद्दत से याद आती है। चाहे वक्ती तौर पर हम उनसे सहमत हो या नहीं, लेकिन जब जीवन में औरों से सामना होता है और बदलते जमाने के बदलते रंग ढंग से पाला पड़ता है, रह रहकर उनकी हर एक बात याद आती है जिन्हें हम किसी जमाने में दिलजला समझते थे।
अरसे बाद आज उनसे मुलाकात हो गई। उनसे हर मुलाकात मुझे जिंदगी का नया अनुभव दे जाती थी। आज भी ऐसा ही हुआ। इसके पहले कि मैं शिष्टाचार की परंपरा का पालन करूं, उन्होंने बहुत कुछ दार्शनिक नुमा मुद्रा बनाते हुए कहना प्रारंभ किया। वे बोले, ‘आजकल के जमाने में खामखां खून जलाने का कोई मतलब ही नहीं है। इधर-उधर चाहे जिधर नजरें उठा कर देखें, हर तरफ तमाम तरह की विसंगतियां ही विसंगतियां नजर आती है।’ उनके इस कथन की सत्यता को वही शख्सियत परख सकती थी, जिसने आजकल के जमाने को देखा हो। कहीं कोई गहरी चोट खाएं बैठा हो।
आमतौर पर ऐसा होता है कि एक समय में कोई बात हमारी समझ में नहीं आती। लेकिन वह बात जिसकी समझ में आ गई होती है, उसके कथन को नई पीढ़ी गंभीरता से नहीं लिया करती। लेकिन नई पीढ़ी भी जैसे-जैसे पुरानी पीढ़ी में शुमार होने की प्रक्रिया में आगे बढ़ती है, वैसे वैसे उसकी समझ में वह बात आने लगती है जो किसी दौर में उसे समझ नहीं आई थी। दरअसल चतुर सुजान चूंकि जमाने को समझे हुए थे, इसलिए उनकी समझ आज चाहे और किसी के लिए समझ से परे हो, लेकिन जिंदगी में कभी-कभी तो समझ में आ ही जाती है। आदमी को अनुभवियों के अनुभव का लाभ उठाना चाहिए। इससे जिंदगी में ठोकर खाने की संभावनाएं कम से कमतर होती चली जाती है।
यही कारण है कि मैंने उनकी बिना किसी संदर्भ या प्रसंग के कही गई बात पर ठप्पा लगाते हुए कह दिया कि ‘यह सचमुच लाख रुपए की बात कही आपने।’ इस पर उन्होंने आगे कहा कि ‘क्या तो धर्म, राजनीति और सामाजिक परिवेश, और क्या तो अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित दिग्गजों का आचरण और व्यवहार, अब किस-किस को गिनाएं और किस-किस को नजरअंदाज करें, हर तरफ गड़बड़ ही गड़बड़ है।’ मैं मन ही मन समझ रहा था कि चतुर सुजान जो कुछ कह रहे हैं, वह आजकल के दौर का कटु सत्य है। लेकिन लोक लाज और व्यवहार के चलते आजकल के दौर में बुरे को बुरा कह देना बिना खाएं पिए गिलास फोड़ने के समान है। इसलिए बेहतर यही है कि जमाना जैसा है, उसे वैसा ही रहने दिया जाए, लेकिन हम चोट खाने के पहले सतर्कता बरत लेवें, तो आने वाली पीढ़ी को बिना चोट खाएं ज्ञान दे सकते हैं।

