Saturday, April 11, 2026
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युद्ध का का हमारी जेबों पर भी होगा असर

 

 

Nazariya 3


Dr Shrinaath Sahayयूक्रेन और रूस के बीच जारी जंग से पूरी दुनिया सहमी हुई है। दोनों देशों के युद्ध का खमियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। युद्ध से इन दोनों देशों को तो नुकसान हो ही रहा है, लेकिन इससे पूरी दुनिया पर जो महंगाई बम फूटा है, उससे कोई भी देश अछूता नहीं है। इसी कड़ी में ईंधन ने आम आदमी की जेब पर तगड़ा असर डाला है। भारत के दृष्टिकोण से देखें तो वर्ष 2014 के बाद से तेल की कीमत अपने उच्च स्तर पर है। कयास लगाए जा रहे हैं कि चुनाव बीतने के साथ ही जनता पर महंगाई का और बोझ बढ़ेगा। जापानी रिसर्च एजेंसी नोमुरा की हाल में आई रिपोर्ट में कहा गया था कि रूस-यूक्रेन युद्ध आगे खिंचता है तो इसके चलते एशिया में सबसे ज्यादा नुकसान भारत को होने वाला है।

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी देश में बीते चार महीनों से पेट्रोल-डीज के दाम स्थिर बने हुए हैं। हालांकि, इसके पीछे देश के पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनाव को कारण बताया जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 10 मार्च को चुनाव परिणाम सामने आने के बाद देश में इनकी कीमत बढ़ सकती है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में हो रहे इजाफे के कारण घरेलू बाजार में जल्द ही पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। ऐसे में बीते दिनों लोकलसर्किल की ओर से कराए गए एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, 42 फीसदी परिवारों का कहना है कि वे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में एक और बढ़ोतरी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे और गैर-जरूरी सामान की खरीदारी बंद कर देंगे। सर्वे में शामिल 24 फीसदी लोगों ने कहा कि वे पहले ही गैर-जरूरी सामान की खरीदारी पर खर्च बंद कर चुके हैं।

भारत और यूक्रेन के बीच प्रतिवर्ष लाखों डॉलर का व्यापार होता है। भारत यूक्रेन को दवाइयां और इलेक्ट्रिक मशीनरी आदि का निर्यात करता है और यूक्रेन से खाने वाले तेल, खाद और न्यूक्लियर रिएक्टर जैसी जरूरी चीजों का आयात करता है। यदि जंग शुरू हुई तो यह व्यापार बंद हो सकता है, जिससे दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। रूस को अपनी विस्तारवादी नीति को छोड़ देना चाहिए। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आम भारतीय का सुकून छिनने का बुनियादी कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। यह दाम 150 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकते हैं। तेल 2014 के बाद इतना महंगा हुआ है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के मुताबिक, भारतीय बास्केट के कच्चे तेल के दाम 1 मार्च, 2022 को 102 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गए हैं।

दिसंबर, 2021 में इसकी औसत कीमत करीब 73 डॉलर थी। तेल कंपनियों को भी अतिरिक्त मुनाफा हो रहा था। कच्चा तेल महंगा होने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को 5-7 रुपए प्रति लीटर का घाटा उठाना पड़ रहा है। लिहाजा अब खुदरा कीमतों में 9 रुपए प्रति लीटर अथवा 10 फीसदी की बढ़ोतरी करने की जरूरत है, ताकि तेल विपणन कंपनियां अपना औसत मुनाफा बरकरार रख सकें। रूस-यूक्रेन युद्ध ने तेल की इन कीमतों को लेकर ‘आग में घी’ का काम किया है।

अब यह सवाल किया जाने लगा है या डर सताने लगा है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंच गया, तो अर्थव्यवस्था और अन्य स्थिरताओं के हालात क्या होंगे? क्या कोरोना महामारी के बाद एक और भयावह झटका झेलना पड़ सकता है? चूंकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का दौर 7 मार्च को समाप्त हो रहा है और 10 मार्च को जनादेश के नतीजे घोषित किए जाएंगे, लिहाजा सुकून के कुल 7 दिन ही शेष हैं। चुनाव परिणाम के साथ ही पेट्रोल-डीजल के दामों में जबरदस्त उछाल तय है। करीब 20-25 रुपए प्रति लीटर कीमतें बढ़ाई जाएंगी। हालांकि यह बढ़ोतरी किस्तों में होगी, लेकिन रोजाना दाम बढ़ने लगभग तय हैं। एकमात्र विकल्प भारत सरकार के पास है कि वह तेल पर करों में कटौती करे।

विश्लेषण ऐसे भी सामने आ रहे हैं कि यदि बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 5 डॉलर प्रति बैरल और बढ़ गर्इं, तो भारत सरकार को 95,000 करोड़ रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह बहुत भारी राशि है, नतीजतन अर्थव्यवस्था को एक बार फिर गोता खाना पड़ सकता है। सिर्फ पेट्रो पदार्थ ही महंगे नहीं होंगे, मुद्रास्फीति भी बढ़ेगी। खाद्य तेल और खाद, उर्वरक की कीमतें और देश का कुल बिल भी काफी बढ़ेगा।

इसके साथ निवेशकों की चिंता व बेचैनी, विदेशी निवेशकों द्वारा धन निकालना, फिर शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और समूचे कारोबारी माहौल पर असर को जोड़ा जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था और बाजार पर यूक्रेन का साया लंबा हो सकता है। जीवन बीमा निगम के आनेवाले शेयरों पर भी जोखिम हो सकता है। इन सभी का सामना आर्थिक नीति से आसानी से नहीं किया जा सकता है। तेल के वैश्विक मूल्यों और विदेशी आयात पर निर्भर विकासशील देश होने के नाते भारत को इन असरों को किसी तरह सहना होगा। घरेलू अर्थव्यवस्था में गति आयी है और महामारी के बाद सुधार संतोषजनक है। केंद्रीय बजट में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के संकेत हैं।

इन सबके बावजूद यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यूक्रेन की लड़ाई का भारत की आर्थिक गतिशीलता पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। यूक्रेन के साथ हमारा कारोबार बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन फार्मा कंपनियां वहां काफी निर्यात करती हैं, लेकिन रूस के साथ हमारा रक्षा कारोबार बहुत है। जो करार हो चुके हैं, उनके तहत रक्षा हथियारों और उपकरणों की सप्लाई होनी है। यदि युद्ध लंबा खिंचा और ‘स्विफ्ट’ सरीखी आर्थिक पाबंदियां नहीं हटाई गई , तो क्या होगा?

डॉ. श्रीनाथ सहाय


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