- छह इंच से सात फीट तक की बनाई जा रही है मूर्तियां
- 26 से शुरू हो रही है मां दुर्गा की आराधना
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: गणेश के बाद अब मां दुर्गा की मूर्तियां आकार ले रही है। इन दिनों थापरनगर का नजारा बदला हुआ है। आकार लेती मां दुर्गा की मूर्तियां दूर से ही दिखाई दे रही है। जिनकों देखकर लग रहा है कि मां दुर्गा का आगमन जल्द ही होने जा रहा है। इस इलाके में मिट्टी की खुशबू भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। अभी से ही मिल रहे मूर्तियों के आॅर्डर को देखते हुए मूर्तिकारों का कहना है कि इस साल कोरोना के बाद फिर से पहले जैसे आॅर्डर आ रहे हैं।
बता दें कि दो साल लोगों के कष्टों में गुजरे, लेकिन इस वर्ष मां दुर्गा खुशियां लेकर आ रही है। हालांकि मूर्तिकारों का कहना है कि नई मिट्टी न मिलने से थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और पुरानी मिट्टी से ही मूर्तियां बनाई जा रही है। यह मिट्टी हरियाणा के झज्जर से आती है। वहीं मूर्तियों को आकर देने के बाद यमुना नदी की मिट्टी से उसे चिकना और आकर्षक बनाया जाता है।
मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए तालाब वाली काली और चिकनी मिट्टी को अच्छा माना जाता है। अंजता मूर्ति कला केंद्र थापरनगर के मनोज प्रजापति का कहना है कि इसबार मिट्टी से बनी मूर्तियों की मांग काफी है। मांग को देखते हुए छोटी और बड़ी दोनों आकार की मूर्तियां बनाई जा रही है। नवरात्र का समय कम रह गया है इसलिए दिन रात काम कर मूर्तियों को फाइनल टच दिया जा रहा है।
माता का शृंगार भी हुआ महंगा
दुर्गा पूजा के लिए बनने वाली बड़ी मूर्तियों में केश, नथ, चूड़ी, टीका और मुकूट सभी कुछ कोलकाता से मंगाया जाता है। जिसकी कीमत इस वर्ष 30 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसी वजह से भी इस वर्ष मूतियों की कीमत में भी बढ़ोत्तरी हुई है।
मूर्तिकार छह इंच से लेकर सात फीट तक की मूर्तियां बना रहे है।

जिनकी कीमत 75 रुपये से लेकर 40 हजार रुपये तक है। दुर्गा पूजा के लिए बनने वाली मूर्तियों की खासियत यह है कि इनको बंगाल के कारीगरों द्वारा ही तैयार किया जाता है। इसलिए मूर्तियों में बंगाल की कला और देवी का वहीं रूप नजर आ रहा है। मेरठ में बनने वाली मूर्तियां दिल्ली, मोदीनगर, गाजियाबाद, मुरादनगर, शामली, मुजफ्फ रनगर आदि स्थानों पर जाती है।
क्यों की जाती है मूर्ति पूजा?
भारत में परम सत्ता को जानने समझने वाली दो धाराएं रही हैं। एक धारा परम सत्ता के निर्गुण रूप को मानने वाली और दूसरी सगुण रूप को मानने वाली। निर्गुण धारा मानने वालों का कहना है कि ईश्वर से सृष्टि हुई है। सृष्टि नाम रूपात्मक है, तो उसके रचयिता का न कोई नाम दिया जा सकता है न उसका कोई रूप हो सकता है। उसकी आराधना भी उसके गुणातीत रूप को सामने रखकर ही की जानी चाहिए।
दूसरी तरफ सगुण धारा में निष्ठा रखने वालों का कहना है सामने तो किसी स्वरूप को ही रखा जा सकता है। यह मनुष्य के बोध की सीमा ही है कि ज्ञान उसी का हो सकता है, जिसका स्वरूप हो। केवल परमयोगी ही अतीद्रिय अनुभव की बात करते हैं। पर अतीद्रिय अनुभव के बावजूद नहीं बताया जा सकता कि वह अनुभव क्या था? क्योंकि तब तक हमें उसे भाषा में व्यक्त करना होगा, जो सांसारिक है, नाम रुपात्मक है। इसलिए एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी दोनों धाराएं एक दूसरा का महत्व स्वीकार करती रही है।
उनमें कभी टकराव की नौबत नहीं आई। आज तो हर कोई मूर्ति बनाने लगा है, लेकिन शास्त्रीय मान्यता यह है कि शुद्ध चित्त वाले केवल उसी स्थपति को देव मूर्ति बनानी चाहिए जो देवता के स्वरूप को समझता है। उसके स्वरूप के बारे में शास्त्रों में दिए गए निर्देशों को जानता है। देवमूर्ति की उस विशेष छवि को अपने अंत:करण में देख चुका है।
भगवान के सगुण रूप के बारे में अनेक सुंदर कथाएं प्रचलित हैं। विद्यारण्य स्वामी द्वारा रचित शंकर दिग्विजय में यह कथा आती है कि आदि शंकराचार्य ने अपने मां को वचन दिया था कि वे उनके जीवन की अंतिम वेला में उनके पास आ जाएंगे। अत: जब वह समय आया तो वे अपनी मां के पास पहुंच गए।
आदि शंकर जो पूरे भारत में केवल ब्रह्म की सत्ता सिद्ध करके हुए घूम रहे थे, अपनी मां के पास पहुंचे और उनकी अंतिम इच्छा जानना चाही। मां ने कहा कि वे मरने से पहले भगवान के दर्शन करना चाहती हैं। आदि शंकर ने तब अपनी मां से आंख बंद करने के लिए कहा और योगशक्ति से भगवान की छवि प्रस्तुत कर दी।

