
धान एक महत्वपूर्ण फसल होने के साथ-साथ भोजन का प्रमुख श्रोत्र है जिससे मनुष्य अपने शरीर के लिए कार्बोहाड्रेट की अधिकांशत: भाग की पूर्ति करता है। इसकी खेती भारतवर्ष के अधिकांशत: प्रदेशों में की जाती है। धान की अच्छी उपज लेने के लिए आनुवंशिक रूप से गुणवकतापर्ण बीज का होना बहुत जरूरी होता है। शुद्व आनुवांशिक बीज उत्पादन के लिए बुआई से लेकर भंडारण तक बहुत सारी बातों का ध्यान रखना चाहिए तभी व्यवसायी स्तर पर बीज उत्पादन कर सकते हैं।
उत्तम बीज के प्रमुख गुण एवं बचाव
उत्तम बीजों की आनुवंशिक शुद्वता अधिकतम तथा अन्य प्रजातियों के बीजों की उपस्थिति लगभग शून्य होना चाहिए। भौतिक शुद्वता उच्च स्तर का होना चाहिए। कंकड़ पत्थर तथा खरपतवार के बीजों से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए। बीज स्वस्थ होने के साथ अधिक अंकुरण क्षमता होना चहिए। रोग व कीट ग्रस्त बीज अधिक उपज नहीं दे पाते हैं और बीज जनित रोग फैलाते हैं इससे बचने के लिए उपयुक्त रसायन से उपचारित कर उतम बीज का ही प्रयोग करना चाहिए। अधिक नमी के कारण बीज पर कवक रोगों का प्रकोप हो सकता है। इससे अंकुरण क्षमता नष्ट हो सकती है अत: बीजों को 10-12 प्रतिशत नमी पर ही उचित भंडारण करना चाहिए। पूर्णरूप से परिपक्व फसल की कटाई करना चाहिए इससे बीजों में अधिक अंकुरण होता है।
धान बीज उत्पादन की प्रमुख शस्य क्रियाएं
भूमि का चयन: समतल। चिकनी दुम्मट मिट्टी बीज उत्पादन के लिए उपउक्त होता है तथा वैसे भूमि का चयन करना चाहिए जहाँ पर पीछले वर्ष धान की खेती नहीं की गई हो।
पृथकीकरण: धान एक स्वपरागित फसल है लेकिन इसमें भी कुछ परपरागण की संभावना 0- 6.8 प्रतिशत तक हो सकते हैं इसे रोकने के लिए एक किस्म से दूसरे किस्म से कम से कम 3.00 मीटर की दूरी रखना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर बीजों की आनुवंशिक गुण खराब हो सकते हैं।
बोआई का समय: पौधशाला में पिछाती प्रभेद की बुआई 25 मई से 10 जून तथा अगेती किस्में की बुआई 10-25 जून तक कर लेना चाहिए।
बीज का स्रोत: आधार तथा प्रमाणिक बीज का क्रय किसी प्रतिष्ठत संस्थान से ही करना चाहिए।
बीज की मात्रा: मोटे प्रभेदों के लिए 30-35 किलोग्राम तथा महीन प्रभेदों के लिए 25-30 किलोग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए जरुरत पङता है।
धान की रोपाई: धान के बीचड़े 15-20 दिनों में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं जिसे जल्द से जल्द मुख्य खेतों में रोपाई कर देना चाहिए जिसका उपज पर अनुकूल प्रभाव है।
धान की रोपाई से पहले खेतों में पानी लगाकर 2-3 जुताई करने के बाद नत्रजन की 100-120 किलोग्राम की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस 60 किलोग्राम तथा पोटाश 40 किलोग्राम की पूरी मात्रा का व्यवहार करना चाहिए तथा बचे नत्रजन की शेष मात्रा को दो बार इस्तेमाल करना चाहिए पहले मान्ना को जब कल्ले निकलना शुरू हो जाय तब तथा दूसरी मात्रा बाली निकलने के समय प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करना चाहिए।
रोपाई का तरीका तथा लगाने की दूरी
2-3 पौधों को एक साथ 2-3 सेंमी. की गहराई पर रोपाई करनी चाहिए तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेंमी. एवं पौधों से पौधों की दूरी 15 सेंमी. रखना चाहिए।
जल प्रबंधन
रोपाई के समय 2.5 सेंमी पानी खेतों में रखना चाहिए इसी तरह खेतों में पानी का प्रबंधन पौधों में दाना भरने के समय तक करना चाहिए।
धान मे खरपतवार का नियंत्रण
खरपतवार नियंत्रण के लिए 2-3 बार कृषि यंत्रों से करना चाहिए। इसके नियंत्रण के लिए बहुत से खरपतवार नाशी रसायन का भी प्रयोग किया जा सकता है। जैसे:
-2-4 डी. की एक किलोग्राम सक्रीय अवयव को 150-250 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के 20-25 दिनों बाद व्यवहार करना चाहिए।
-बुटाक्लोर की 1.5 किलोग्राम सक्रिय अवयव को 600-700 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के 7-10 दिनों बाद छिड़काव करना चाहिए।
धान की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट पतंग एवं नियंत्रण
तना छेदक: यह कीट तनों में घुसकर मुख्य तना को क्षति पहुंचाते हैं जिससे बढ़वार की स्थिति में तना सुख जाते हैं, बिालियों में दाना नहीं बन पाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए फोरेट दानेदार 10 प्रतिशत सक्रिय अवयव की 10 किलोग्राम मात्रा या इनडेन दानेदार 6 प्रतिशत सक्रिय अवयव की 30 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के 20 दिनों बाद जब खेतों में पानी लगा रहें हैं तो छिड़काव करना चाहिए।
गन्धी बग: यह कीट बालियों की दुग्धावस्था में दानों में बन रहे दूध को चूसकर क्षति पहुंचाते हैं, जिससे बालियो में बन रहे दाने पूर्णरुप से विकसित नही हो पाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए 150 मिलीलीटर इमिडाक्लोरपिड 17.5 प्रतिशत एससी सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें
धान के फसल में लगने वाले प्रमुख रोग एवं नियंत्रण
ब्लास्ट रोग: इस रोग में पौधों की पत्तियों तथा तना पर आंख की आकृति के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बीच में काले रंग के तथा किनारों पर गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। इस रोग के रोकथाम के लिए 150 ग्राम बेनलेट की मात्रा को 250 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
बैक्टेरियल लीफ ब्लाईट: इस रोग के नियंत्रण के लिए 75 ग्राम एग्रमाईसीन 100 तथा 500 ग्राम कॉपर आॅक्सीक्लोराइड को 500 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से 10 से 15 दिनों के अंतराल पर 3 से 4 बार छिड़काव करना चाहिए।
खैरा रोग: इस रोग के नियंत्रण के लिए जिंक सल्फेट 5 किलोग्राम तथा 2.5 किलोग्राम बुझा हुआ चूने को 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
रोगिनग
इस क्रिया में धान के खेत से बीमारी। कीड़ा लगे हुए पौधों को निकाल देना चाहिए साथ ही साथ जो पौधे की बाली मुख्य फसल से पहले निकल गई हो उसे भी उखाड़कर फेंक देना चाहिए। धान के बीज उत्पादन में रोगिनग कम से कम तीन बार करना चाहिए। पहला बाली निकलने से पहले दूसरा बाली निकलने के समय तथा तीसरा बाली पकने के समय करना चाहिए।
धान फसल की कटाई, मढाई एवं भंडारण
जब बाली पूरी तरह से पक्कर तैयार हो जाए। दानों में नमी की मात्रा 17-23 प्रतिशत रहे, तभी फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। आनुवंशिक शुद्वता को ध्यान में रखते हुए मढाई करने वाले स्थान को पूरी तरह से साफ सफाई कर लेना चाहिए। भंडारण करने से पहले धान को पूरी तरह से सुखा लेना चाहिए जब नमी की मात्रा 10-12 प्रतिशत रहे तभी भंडारण करना चाहिए।
-अनुज कुमार चौधरी


