- 2002 के बाद नहीं जीत पाए विधानसभा चुनाव
- वीरेंद्र सिंह छह बार रहे कांधला सीट से विधायक
- वर्ष 2007 में कांधला की जगह शामली बनी विस सीट
राजपाल पारवा |
शामली: गुर्जर क्षत्रप वीरेंद्र सिंह की राजनीति में वैसे तो आज भी तूती बोलती है लेकिन छह बार विधायक रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री वीरेंद्र सिंह 2002 के बाद जनता के बीच से कोई चुनाव सीधे नहीं जीत पाए। उनका जनता के बीच चुनाव का राजनीति का खेल 2007 में नए परिसीमन में कांधला की जगह शामली विधानसभा सीट बनने से बिगड़ गया।
विधानसभा सीटों के साथ-साथ लोकसभा सीटों का नए सिरे से परिसीमन होने पर राजनीतिक भूगोल ही बदल गया। जिससे वीरेंद्र सिंह एक अदद जीत के लिए तरस गए। हालांकि उनको सपा और भाजपा ने एमएलसी भी बनाया, लेकिन चुनाव जीतने का अभी भी उनको इंतजार है।
कांधला विधानसभा सीट पहली बार 1967 में अस्तित्व में आई। इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर वीरेंद्र वर्मा ने सीपीआई के विजयपाल बिराल को पराजित किया। उसके दो साल बाद कांधला सीट पर जसाला परिवार का पदार्पण हुआ। बीकेडी की लहर में 1969 में अजब सिंह जसाला ने कांग्रेस के शफकत जंग को हराया।
1974 में फिर से बीकेडी के मूलचंद ने कांधला सीट पर कब्जा जमाया लेकिन देश में आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में अजब सिंह ने जनता पार्टी का झंडा थामा और कांग्रेस के मोहम्मद रईस को हराकर दूसरी बार विधानसभा में दस्तक दी। अस्वस्थता के चलते अजब सिंह राजनीति से दूर होते चले गए।
ऐसे में उनके नजदीक रखकर राजनीति की बारीकियां सीख रहे उनके भतीजे वीरेंद्र सिंह ने 1980 में जनता सोशलिस्ट के टिकट पर पहली बार कांधला विधानसभा सीट से चुनाव रण में उतरने का ऐलान किया। पहली बार में ही उन्होंने कांग्रेस के चमन सिंह को हराकर विधानसभा में दस्तक दी।
जाट-गुर्जर का कार्ड खेलकर वीरेंद्र सिंह 1985 में लोकदल के टिकट पर फिर से विधायक बनने में सफल हुए। अबकी बार उन्होंने कांग्रेस के विजयपाल सिंह को हराया। गुर्जर क्षत्रप ने 1989 में जनता दल के टिकट पर जीत का सिलसिला जारी रखते हुए हैट्रिक लगाकर विधानसभा में दस्तक दी।
हालांकि कांग्रेस उनके सामने पूर्व उप मुख्यमंत्री नारायण सिंह के पुत्र संजय चौहान को चुनाव मैदान में उतारा था लेकिन वीरेंद्र सिंह ने 30 हजार से अधिक मतों के भारी अंतर से संजय चौहान को पराजित कर दिया। फिर, दो साल बाद 1991 में हुए चुनाव में जनता दल के टिकट पर वीरेंद्र सिंह ने भाजपा के महाराज सिंंह को हराया।
इस तरह से 11 वर्षों में गुर्जर क्षत्रप ने कांधला सीट से चार बार विधानसभा में एंट्री की। लेकिन 1993 में राम लहर में भाजपा के रतनपाल पंवार के सामने तीसरी बार जनता दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे वीरेंद्र सिंह को पराजय सामना करना पड़ा।
इसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने रामकुमार सहरावत को भगवा थमाकर गुर्जर क्षत्रप के सामने चुनाव मैदान में उतारा लेकिन सहरावत को हार का सामना करना पड़ा। वीरेंद्र सिंह ने यह चुनाव भारतीय किसान कामगार पार्टी के बैनर पर लड़ा था। सपा ने 2002 के चुनाव में जब रतनापाल पंवार को साइकिल की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी सौंपी तो वीरेंद्र सिंह ने रालोद का हैंडपंप चलाकर साइकिल के रास्ते में पानी भरकर कीचड़ पैदाकर दिया जिससे साइकिल उसमें फंस गई।
उसके बाद बसपा ने बलबीर सिंह किवाना को 2007 के चुनाव में वीरेंद्र सिंह के सामने जाट-दलित कार्ड खेला जिसके जाल से निकलना गुर्जर क्षत्रप के लिए मुश्किल हो गया। तब राजनीति के नौसिखिए बलबीर सिंह किवाना से हारने के बाद मानो वीरेंद्र सिंह का राजनीतिक पहिया ट्रैक से फिसल गया। उसके बाद 2012 के विधनसभा में रालोद-कांग्रेस के संयुक्त प्रत्याशी पंकज मलिक ने सपा के वीरेंद्र सिंह को हरा दिया।
साथ ही, कांग्रेस ने 45 साल के लंबे अंतराल के बाद इस सीट पर कब्जा किया। हालांकि 2012 में प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर करीब उप्र गन्ना एवं बीज विकास निगम का चेयरमैन बनाकर लालबत्ती दी गई। 2017 में सपा ने उनके पुत्र मनीष चौहान को शामली विधानसभा सीट पर प्रत्याशी बनाया लेकिन कांग्रेस से गठबंधन होने पर शामली सीट कांग्रेस के कोटे में चली गई। कांगे्रस ने पंकज मलिक में प्रत्याशी बनाया तो मनीष चौहान ने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और 31 हजार मत प्राप्त किए।

बाप-बेटे पर एक साथ रहीं लाल बत्तियां
वीरेंद्र सिंह के पुत्र मनीष चौहान को जिला पंचायत का पहला अध्यक्ष चुना गया और उनका लालबत्ती पर कब्जा हो गया। बेटे की जीत की गोटियां वीरेंद्र सिंह ने ही फिट की थी। एक समय ऐसा था जब गुर्जर क्षत्रप के परिवार में करीब सात माह तक पिता-पुत्र के पास लालबत्ती रही। क्योंकि वीरेंद्र सिंह उस समय गन्ना बीज निगम के चेयरमैन थे, और सपा सरकार ने उनको लाल बत्ती की गाड़ी देते हुए राज्यमंत्री का दिया था।
सपा-भाजपा ने बनाया एमएलसी
प्रदेश में 2002 में सपा-रालोद गठबंधन की सरकार बनी तो वीरेंद्र सिंह को चौधरी अजित सिंह की पहल पर कैबिनेट पशुधन मंत्री का दायित्व सौंपा गया। वे 2007 के विधानसभा चुनाव तक कैबिनेट मंत्री रहे। 2007 के विधानसभा चुनाव में वीरेंद्र सिंह बसपा के बलबीर सिंह किवाना हार गए। फिर, 2009 में सपा का दामन थाम लिया। 2012 के चुनाव में कांग्रेस के पंकज मलिक से हार गए लेकिन प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो अखिलेश यादव ने उनको 2014 में गन्ना बीज निगम का चेयरमैन बनाते हुए राज्यमंत्री का दर्जा दिया। कैराना विधानसभा सीट पर सपा प्रत्याशी नाहिद हसन की जीत के बाद सपा सुप्रीमो नाहिद हसन ने उनको एमएलसी भी बनाया। 2019 में वीरेंद्र सिंह ने भाजपा ज्वाइन कर ली। फिर, 2021 में भाजपा ने उनको एमएलसी बनाकर 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जरों को साधने की कोशिश की।
कांधला सीट पर जीत का सिलसिला
वर्ष——-विजेता————–पार्टी
1967—-वीरेंद्र वर्मा———–कांग्रेस
1969—-अजब सिंह जसाला—-बीकेडी
1974—-मूलचंद————–बीकेडी
1977—-अजब सिंह जसाला—-जनता पार्टी
1980—-वीरेंद्र सिंह———–जनता एस.
1985—-वीरेंद्र सिंह———–लोकदल
1989—-वीरेंद्र सिंह———–जनता दल
1991—-वीरेंद्र सिंह———–जनता दल
1993—-रतनपाल पंवार——-भाजपा
1996—-वीरेंद्र सिंह———–भाकिपा
2002—-वीरेंद्र सिंह———–रालोद
कांधला सीट बनीं शामली
2007——-बलबीर किवाना——बसपा
2012——-पंकज मलिक——-कांग्रेस
2017——-तेजेंद्र निर्वाल——-भाजपा

