Monday, March 16, 2026
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गकिस मुकाम पर है हमारा लोकतंत्र

Samvad 50

86यह कहना कठिन है कि भारतीय लोकतंत्र अपने इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में है या नहीं है। कई गंभीर चुनौतियां दिखाई देती हैं। भारतीय लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल लोकतंत्रों में से एक है। भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव भी हासिल है। यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत में धर्म और भाषाओं की विविधताएं बहुत है। तीन चौथाई शताब्दी पार कर चुके लोकतंत्र को परिपक्वता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। लेकिन पहले देखें कि आज हमारे लोकतंत्र की स्थिति क्या है। जिस तरह हम अपनी ऐतिहासिक और बहुमूल्य वस्तुओं को ठीक रखने के लिए समय समय पर उसकी झाड़ पोछ करते रहते हैं, धूप दिखाते हैं। ठीक उसी तरह लोकतंत्र की समीक्षा करने और उसमें आई खामियों और खूबियों को भी देखने की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता है।

सबसे पहले भ्रष्टाचार को लें। यह समस्या कोई नई नहीं है। और सरकारें कोई भी हो, इसे खत्म करने की मंशा व्यक्त करती रही हैं। लेकिन हम देखते हैं चुनाव दर चुनाव इसमें कमी आने की बजाय निरंतर वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी कमजोरी है, जो चुनावों में धनबल का प्रभाव, पद का दुरुपयोग और भाई-भतीजावाद जैसे रूपों में प्रकट होता है। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में असमानता और अन्याय को जन्म देता है। दुखद है, लेकिन कहना होगा कि चुनाव अब एक व्यवसाय में तब्दील होता जा रहा है। चूंकि करोड़ों खर्च किए जाते हैं तो करोड़ों वसूले भी पड़ते हैं। जन सामान्य का अनुमान है कि पार्षद के चुनाव में करोड़ से ऊपर और विधायक सांसदों के चुनाव में बीस-पच्चीस करोड़ लग जाना मामूली बात है। समझा जा सकता है कि यह पैसा मात्र पोस्टर बैनर में खर्च नहीं होता, यह जिन मदों में खर्च किया जाता है वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। लोक में से उठे हुए साधारण आदमी की हैसियत नहीं है कि वह चुनाव लड़ सके।

धर्म और जाति भारत की दूसरी बड़ी समस्या है। लोकतंत्र की दृष्टि से देखें तो यह पूर्वाग्रही वोट बैंक का निर्माण करती है। धर्म और जाति-आधारित राजनीति भारतीय लोकतंत्र को विभाजित करती है और लक्ष्य से भटकाती है। इससे समाज में सांप्रदायिक हिंसा और तनाव भी बना रहता है। यह लोकतंत्र के समानता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों को कमजोर करती है। क्योंकि यह सुविधाजनक है इसलिए राजनेता भी धर्म और जाति आधारित राजनीति करते हैं। हमने एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर ली है जो चुनाव की प्रक्रिया को धार्मिक और जातिगत सशक्तिकरण के एक अवसर के रूप में देखती है। जाति संख्याबल के आधार पर पार्टियाँ भी उम्मीदवार को टिकट देती है। वोटर में वह दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाया है कि वह अपने बीच से अपना प्रतिनिधि चुने। उसे अपने सामने परोसे गए दागी, कम दागी और ज्यादा दागी में से एक के पक्ष में अपना मत देना होता है। यद्यपि चुनाव में नोटा की व्यवस्था है, लेकिन वह बस एक व्यवस्था ही है।

भारतीय राजनीति में वंशवाद और राजनीतिक परिवारवाद प्रचलित हैं, जो समाज सेवकों को समान अवसर से वंचित करते हैं। देखने में आता है कि आजादी के बाद से भारतीय लोकतंत्र में कुछ राजनीतिक परिवारों का वर्चस्व बना हुआ है। लगता है राजनीति उनका पैतृक व पारिवारिक व्यवसाय है। लगता है लोकतंत्र के भीतर राजतंत्र पल रहा है। कहने को वे जनप्रतिनिधि होते हैं लेकिन अपने रसूख का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें दबंग की तरह देखा और माना जाता है। इधर जनता ने अनजाने में अपने को प्रजा मान लिया है। राजनीतिक परिवेश में नए लोग और नए विचार आ नहीं पाते हैं। ऐसा किसी एक या दो पार्टी में नहीं है, प्राय: हर पार्टी परिवारवाद की समस्या से पीड़ित है।

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है। आज के हालत में जनता को उसी का एक आसरा है। लोकतंत्र में मीडिया के पास विपक्ष की जिम्मेदारी होती है। यदि विपक्ष पर्याप्त संख्या में नहीं चुना गया है, या कमजोर है, तब विपक्ष का दायित्व मीडिया को निभाना पड़ता है। सच तो यह है कि मीडिया लोकतंत्र में एक समर्थ चौकीदार है। पुलिस हो, प्रशासन हो या सरकार ही क्यों ना हो, मीडिया सब पर प्रभावी निगाह रख सकता है। हाल के वर्षों में, भारतीय मीडिया की भूमिका ने उसके इस सम्मान को खंडित किया है। सोशल मीडिया एक नई चीज हो गई है, जिसका भरपूर इस्तेमाल राजनीति में होने लगा है। तकनीकी विकास ने टीवी को मोबाइल के स्क्रीन तक पहुंचा दिया। टीवी, मीडिया के बजाए मनोरंजन का एक उपकरण बन गया। जैसे जैसे उसे झूठ के बाजार का पता चला, धीरे-धीरे सच तक पहुंच कम होने लगी। नेता भी अपने वादों को पूरा करने में विफल रहते हैं और गलतियों की जिम्मेदारी लेने के लिए प्राय: अनिच्छुक होते हैं। जबकि स्वच्छ और मजबूत लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है। इससे नागरिकों में अविश्वास पैदा होता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निराशा पैदा होती है।

लोकतंत्र पर इन दीर्घकालिक हमलों और नागरिक स्वतंत्रता में गिरावट के कारण चिंताएं बढ़ रही हैं। यदि ये रुझान जारी रहे, तो भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के प्रतिकूल हो सकता है। हमारी राजनितिक व्यवस्था में लोकतंत्र के उच्च मूल्यों की स्थापना के लिए कमजोरियों को दूर करना और नवीनीकृत जवाबदेही, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है।

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