Saturday, March 28, 2026
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मातृभाषा संस्कृति की संवाहक: डीपी सिंह

जनवाणी ब्यूरो |

बिनौली: तेड़ा के आर्य विद्यालय इंटर कॉलेज में रविवार को शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास संस्था के तत्वाधान में आराधना शुक्ला मुख्य सचिव माध्यमिक शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश शासन के आदेश के अनुपालन में सर्वेश कुमार जिला विद्यालय निरीक्षक बागपत के दिशा निर्देशन में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया।

इस अवसर पर प्रधानाचार्य डीपी सिंह ने बताया कि वर्ष 1948 में पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। उस समय आज का बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा हुआ करता था। 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्वविद्यालय के बच्चों ने पाकिस्तान सरकार की भाषाई नीति का कड़ा विरोध किया और मातृ भाषा बांग्ला की रक्षा के लिए जबरदस्त प्रदर्शन किए।

अनेकों छात्र गोलियों का शिकार हुए। 1956 में पाकिस्तान सरकार ने बांग्ला भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया। 1952 में भाषा आंदोलन के लिए शहीद होने वाले युवाओं की स्मृति में 21 फरवरी 1999 को राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा यूनेस्को द्वारा की गई।  पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने अपने अनुभव के आधार पर कहा था कि मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी।

मातृ भाषा किसी भी व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक है। कुछ लोग विदेशी भाषा में कुछ भी बोलते रहें लेकिन यह यूरोपीय जूठन की जुगाली ही होगी। मौलिक लेखन मातृभाषा में ही संभव है। एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि जो बच्चे मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं वे अधिक मेधावी होते हैं। विनोद कुमार आर्य ने कहा कि मातृ भाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती।

मनोज कुमार प्रवक्ता ने मातृभाषा का महत्व बताते हुए कहा कि गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता। इसलिए अन्य भाषा सीखे लेकिन मातृभाषा के महत्व को जो समझे इसका कोई विकल्प नहीं है। अनीता रानी, भागमल, प्रताप, मनीष, अनिरुद्ध, अरविंद, सोनू, लेखराज, पलटू राम आदि उपस्थित रहे।

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