Sunday, June 7, 2026
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मुआवजे में हो पारदर्शिता

SAMVAD


DR SHRINATH SAHAYAसुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल करते हुए कहा है कि देश में कोरोना से हुई हर मौत के मामले में परिजनों को 50 हजार का मुआवजा मिलेगा। साथ ही कहा गया है कि ये रकम राज्य यानी स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड की तरफ से दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एनडीएमए ने मुआवजे को लेर गाइडलाइंस बनाई है। बता दें कि देश में अब तक कोरोना से 3.98 लाख लोग जान गंवा चुके हैं। मुआवजे की राशि राज्य आपदा प्रबंधन कोष से दी जाएगी। मृत्यु प्रमाणपत्र में कोरोना का उल्लेख न होने से लाखों प्रभावित परिवार मुआवजे से वंचित हो गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर रोष व्यक्त किया था कि मृत्यु प्रमाणपत्र में कोरोना का उल्लेख करवाने में देरी से लोग हलाकान हो रहे हैं। विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार ने कहा था कि वो हर मृतक के परिजन को चार-चार लाख रुपये का मुआवजा नहीं दे सकती है।

सरकार की इस दलील से सुप्रीम कोर्ट ने भी सहमति जताई। साथ ही कहा कि वो खुद ही ऐसा तंत्र बनाए जिससे मृतक के परिजनों को सम्मानजनक रकम जरूर मिले। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर अपने हलफनामे में कहा था कि आपदा कानून के दायरे में भूकंप, बाढ़ जैसी 12 तरह की प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। इन आपदाओं में किसी की मौत पर राज्य आपदा राहत कोष से 4 लाख रुपये का मुआवजा सुनिश्चित है, लेकिन कोरोना महामारी उससे अलग है। तब सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार की यह दलील स्वीकार की थी। उसने कहा था कि कोविड मृतकों के परिजनों को कितनी रकम दी जाए, यह रकम सरकार खुद तय कर ले, लेकिन मुआवजा जरूर दे।

सरकार ने बताया है कि ये मुआवजा उन लोगों को भी दिया जाएगा, जिनकी महामारी के दौरान राहत कार्यों में योगदान देते हुए कोरोना की वजह से मौत हुई है। केंद्र सरकार ने ये भी स्पष्ट किया है कि ये मुआवजा सिर्फ कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान हुई मौतों तक सीमित नहीं है। आगे आने वाली संभावित लहरों के दौरान होने वाली मौतों के दौरान भी इसका लाभ मिलेगा। एनडीएमए ने कोर्ट में कहा है कि कोविड-19 ऐसी आपदा है, जो अब तक खत्म नहीं हुई है। इससे मरने वाले लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वायरस के नए वेरिएंट्स और भविष्य में इसकी नई लहर को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। इस वजह से ये आकलन कर पाना अभी मुश्किल है कि इसके लिए और कितने फंड की जरूरत पड़ेगी।

दरअसल ये बहुत बड़ी विसंगति है कि कोरोना के इलाज हेतु भर्ती हुए मरीज की मौत पर सम्बंधित अस्पताल द्वारा मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं होने से मृतक के परिजन शासन द्वारा मिलने वाली किसी भी सहायता राशि से वंचित रह गए। जिन मरीजों को अस्पताल में कोरोना की दवाएं दी गर्इं और मृत्यु होने पर उनका अंतिम संस्कार भी कोरोना से मारे गये लोगों के लिए निर्धारित श्मशान भूमि में किया गया, उनके मृत्यु प्रमाणपत्र में भी तत्संबंधी उल्लेख नहीं किया जाना निश्चित तौर पर अव्वल दर्जे की संवेदनहीनता का परिचायक था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में काफी सख्त रुख अपनाते हुए कोरोना से हुई मृत्यु पर मुआवजा देने के लिए सरकार को बाध्य किया। हालांकि 50 हजार की राशि भी बेहद कम है। अनेक परिवार ऐसे हैं, जिनका लालन- पालन करने वाला कोरोना की बलि चढ़ गया। यद्यपि इस बारे में एक समस्या ये भी है कि बहुत बड़ी संख्या उन मृतकों की है जिन्होंने बीमार होने पर न तो कोरोना की जांच करवाई और न ही समुचित इलाज। ऐसे लोगों को कोरोना संक्रमित मानने में व्यवहारिक परेशानी सामने आना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे देश में सरकारी तंत्र लकीर का फकीर बनकर कार्य करता है।

बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के दबाव के बाद केंद्र सरकार ने जो शपथ पत्र पेश किया उससे थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन कोरोना संक्रमण से हुई मौत का प्रमाण पत्र हासिल करना भी आसान नहीं होगा क्योंकि जिस शासकीय अमले को इस काम की जिम्मेदारी दी जाएगी, उसमें कितनी मानवीयता है ये पक्के तौर पर कह पाना मुश्किल है। कोरोना की दूसरी लहर के चरमोत्कर्ष के दौरान जब प्रतिदिन हजारों लोग मारे जा रहे थे तब उनके अंतिम संस्कार में जिस तरह की घूसखोरी सुनने मिली वे अमानवीयता की पराकाष्ठा ही कही जाएगी। ये देखते हुए मुआवजे की समूची प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाना जरूरी होगा।

केंद्र सरकार तो राज्यों को पैसा देकर अपना पिंड छुड़ा लेगी परन्तु सरकारी अमला इस मुआवजे में भी घूस और कमीशन वसूलने में संकोच करेगा ये बात सोचना भी कठिन है। सबसे ज्यादा ध्यान रखने वाली बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र के बाद देश भर में कोरोना से हुई मौत के फर्जी प्रमाणपत्र बनाने का गोरखधंधा शुरू हो जाएगा। कोरोना से जुड़ा एक संवेदनशील विषय है चिकित्सा बीमा के दावों का भुगतान बीमा कंपनियों द्वारा न किया जाना। सरकार को इस बारे में भी गंभीरता के साथ सख्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि मोटी प्रीमियम वसूलने वाली सरकारी बीमा कम्पनियों तक ने मुसीबत के मारे पालिसी धारकों को धोखा दे दिया।

निजी अस्पतालों ने लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर भारी-भरकम अग्रिम राशि उन मरीजों से भी नगद में जमा करवाई जिनके पास नगदी रहित (कैश लेस) बीमा पालिसी थी। बाद में बीमा कंपनियों ने तरह-तरह के बहाने बनाते हुए उनके चिकित्सा खर्च का भुगतान करने से इंकार कर दिया। जबसे बीमा व्यवसाय में निजी क्षेत्र को इजाजत मिल गई है, तबसे दर्जनों नई कंपनियां आकर्षक योजनाओं का प्रलोभन देते हुए बाजार में आ टपकीं। उनकी तरफ से हुई बेईमानी तो अनपेक्षित नहीं थी किंतु सरकारी नियंत्रण वाली बीमा कंपनियों ने जिस तरह का अमानवीय दृष्टिकोण कोरोना काल में दिखाया वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

कोरोना से हुई मौतों पर प्रभावित परिवार को मुआवजा देने के साथ ही अस्पतालों में भर्ती होकर स्वस्थ हो गए बीमा धारकों के दावों के भुगतान की तरफ भी सरकार को ध्यान देना चाहिए। इस बारे में बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के साथ ही उपभोक्ता अदालतों में लाखों शिकायतें लंबित हैं। इनके जल्द निपटारे के बारे में भी समुचित व्यवस्था बनानी होगी, क्योंकि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की उसे ये ध्यान रखना चाहिए कि न्यायपालिका का काम दैनंदिन प्रशासन चलाना नहीं होता परंतु सरकारी उदासीनता उसे इस बात के लिए बाध्य करती है। मरने वाले के परिजनों को मिलने वाले वाजिब मुआवजे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को व्यवस्था देना पड़े ये सरकार के लिए आत्मविश्लेषण का मुद्दा होना चाहिए। आम आदमी की कमर कोरोना की वजह से टूट चुकी है। ऐसे में अगर सरकारी अमला कोरोना से मौत पर मिलने वाले मुआवजे और बीमा दावों का शीघ्र निस्तारण करेगा तो आम आदमी को बड़ी राहत पहुंचेगी।


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