झालमुड़ी और जनता का नाता पुराना है। एक तरफ वह लाई है जो अपनी खोखली काया के साथ पसंद किया जाता है, और दूसरी तरफ वह जनता है जिसे हर पांच साल में झालमुड़ी की तरह के मिर्च-मसाला और शोर से भर दिया जाता है। झालमुड़ी सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि इस देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति का सबसे सटीक रूपक है।
लाई की अपनी कोई बिसात नहीं होती। वह हल्की है, सफेद है और बिना किसी सहारे के बेस्वाद है। ठीक वैसे ही, जैसे एक आम नागरिक, जो अकेला खड़ा हो तो उसकी आवाज में कोई वजन नहीं होता। लेकिन जैसे ही चुनावी मौसम की कढ़ाई चढ़ती है, इस लाई को झालमुड़ी जैसा स्वादिष्ट बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें तरह-तरह के मसाले डाले जाते हैं—जाति का नमक, धर्म की मिर्च, क्षेत्रवाद का सरसों तेल और वादों की बारीक कतरी हुई प्याज।
झालमुड़ी बनाने वाला नेता बड़ी चतुराई से एक टीन के डिब्बे में मुड़ी और इन तमाम मसालों को डालता है और फिर शुरू होता है उसे हिलाने का काम। डिब्बे के अंदर लाई आपस में टकराती है, शोर मचता है, और ऊपर से देखने वाली जनता को लगता है कि कुछ बहुत क्रांतिकारी पक रहा है। डिब्बे की खड़खड़ाहट जितनी तेज होती है, लाई उतनी ही भ्रमित होती जाती है। उसे लगता है कि वह मसालों के साथ मिलकर पावरफुल हो रही है, जबकि हकीकत में उसे सिर्फ एक स्वाद देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि अंत में उसे चबाया जा सके।
झालमुड़ी की सबसे बड़ी खूबी उसका कुरकुरापन है। जब तक वह ताजी है, तब तक उसमें शोर है। राजनीति भी इसी शोर पर टिकी है। जैसे ही लाई में तेल और चटनी का असर गहराता है, वह नर्म पड़ने लगती है। लोकतंत्र में जनता का भी यही हाल है। आंदोलन के समय वह कड़क होती है, लेकिन जैसे ही आश्वासनों की चाशनी और मुफ्त की रेवड़ियों का तेल उस पर पड़ता है, वह सिथिल हो जाती है। फिर वह शांत हो चुकी उस लाई जैसी हो जाती है जिसे गले से उतारना तो आसान है, पर जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता। विडंबना देखिए, झालमुड़ी हमेशा रद्दी कागज के ठोंगे में परोसी जाती है। जिस कागज पर कभी विकास की खबरें छपी थीं, आज उसी पर तेल के धब्बे लगे हैं और जनता उसमें फंसी हुई स्वाद ढूंढ रही है।
अंत में, जब झालमुड़ी खत्म होती है, तो ठोंगे के कोने में थोड़ा सा मसाला और सरसों का तेल बच जाता है। वह तीखापन सीधे जुबान पर लगता है और आंखों में पानी ला देता है। जनता भी पांच साल बाद उसी तीखेपन को महसूस करती है। वह सोचती है कि स्वाद तो आया, पर पेट नहीं भरा। अगली बार फिर किसी चुनावी जनसभा पर डिब्बा खड़केगा, फिर कोई नया मसाला डालेगा, और लाई बनी जनता फिर से उछलने को तैयार हो जाएगी। क्योंकि लाई की नियति ही यही है—हवा से फूलना और स्वाद के लिए कुचले जाना। यही झालमुड़ी कथा की व्यथा है।

