
उठ रे! बटोही चल प्रण कर
विपदा से डरते नहीं
आशीष मांगा करते नहीं
दृढ़ संकल्प है जीवन का
यह चिन्ह है अमृत्व का
बहुरेंगे दिन तेरे
निशा के बाद सवेरे
आदि है तो अन्त है
यह जीवन ही बहुरंग है
हो जोश और खरोश में
हाथ दो-दो चार कर
उठ रे! बटोही चल प्रण कर
रोना मत रो प्राणी,
व्यथा अपनी कहानी
डर के आगे जीत है,
सुख-दु:ख दोनों मीत हैं
तेरे भय की कहानी
है कायरता की निशानी
विपुल उर्जा का संचार ले
फिर नीड़ का निमार्ण कर
उठ रे! बटोही चल प्रण कर।।


