- मजबूरी की हालत में तोड़े गए रोजे पर नहीं होता कफ्फारा
जनवाणी संवाददाता |
देवबंद: रमजान के दिनों में जिंदगी खतरे में पड़ जाए तो रोजा छोडने की गुंजाइश है। उलमा कहते है कि यदि रोजा रखने के बाद कोई शख्स अचानक इतना सख्त बीमार हो गया कि रोजा न तोडने पर उसकी बीमारी बढ़ जाएगी या फिर जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। तो ऐसी सूरत में रोजा तोडना जायज है।
तंजीम अब्नाए दारुल उलूम देवबंद के अध्यक्ष मुफ्ती यादे इलाही कासमी ने इस्लामी पुस्तक फतावा-ए-आलमगीरी और आहसनुल फतावा का हवाला देते हुए बताया कि अगर रोजा रखने के बाद अचानक शुगर बढ़ जाए या अचानक पेट में खतरनाक दर्द उठ जाए और बर्दाश्त के काबिल न रहे। या फिर ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो जाए जिसका फौरन इलाज कराना जरूरी है और फौरन इलाज न कराने की सूरत में रोग बढ़ जाएगा।
तो ऐसी सूरत में रोजा तोडना जायज है। मौलाना ने यह भी बताया कि अगर रोजा रखने के बाद किसी को जबरदस्ती रोजा तोडने पर मजबूर किया गया और उसे यह यकीन है कि अगर उसने रोजा नहीं तोड़ा तो धमकी देने वाले उसे जान से मार सकते हैं। या उसका कोई अंग काट सकते हैं। या बहुत ज्यादा मारपीट कर सकते हैं।
तो ऐसी सूरत में भी रोजा तोडने की इजाजत है। मौलाना ने यह भी कहा कि जिन सूरतों में रोजा तोड़ देना जायज है उसमें यह भी जरूरी है कि तबीयत ठीक होने के बाद यानी सेहतमंद होने के बाद जरूर रोजा रखा जाए। एक रोजे के बदले एक ही रोजा रखा जाएगा। मजबूरी की हालत में तोड़े गए रोजे पर कफ्फारा नहीं होता है।

