Sunday, April 12, 2026
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लोककल्याणकारी राज्य की वापसी के संकेत

 

Nazariya 20


Dr. Snahveer Pundeerराजस्थान की अशोक गहलोत सरकार द्वारा बजट सत्र में राजस्थान के कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू कर दिया गया है। यह बहुप्रतीक्षित फैसला पूरे देश की राजनीति का रुख बदलने वाला हो सकता है। लम्बे समय से पूरे देश में कर्मचारियों द्वारा नेशनल पेंशन स्कीम के विरुद्ध आन्दोलन प्रदर्शन करके पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू किये जाने की मांग की जाती रही है, लेकिन सरकारों ने इसे लागू करने में हमेशा असमर्थता जताई है।
ज्ञातव्य है कि केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने आजादी के बाद से कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद जीवन यापन के लिए मिलने वाली पेंशन व्यवस्था को धन की कमी का हवाला देते हुए सन 2004 के बाद नियुक्त हुए सभी कार्मिकों के लिए बंद करने का निर्णय लिया था। देश में केवल सेना कार्मिकों के लिए ही पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू रखी गई जबकि अर्ध सैनिक बलों के लिए भी इसे खत्म कर दिया गया। हालाँकि धन की यह कमी केवल कार्मिकों के लिए ही महसूस की गई क्योंकि नेताओं को मिलने वाला वेतन और पेंशन व्यवस्था ज्यों की त्यों बनाए रखी गई।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार 23 फरवरी को विधानसभा में वित्त वर्ष 2022-23 का बजट पेश किया। ऐसे तो उन्होंने इस बजट में कई घोषणाएं कीं, लेकिन एक घोषणा ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है और सभी की तारीफ बटोरी है। दरअसल अशोक गहलोत ने राजस्थान के सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम बहाल कर दी है। उनके इस फैसले की सोशल मीडिया पर और कर्मचारी संगठनों द्वारा पूरे देश के स्तर पर खूब तारीफ भी हो रही है। यहां बता दें कि पश्चिम बंगाल और पंजाब में पुरानी पेंशन ही लागू है। अब राजस्थान का नाम भी इस लिस्ट में जुड़ गया है।

दरअसल, नई पेंशन स्कीम (यानी नेशनल पेंशन स्कीम- एनपीएस) के तहत पेंशन के लिए पैसे की कटौती कर्मचारियों के वेतन से ही होती है। राज्य के कर्मचारी इस बात का भी विरोध करते रहे हैं। राजस्थान में ये स्कीम 2017 में लाई गई थी। तब वहां वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार थी। अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ये फैसला वापस ले लिया है। खबर के अनुसार इससे सरकारी तिजोरी पर 1000 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा। राज्य सरकार के इस फैसले से सूबे के सरकारी कर्मचारी बेहद खुश हैं। सरकार ने अपने ऐलान में कहा है कि 1 जनवरी 2004 के बाद की नियुक्तियों को भी पुरानी पेंशन स्कीम का फायदा मिलेगा। हालांकि एनपीएस के प्रति कर्मचारियों के मन से हमेशा से ही शंका रही है। एनपीएस के बारे में बताया गया कि 10 प्रतिशत अंश कर्मचारी के वेतन से लेकर तथा 10 प्रतिशत सरकार द्वारा उसमे जोड़कर उस धनराशि को बाजार में लगाया जाएगा।

कर्मचारियों द्वारा लगातार पुरानी पेंशन की मांग किए जाने पर सरकार ने अपने अंश को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया। सेवानिवृत्ति पर इकठ्ठी हुई धनराशि, जिस गति में शेयर बाजार का उतार चढ़ाव होगा, उसी अनुपात में वह धनराशि कम या ज्यादा होगी। सेवानिवृत्ति के समय उसका एक निश्चित अंश कर्मचारी को एक मुश्त देकर उसके एक हिस्से को सरकार अपने पास रखकर उससे जो पेंशन बनेगी, वह कर्मचारी को प्रदान की जाएगी। लागू किए जाने के इतने समय बाद भी यह व्यवस्था कर्मचारियों को समझ तक नहीं आई। देश का एक बड़ा हिस्सा अभी भी ऐसा है जो शेयर बाजार से पूरी तरह अनजान हैं और इसे सट्टा मानकर इससे दूरी बनाए हुए है। ऐसे में अधिकांश कर्मचारियों को यह ज्ञान भी नहीं है कि पैसा ठीक जगह भी लगाया गया है या नहीं।

इसके अतिरिक्त अभी तक इस योजना के तहत काम करने वाले जो कुछ लोग सेवानिवृत्त हुए हैं, उनकी खबरें भी कर्मचारियों की रही सही उम्मीदों पर पानी फेरने वाली रही हैं। ऐसे लोगों की जो पेंशन इस व्यवस्था द्वारा बनी यह जीवन जीने लायक भी नही है। अत: राजस्थान की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलौत द्वारा दुबारा लागू किये जाने पर पूरे देश के कर्मचारियों में आशा की एक किरण दिखाई दी है।

उत्तरप्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी और लोकदल का गठबंधन अपने घोषणापत्र में इस मांग को शामिल करके वायदा कर चुका है कि अगर वह सत्ता में आते हैं तो पुरानी पेंशन व्यवस्था को उत्तरप्रदेश में भी लागू किया जाएगा। यह मुद्दा गठबंधन के लिए टर्निंग पॉइंट भी साबित हो सकता है। कर्मचारियों का तर्क है कि कोई व्यक्ति अगर एक दिन के लिए भी देश के किसी सदन का सदस्य हो जाए तो उसके जीवन की सुरक्षा के रूप में उसे पूरी उम्र पेंशन दी जाएगी। जबकि अपनी पूरी उम्र तक सेवा करने के बाद भी कर्मचारियों के लिए इस व्यवस्था को लागू किए जाने में धन की कमी का बहाना बनाया जाए, यह अनैतिक और दोगला व्यवहार है।

इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लंबे समय तक लोक कल्याणकारी व्यवस्था से पीछे हट रही सरकारों को वापिस लौटने के बारे में सोचना ही होगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह बयान बहुत महत्व रखता है कि अगर कार्मिकों को अपना भविष्य ही सुरक्षित दिखाई नही देगा तो वह उसके प्रति हमेशा चिंतित रहेंगे और सही प्रकार से काम नही कर पाएंगे। इसके अतिरिक्त असुरक्षित भविष्य भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देता है। राजस्थान सरकार का यह कदम देश की बाकी सरकारों के लिए भी एक दबाव पैदा करने का काम निश्चित रूप से करेगा।

डॉ. स्नेहवीर पुंडीर


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