Monday, March 16, 2026
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शिक्षा में सुधार किस कीमत पर?

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उत्तर प्रदेश की भूमि, जो कभी विद्या, संस्कृति और सभ्यता की जननी रही है, आज एक विचित्र और चिंताजनक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर सरकार प्राथमिक विद्यालयों को मर्ज कर रही है, वहीं दूसरी ओर शराब के ठेकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की जा रही है। यह परिदृश्य न केवल नीति निर्धारण की दिशा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि संविधान के मूल अधिकारों, सामाजिक संरचना और भावी पीढ़ी के भविष्य पर भी सीधा हमला करता है। जिस भूमि पर कभी गोरखनाथ, संत कबीर, तुलसीदास जैसे मनीषियों ने शिक्षा, विवेक और नैतिकता का संदेश दिया, वहां आज शिक्षा के मंदिरों को वीरान कर मधुशालाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। आंकड़ों की भाषा में बात करें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में लगभग 27,000 प्राथमिक विद्यालयों को ‘कम छात्र उपस्थिति’ के आधार पर बंद या मर्ज करने का आदेश दिया है। वहीं दूसरी ओर, 27,308 से अधिक शराब ठेकों को लाइसेंस जारी किया गया है, और ये संख्या लगातार बढ़ रही है।

प्रश्न उठता है कि सरकार के लिए प्राथमिकता क्या है-शिक्षा या शराब? अगर छात्र कम हैं तो उनका पुन: नामांकन करवाना सरकार की जिम्मेदारी है, स्कूल बंद करना नहीं। क्या सरकार को यह नहीं पता कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा अमूमन गरीब, दलित, आदिवासी, मजदूर या श्रमिक वर्ग से आता है? वही वर्ग जो शराब की लत से सबसे अधिक प्रभावित होता है। जब एक ओर सरकार शिक्षा के अवसर खत्म कर रही है, वहीं दूसरी ओर शराब को खुलेआम उपलब्ध करा रही है। यह विरोधाभास नहीं, यह सुनियोजित सामाजिक विनाश की प्रक्रिया है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21-अ कहता है कि 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। यह कोई नीति नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। जब स्कूल बंद किए जाते हैं, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में, तो यह मौलिक अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होता है। सरकार यदि यह कहती है कि छात्र नहीं हैं तो यह उसकी अपनी असफलता है-क्योंकि छात्रों को जोड़ने, संवेदीकरण करने, अध्यापक नियुक्त करने, अवसंरचना सुधारने की जिम्मेदारी भी उसी की है।

वहीं अनुच्छेद 14-समानता का अधिकार-भी यहां प्रभावित होता है। जब एक सम्पन्न वर्ग के बच्चे निजी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और गरीब बच्चों के सरकारी स्कूल बंद कर दिए जा रहे हैं, तो यह असमानता की खाई और गहरी हो जाती है। साथ ही अनुच्छेद 41 राज्य को निर्देश देता है कि वह शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के क्षेत्र में आर्थिक क्षमता के अनुरूप नागरिकों को सुविधाएं देगा। यदि आर्थिक मजबूरियां कारण हैं, तो फिर शराब के कारोबार पर बढ़ता खर्च कैसे जायज है? सरकार का कहना है कि विद्यालयों को मर्ज करना प्रशासनिक सुधार है। लेकिन यह सुधार किस कीमत पर? विद्यालय किसी दुकान की तरह नहीं कि कम बिक्री हो तो बंद कर दो। यह समाज निर्माण की इकाई है। स्कूल केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, वह एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र है। वहाँ दोपहर का भोजन मिलता है, सामाजिक समरसता पनपती है, बच्चों में आत्मविश्वास और नागरिक चेतना विकसित होती है।

महराजगंज, सोनभद्र, चंदौली, बलिया, मेरठ, बस्ती जैसे हर जिलों में हजारों स्कूल बंद कर दिए गए हैं। कई जगहों पर बच्चों को 5-10 किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में भेजा जा रहा है, जहां तक जाने के लिए न परिवहन है, न सुरक्षा की गारंटी। परिणामस्वरूप, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा छूट रही है। ऐसी स्थिति में बाल विवाह, बाल श्रम और अपराध की संभावना बढ़ जाती है। क्या यही ‘न्यू इंडिया’ का सपना है? क्या यही है उत्तम प्रदेश? उत्तर प्रदेश में वहीं दूसरी ओर शराब की दुकानें हर गली, हर चौराहे, हर बाजार में सजती जा रही हैं। पहले जहां स्कूल के बाहर साइकिलें खड़ी होती थीं, अब वहां शराबियों की भीड़ होती है। पहले जहां बच्चों की हँसी गूंजती थी, अब वहां बोतलें खनकती हैं। क्या यह परिवर्तन विकास है?

सरकार द्वारा यह भी दावा किया गया कि कम उपस्थिति वाले स्कूलों का विलय बच्चों को बेहतर संसाधन देने के लिए किया गया है। लेकिन यह एक छल है। यदि संसाधन बेहतर देने थे, तो हर स्कूल को सक्षम बनाया जाना चाहिए था। क्या सरकार ने प्रत्येक स्कूल का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया कि वहां शिक्षक हैं, भवन हैं, पुस्तकें हैं, इंटरनेट है, शौचालय हैं, पीने का पानी है? जवाब न में है। शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में प्राथमिक स्तर पर सबसे अधिक ड्रॉपआउट दर उत्तर प्रदेश में है। क्या यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सरकार ने शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी? इसी बीच शराब नीति को डिजिटल, ई-लॉटरी आधारित, हाई-मार्जिन और राजनीतिक चंदा उगाही के टूल में बदल दिया गया। यह ‘शिक्षा बनाम शराब’ की सीधी लड़ाई है, जिसमें नीति निमार्ताओं ने शराब को विजेता घोषित कर दिया है।

विरोधस्वरूप आम आदमी पार्टी ने ‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ शुरू किया है। संजय सिंह ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया और जनता से अपील की कि ‘हमें शराब की दुकान नहीं, विद्यालय चाहिए।’ समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, शिक्षक संघ, अभिभावक संघ सभी इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं। लेकिन सरकार अपने निर्णय पर अडिग है। लोकसभा और विधानसभा में प्रश्न पूछे जा रहे हैं, परंतु नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया। क्या समाज अब भी चुप रहेगा? क्या हमें नहीं चाहिए कि हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए आवाज उठाएं? क्या एक पाठशाला की कीमत एक शराब ठेके से कम आंकी जाएगी? क्या संविधान, समाज और संस्कृति इस व्यापारिक राजनीति के आगे समर्पण कर देंगे? उत्तर प्रदेश की जनता को अब यह निर्णय करना होगा कि वह किस ओर खड़ी है। यदि हम शिक्षा का मंदिर बंद होने देंगे और शराब की दुकानें खुलती रहेंगी, तो अगली पीढ़ी हमसे सवाल करेगी कि ‘आपने हमारे लिए क्या छोड़ा?’ उत्तर केवल शर्म होगा। इसलिए आज आवश्यकता है कि पंचायतों में, नगर निकायों में, विधानसभा में, अदालत में, हर मंच पर यह मांग उठे कि बंद विद्यालयों को पुन: खोला जाए। शराब नीति की समीक्षा हो, शराब की दुकानों की संख्या सीमित की जाए, और ग्रामीण भारत को पुन: शिक्षा आधारित बनाया जाए। विद्यालय वह दीप है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है। शराब वह ज्वाला है जो घर, गांव और आत्मा सब जला देती है।

भजन की इन पंक्तियों में आज का संदेश है: ‘ना बोतल में राम मिलेंगे, ना ठेके से ज्ञान, शिक्षा से ही होगा उजियारा, पढ़ना ही है असली भगवान।’ शब्दों का यह युद्ध केवल कलम से नहीं, अब संकल्प से लड़ा जाएगा। पाठशाला और मधुशाला के बीच यह जो टकराव है, वह केवल नीति नहीं-यह पीढ़ियों की दिशा तय करने वाला संघर्ष है। आज यदि हम पाठशाला को न बचा सके, तो कल हमें मधुशाला में ही अपने भाग्य को तलाशना पड़ेगा।

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