Tuesday, April 28, 2026
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चेतावनी है अप्रैल की तपिश

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बीती 20 अप्रैल 2026 को विश्व में 20 ऐसे स्थान जो सर्वाधिक गर्म रहे, उनमें से 19 स्थान भारत के दर्ज किए गए, जिनमें 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। यह केवल एक मौसमी घटना भर नहीं रह गई है। यह एक गहरी चिंता का विषय है कि जिस गर्मी का चरम मई और जून में देखने को मिलता था, वह अब अप्रैल में ही दस्तक दे रही है। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह असामान्य स्थिति केवल प्राकृतिक चक्र का परिणाम है, या इसके पीछे मानव जनित कारण—विशेषकर जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संघर्ष—भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं?

पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन उत्सर्जन में हुई तीव्र वृद्धि ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का स्तर बढ़ा दिया है। एक शोध में सामने आया है कि पृथ्वी पर मानव अस्तित्व के समय वातावरण में कार्बन स्तर लगभग 300 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) हुआ करता था जो वर्तमान में 420 पीपीएम से ऊपर पहुंच गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि हीटवेव अब अधिक तीव्र, अधिक लंबी और अधिक बार आने लगी हैं। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश, विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्र, इस परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं।

दूसरा पहलू है प्राकृतिक जलवायु चक्रों का अनियमित होना। जब प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है, तो इसका प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है। भारत में इसके परिणामस्वरूप प्राय: मानसून कमजोर होता है और गर्मी का असर अधिक समय तक बना रहता है। यदि 2026 में अल नीनो की स्थिति विकसित होती है या बनी रहती है, तो अप्रैल की यह तपिश आगे और विकराल रूप ले सकती है। अब प्रश्न आता है वैश्विक संघर्षों का। क्या युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव भी इस गर्मी के लिए जिम्मेदार हैं? प्रत्यक्ष रूप से नहीं, परंतु अप्रत्यक्ष प्रभावों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। रूस-यूक्रेन, अमेरिका-इस्राइल और ईरान युद्ध जैसे संघर्षों ने ऊर्जा संकट को जन्म दिया, जिसके चलते कई देशों ने स्वच्छ ऊर्जा की बजाय कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों का अधिक उपयोग करना शुरू कर दिया है।

इससे वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई, जो अंतत: जलवायु परिवर्तन को और तेज करता है। इसके अतिरिक्त, युद्धों के कारण पर्यावरणीय विनाश, जंगलों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण भी बढ़ता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर असामान्य गर्मी को केवल संघर्षों से जोड़ देना एक अति सरलीकरण होगा। मौसम एक जटिल प्रणाली है, जिसमें स्थानीय कारक भी सम्मिलित है जैसे शहरीकरण, कृषि भूमि बढ़ाने एवं विकास हेतु हरित आवरण में कमी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि संपूर्ण विश्व में प्रत्येक दिन 25000 से 30000 हेक्टेयर जंगल नष्ट किए जाते हैं। अर्थात प्रत्येक दिन लगभग 4.1 करोड़ पेड़ काटे जाते है। यहां अगर संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक पेड़ काटने वाले देशों की सूची में देखा जाए तो भारत दूसरे नंबर पर आता है।

पश्चिमी विक्षोभों की अनुपस्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उत्तर भारत में तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाते हैं, जिससे शहरों में तापमान और अधिक महसूस होता है। फिर भी, यह स्पष्ट है कि वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है। यदि अप्रैल में ही तापमान 44 डिग्री के पार जा रहा है, तो मई और जून में इसके और बढ़ने की पूरी संभावना है। वैज्ञानिक पूवार्नुमान भी इस दिशा में संकेत देते हैं कि इस वर्ष सामान्य से अधिक हीट वेव के दिन देखने को मिल सकते हैं। आने वाले महीनों में गर्मी और ज्यादा बढ़ सकती है। अप्रैल से जून 2026 के बीच देश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। खासकर पूर्व, मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के साथ-साथ दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में हीटवेव के ज्यादा दिन देखने को मिल सकते हैं। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तेज गर्मी का असर ज्यादा रहने की आशंका है। इसके अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी गर्मी लोगों को परेशान कर सकती है।

जिस प्रकार भारत के उत्तरी प्रदेशों में विशेषत: बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में गर्मी अधिक पड़ने का प्रभाव सीधे सीधे फसल, पानी एवं मानवीय स्वास्थ पर पड़ना अवश्यंभावी है, आशंका इस बात की अधिक है कि कुछ वर्ष पहले व्यवस्थाओं को बुंदेलखंड में रेल द्वारा पानी भेजना पड़ा था, अगर अभी से समाज और व्यवस्थाएं सतर्क नहीं हुई तो यही हालत इस वर्ष भी बन सकते है। जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी उसका असर मानवीय जीवन के साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
पहाड़ी राज्य भी गर्मी से बेहाल हैं। उत्तराखंड पर गर्मी का ऐसा कहर टूटा है जैसा इस सीजन में पहले कभी नहीं देखा गया। हरिद्वार, काशीपुर, रुड़की, बाजपुर और रुद्रपुर में पारा 43 डिग्री तक जा पहुंचा जबकि, खटीमा और रामनगर में 42 डिग्री दर्ज किया गया। देहरादून में भी उमस भरी गर्मी से लोगों का हाल बेहाल रहा। मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून ने मैदानी जिलों के लिए लू की चेतावनी जारी करते हुए लोगों से अपील की है कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच घर से बाहर निकलने से बचें।

समाधान के स्तर पर, केवल सरकारी नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी; सामाजिक और व्यक्तिगत प्रयास भी उतने ही आवश्यक हैं। स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, और शहरी नियोजन में हरित क्षेत्रों का विस्तार जैसे कदम तत्काल उठाए जाने होंगे। साथ ही, वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग और शांति भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि संघर्ष न केवल मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी बिगाड़ते हैं। अंतत:, अप्रैल की यह असामान्य गर्मी एक स्पष्ट संकेत है—यह प्रकृति की चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में यह ‘असामान्य’ ही हमारी नई सामान्य स्थिति बन सकती है। बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के लिए यह वक्त खासतौर पर खतरनाक बताया गया है। तेज गर्मी और लू के कारण शरीर से अत्यधिक पसीना निकलने से पानी और जरूरी लवण की कमी हो सकती है।

इससे डिहाइड्रेशन की समस्या बढ़ जाती है। इसके चलते कमजोरी, चक्कर, उल्टी और थकान महसूस हो सकती है। लंबे समय तक धूप में रहने से मांसपेशियों में ऐंठन भी हो सकती है। गंभीर स्थिति में शरीर का तापमान 40 डिग्री या उससे अधिक पहुंच सकता है, जो जानलेवा साबित हो सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए खतरा ज्यादा रहता है। गर्मी से बचाव के लिए सावधानी बरतें। दोपहर 12 से 3 बजे के बीच बाहर निकलने से बचें। शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त पानी पिएं। हल्के और ढीले सूती कपड़े पहनें। सिर को टोपी या कपड़े से ढककर रखें।

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