
भारतीय फोटो पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल अपने काम के लिए नहीं बल्कि अपनी दृष्टि के लिए याद किए जाते हैं। रघु राय उन्हीं विरले नामों में शामिल थे। 18 दिसंबर 1942 को जन्मे और 26 अप्रैल 2026 को दिल्ली में 83 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहने वाले रघु राय ने कैमरे के जरिए भारत को जिस गहराई, संवेदनशीलता और ईमानदारी से देखा, वह उन्हें महान चश्मदीद बनाता है। उनका जाना केवल एक फोटोग्राफर का जाना नहीं है बल्कि एक ऐसे साक्षी का विदा होना है जिसने छह दशकों तक इस देश के बदलते चेहरे को अपनी आंखों और अपने लेंस में दर्ज किया।
रघु राय का जन्म ब्रिटिश भारत के झंग (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की लेकिन नियति ने उन्हें एक अलग रास्ते के लिए चुना था। 1965 में, जब उन्होंने 23 वर्ष की उम्र में फोटोग्राफी की शुरुआत की, तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि यह शौक एक दिन उन्हें विश्व फोटोग्राफी के शिखर तक ले जाएगा। उनके बड़े भाई एस. पॉल, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित फोटोग्राफर थे, उनके प्रेरणास्रोत बने। शुरूआती दिनों में एक साधारण-सी तस्वीर एक गांव में खड़े गधे की जब लंदन के टाइम्स में प्रकाशित हुई तो यह उनके लिए केवल एक उपलब्धि नहीं बल्कि एक संकेत था कि उनकी दृष्टि में कुछ अलग है।
1966 में वे दिल्ली के प्रतिष्ठित अखबार द स्टेट्समैन से जुड़ गए और जल्द ही उसके चीफ फोटोग्राफर बन गए। यहां से उनके करियर ने एक नई दिशा पकड़ी। 1976 तक उन्होंने इस अखबार के लिए काम किया और इसके बाद कोलकाता की संडे मैगजीन में पिक्चर एडिटर के रूप में अपनी भूमिका निभाई। 1982 से 1991 तक इंडिया टुडे से जुड़े रहते हुए उन्होंने भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन पर कई यादगार फोटो निबंध तैयार किए जो आज भी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का विषय हैं।
रघु राय की प्रतिभा को वैश्विक पहचान तब मिली जब विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसों ने उनकी प्रदर्शनी देखकर उन्हें सराहा और प्रतिष्ठित संस्था मैग्नम फोटोज के लिए नामांकित किया। 1977 में वे इसके सदस्य बने। भारत से ऐसा करने वाले पहले फोटोग्राफर थे । यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी बल्कि भारतीय फोटोग्राफी को विश्व मंच पर स्थापित करने वाला ऐतिहासिक क्षण था। रघु राय का कैमरा केवल घटनाओं को नहीं बल्कि उनके भीतर छिपी संवेदनाओं को पकड़ता था। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने शरणार्थियों की पीड़ा युद्ध की विभीषिका और मानवता के संघर्ष को जिस तरह से कैद किया, वह आज भी दिल को झकझोर देता है। इसी काम के लिए उन्हें 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले फोटोग्राफर थे।
लेकिन उनकी पहचान को सबसे गहरी और स्थायी छाप मिली भोपाल गैस त्रासदी की कवरेज से। उस भयावह त्रासदी में उनकी खींची गई तस्वीरें विशेषकर मिट्टी में आधा दबे एक बच्चे का चेहरा, आज भी दुनिया की सबसे मार्मिक छवियों में गिनी जाती हैं। यह केवल एक फोटो नहीं बल्कि कॉपोर्रेट लापरवाही और मानवीय त्रासदी का जीवंत दस्तावेज बन गई। उनकी इस लंबी रिपोर्टिंग ने बाद में एक्सपोजर:ए कॉरपोरेट क्राइम जैसी महत्वपूर्ण कृति को जन्म दिया, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटना की सच्चाई को सामने रखा।
रघु राय ने केवल त्रासदियों को ही नहीं बल्कि जीवन के हर रंग को अपने कैमरे में उतारा। उन्होंने मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, और दलाई लामा जैसी महान हस्तियों के ऐसे चित्र लिए जो केवल पोर्ट्रेट नहीं बल्कि व्यक्तित्व की गहराई को उजागर करने वाले दस्तावेज बन गए। उनके कैमरे ने दिल्ली की हलचल कोलकाता की भीड़, खजुराहो की मूर्तिकला, ताजमहल की शाश्वत सुंदरता और सिख समुदाय की जीवंतता को भी उतनी ही संवेदनशीलता से दर्ज किया। उनकी फोटोग्राफी की सबसे बड़ी विशेषता थी ‘क्षण की कविता’। वे कहा करते थे कि फोटोग्राफी केवल देखना नहीं, बल्कि महसूस करना है। यह एक प्रकार का दर्शन है जिसमें फोटोग्राफर को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उस क्षण में उपस्थित होना पड़ता है। यही कारण है कि उनकी तस्वीरें स्थिर होकर भी गतिशील लगती हैं। वे बोलती हैं, सवाल करती हैं और कभी-कभी हमें असहज भी करती हैं।
उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। 1992 में अमेरिका में फोटोग्राफर आॅफ द ईयर, 2017 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2019 में एकेडेमी डेस बो आर्ट्स फोटोग्राफी अवॉर्ड। उनकी तस्वीरें टाइम मैगजीन लाइफ मैगजीन न्यूयॉर्क टाइम्स और न्यूजवीक जैसी विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। विश्व प्रेस फोटो और यूनेस्को जैसे मंचों पर जूरी सदस्य के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई।

