सही कहा है, दूसरों को उपदेश देने वाले एक से एक नायाब माहिर लोग मिल जाएंगे। दूसरों को बैंगन परहेज में बताएंगे और खुद रोज उसका भुर्ता बना कर खाएंगे। मुझे उपदेश दिया गया कि मैं ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ पर व्यंग्य रचना लिखूं, लेकिन मैं कहता हूं कि वे खुद लिखकर बताएं कि उपदेशियों पर व्यंग्य कैसे लिखा जाता है। अब जनाब मेरी तो मजबूरी है सो लिखना पड़ेगा, परंतु ऐसा विषय नहीं चुनना चाहिए जिसमें लिखने पर पसीना छूट जाए। लेकिन कहते हैं न कि श्रम व्यर्थ नहीं जाता तथा उसके बदले कुछ न कुछ अवश्य मिलता है। ईश्वर को शायद यही मंजूर हो कि मुझे यह व्यंग्य लिखने पर कुछ न कुछ हासिल हो, इसलिए लिखनी पड़ रही है यह व्यंग्य रचना। कई मामलों में सलाह की आवश्यकता होती नहीं लेकिन उपदेशकों को कौन रोक सकता है, वे अपनी सलाहगिरी का एकालाप जारी रखेंगे और आपको भुगतनी होगी उनकी शातिराना सलाह।
कई बार मन करता है कि किसी को कोई सीख दूं, लेकिन मुझे बया वाली बात याद आ जाती है। बया ने कोई सीख बंदर को दी बताई, प्रतिफल में उसे अपना घौंसला उजड़वाना पड़ा। यह सोचकर ठंडा हूं अन्यथा उपदेशों का भंडार भरा पड़ा है मेरे भीतर भी। चाहे वह कार्य मैं स्वयं नहीं करता, लेकिन दूसरों को उपदेशों की घुट्टी पिलाकर चाहता हूं कि वह मेरी बतायी सीख पर चले। आदर्शों का पालन करे तथा अपना जीवन बेहतर और खुशहाल बनाए। भले मेरा जीवन नरक चौदह के सन्निकट है।
अब मैं भी क्या करूं? मैं अपनी आदतों से बाज नहीं आता तथा उपदेशों का राग बिल बिलावत गाता रहता हूं बिला वजह। मेरी दृष्टि में वजह तो यह है कि मैं अपने देश, समाज व परिवार को एक आदर्श स्थिति में देखना चाहता हूं तथा मुझे अपने उपदेशों पर पक्का भरोसा है कि मैं जो उपदेश-सीख देऊंगा, वह सामने वाले के लिए काफी मुफीद है। इसलिए मेरा प्रयत्न तो अपने उपदेशों से अधिक से अधिक खुशहाली लाना है। हालाँकि मेरी खुशी इतनी सी है कि मेरी सीख को कोई सुन भर लें, फिर वह उस पर अमल करे या न करे, लेकिन सुन भर लेने से ही मुझे आत्मिक तोष और शान्ति प्राप्त होती है।
भारतवर्ष में जनसेवकों की कमी नहीं है, आये दिन कहते रहते हैं कि साक्षर होना जरूरी है, ईमानदारी से रहना चाहिए, भ्रष्टाचार नहीं करना चाहिए, देश को प्राणों से भी प्यासा मानना चाहिए और दूसरों को सहयोग करना चाहिए। अब इन कसौटियों पर जनसेवक नेताजी को उतारा जाए तो खुद निरक्षर मिलेंगे, ईमानदार की जगह बेईमान मिलेंगे। रिश्वत, कमीशन खाएंगे और कुछ नहीं तो घोटाला करेंगे। अब पूछिये कि भैया घोटाला करने की आवश्यकता क्या थी ? तो जवाब कुछ नहीं, बस मौन धारण कर लेंगे। इसलिए जनसेवक नेताजी से क्या सीख लें-मेरी समझ में तो कुछ आ नहीं रहा। इतना जरूर है कि समाज में इनके झूठ का असर होता है तथा लोग आश्वासन व बहकावे में आकर इनकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं।

