Sunday, May 26, 2024
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देश की दशा और दिशा बताने वाला एक जरूरी दस्तावेज!

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Sudhanshu Guptaदेश आजादी के 75वें साल में प्रवेश कर चुका है। इन सालों में भारत ने अनेक प्रधानमंत्री देखे। पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक अनेक प्रधानमंत्रियों को, उनके काम, उनके विचारों और उनके विजन को देखा है। लेकिन क्या अब तक हुए 15 प्रधानमंत्रियों का आकलन देश की दशा और दिशा का भी आकलन हो सकता है? क्या कोई ऐसा आकलन हो सकता है जो बताए कि किस प्रधानमंत्री ने देश को प्रगति का रास्ता दिखाया और उसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया? और किस प्रधानमंत्री ने देश को गर्क में ले जाने का काम किया? आज के मौजूदा समय में वाट्स अप यूनिवर्सिटी इतिहास और तथ्यों को अपनी सहूलियत से तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है। कभी कहा जा रहा है कि नेहरू मुस्लमान थे और कभी हमें बताया जा रहा है कि अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री बन जाते तो देश बहुत आगे जा सकता था। यह भी कहा जा रहा है कि नेहरू ने ही कश्मीर समस्या को लंबे समय तक उलझाए रखा। विखण्डित इतिहास की और भी बहुत सी सूरतें दिखाई पड़ रही हैं। क्या कोई पुस्तक ऐसी हो सकती है जो तथ्यपरक ढंग से यह बताये कि देश कहां जा रहा है? और यह भी बताये कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जैसा देश मिला, वह जवाहर लाल नेहरू को मिले देश से कितना अलग और विकसित हो चुका था? रशीद किदवई की पुस्तक भारत के प्रधानमंत्री-देश, दशा और दिशा (राजकमल प्रकाशन) इस दिशा में महत्वपूर्ण पुस्तक है। रशीद किदवई वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह आॅब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन के विजिटिंग फेलो भी हैं। 24 अकबर रोड उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक है।
रशीद किदवई तथ्यों के साथ इतिहास के झूठों का भी पदार्फाश करते हैं। पहला अध्याय स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर है। पता चलता है कि नेहरू कश्मीर के कौल पंडित परिवार से हैं। 1716 में इस कौल परिवार को बादशाह फर्रुखसियर ने दिल्ली बुला लिया था। कौल परिवार दिल्ली में जहां रहता था, वहीं पास में एक नेहर(नहर) बहती थी। सो कौल परिवार नेहर वाला या नेहरू कहलाने लगा। नेहरू जॉर्ज बर्नाड शॉ जैसे प्रख्यात लेखक व चिंतक के व्याख्यानों से लाभान्वित हुए और फ्रेडरिक नीत्शे के दर्शन पर चिंतन मनन करते रहे।1918 में वह गांधी की छत्रछाया में आ गए।
उन्होंने ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ जैसी महत्वपूर्ण किताब लिखी। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए। नेहरू की सोच, उनका नजरिया, उनकी उपलब्धियां सब कुछ इस इस अध्याय में है। सुभाष बोस और पटेल से उनके कैसे रिश्ते थे, यह सब भी पाठकों को मिलेगा। इतना ही नहीं नेहरू के समय देश की क्या स्थिति थी, उस पर भी विस्तार से लिखा गया है। उस समय देश की साक्षरता दर 12 प्रतिशत थी, जो 2020 में 74.37 हो गई। देश के नागरिकों की औसत आयु 32वर्ष थी जो2020 में68.5 हो गई। कैम्ब्रिज जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के इतिहासकार आॅगस मैडिसन के शोध ने बताया कि1700 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी यूरोप(23.3) के बराबर यानी 22.6 प्रतिशत थी। लेकिन 1952 में यह घटकर 3.8 प्रतिशत रह गई। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नेहरू को कितना कमजोर भारत मिला-अन्य प्रधानमंत्रियों की तुलना में। लेकिन नेहरू ने आधुनिक उद्योगों के जरिए देश के बुनियादी ढांचे को शानदार ढंग से विकसित किया। नेहरू ने अपनी सोच के आधार पर कूटनीतिक पहल और शैक्षिक व वैज्ञानिक प्रगति के लिए अनेक अहम कदम उठाए। इस अध्याय में नेहरू का पूरा विजन दिखाई पड़ता है। यह भी दिखाई पड़ता है कि नेहरू देश को कहां ले जाना चाहते थे।
पुस्तक में नेहरू के बाद गुलजारीलाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, एच डी देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह से होता हुआ यह कारवां नरेन्द्र दामोदरदास मोदी तक पहुंचता है। रशीद किदवई ने सभी प्रधानमंत्रियों का तथ्यों के साथ आकलन किया है। कहीं भी यह आकलन पक्षपातपूर्ण नहीं लगा। 2014 और फिर 2019 में लोकसभा चुनाव में मोदी एक लोकलुभावन वक्ता के रूप में सामने आए। प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजेंडे को पूरी निष्ठा से लागू करने का प्रयास किया। विदेश नीति हो या कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी करना या फिर या राम मंदिर निर्माण के प्रति कटिबद्धता। मोदी ने संघ को कभी निराश नहीं किया। मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, नमामि गंगे, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान जैसे प्रमुख अभियान चलाए। आर्थिक स्तर पर उन्होंने जीएसटी और नोटबंदी की घोषणा की।
मोदी की एक और खासियत यह रही कि उन्होंने विषम परिस्थितियों को भी अपने लिए भुनाया। लेकिन मोदी की योजनाएं हमेशा सवालों में घिरी रहीं। उनके कार्यकाल में दलितों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ीं, गौरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाएं सामने आईं, सामाजिक सद्भाव का क्षरण हुआ और मीडिया पर लगातार दबाव बढ़ा। मोदी को अनेक मुद्दों पर घोर आलोचना का शिकार होना पड़ा। धारा 370 की समाप्ति, नागरिक संशोधन एक्ट, कृषि विधायक, कोरोना काल में लॉकडाउन में हुई बदइंतजामी, कोरोना पीड़ितों के उपचार और टीकाकरण में सरकारी दावों के अनुरूप व्यवस्था दिखाई नहीं दी, अनियंत्रित महंगाई और बेरोजगारी पर भी सवाल उठे। ऐसा नहीं है कि सारी अव्यवस्था कोराना काल में ही सामने आई। मोदी सरकार द्वारा अचानक की  गई नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया। इसके बाद जीएसटी नामक कर लगाया गया, जिसका नकदी के आधार पर चलने वाले क्षेत्र तथा छोटे कारोबारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक अर्थ-चक्र की दशा ऐसी बिगड़ी कि सन्  2017-18 के दौरान भारत में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत बढ़ी। यह 45वर्षों में सर्वाधिक थी। लघु व माइक्रो उद्योग लगातार बंद होने लगे। इससे भी चिंताजनक बात यह हुई कि इस उथल-पुथल ने लाखों लोगों को स्थायी रूप से बेरोजगार कर दिया।
इस अध्याय में उन सवालों को भी उठाया गया है, जिनके जवाब देने से मोदी और उनके मंत्री संसद में लगातार बचते रहे। बेशक मोदी का सम्पूर्ण आकलन भविष्य में ही होगा। लेकिन उनका कार्यकाल जॉर्ज आॅरवेल के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘एनिमल फार्म’ की याद जरूर दिलाता है। इस उपन्यास में आॅरवेल ने यह दिखाया कि जब समाज और सरकार के विभिन्न अंग एक खास सोच और नजरिये को बढ़ावा देते हैं, तब तमाम आदर्श धीरे-धीर खण्डित हो जाते हैं। पुस्तक में नेहरू और मोदी के अलावा सभी प्रधानमंत्रियों का तटस्थ आकलन है, जो मौजूदा समाज को अतीत और भविष्य की तस्वीर दिखाता है। पाठक इस पुस्तक को पढ़कर स्वयं इस बात का फैसला कर सकते हैं कि किस प्रधानमंत्री ने देश को मजबूती प्रदान की और किसने देश को कमजोर बनाने के लिए काम किया। यह किताब भारतीय लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील हर नागरिक के लिए एक जरूरी दस्तावेज है।
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