Sunday, April 12, 2026
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बीएस-4 मॉडल की बसों में बढ़ा ब्रेकडाउन का एवरेज

  • निगम की बसों के कारण यात्रियों को करना पड़ता है परेशानी का सामना

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मेरठ परिक्षेत्र में एक ओर बीएस-4 माडॅल की बसों की संख्या में 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, इसी अनुपात में ब्रेकडाउन की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। आए दिन रास्ते में ब्रेकडाउन का शिकार होने वाली निगम की बसों के कारण यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। मेरठ परिक्षेत्र से संचालित होने वाली कुल 651 बसों में मेरठ डिपो में 122, सोहराब गेट में 126, बड़ौत डिपो में 63, गढ़ डिपो में 82 यानि 393 बसें निगम की हैं।

जबकि भैंसाली डिपो में सभी 169 बसों समेत पांचों डिपो में 258 अनुबंधित बसें हैं। इन बसों के रखरखाव के लिए हर डिपो में एक-एक वर्कशॉप मौजूद है। जिनमें फोरमैन के साथ पर्याप्त संख्या में मैकेनिक और सहायक कार्यरत हैं। इस टीम का कार्य यही है कि रूट से लौटकर आने वाली बसों का रुटीन निरीक्षण करके उसके फाल्ट को दूर किया जाए। बस के इंजन से लेकर बॉडी और सीट आदि की कमियों को दूर किया जाए।

कोई भी फाल्ट अगर उनकी पकड़ में न आए, तो बस को तत्काल रीजनल वर्कशॉप मोदीपुरम में भिजवाया जाए। इन बसों के ठीक होने की जांच करने के लिए फोरमैन से लेकर संबंधित एआरएम तक उत्तरदायी होते हैं। इसके बावजूद मेरठ क्षेत्र में आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें कोई न कोई बस खराब हो जाने के कारण रास्ते में खड़ी देखी जाती है।  हालांकि इनमें मेरठ रीजन के अलावा यहां से गुजरने वाली विभिन्न अन्य रीजन और प्रांतों से आने वाली बसें भी शामिल होती हैं।

बसों के किसी भी कारण से खराब होने की स्थिति में उसमें सवार यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें गंतव्य तक पहुंचने के लिए अन्य बसों का सहारा लेना पड़ता है, जिसमें बसों के इंतजार से लेकर उसमें मिलने वाली भीड़ आदि से भी रूबरू होना पड़ता है। फैमिली और सामान के साथ यात्रा करने वालों की परेशानी का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

एक डिपो में काम करने वाले अधिकारी ने बताया कि 2018 के बाद से बीएस-4 बसों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। एक अनुमान के अनुमान मेरठ परिक्षेत्र में मौजूद निगम की कुल बसों में से 60 प्रतिशत बसें नए मॉडल की हैं। इन नए मॉडल की बसों की एक कमजोरी यह है कि इनकी वायरिंग किसी न किसी कारण से फाल्ट का शिकार हो जाती है। साथ ही इनके पम्प भी काम करना या लोड लेना बंद कर देते हैं। इसका पता पुल और चढ़ाई वाले रास्ते पर चल पाता है।

जहां सभी यात्रियों को दूसरी बसों में भेजकर खराब बस को जैसे तैसे वर्कशॉप लाकर उसका फाल्ट ठीक कराया जाता है। अधिकारी का कहना है कि बीएस-3 तक के मॉडल की बसों में हालांकि वायरिंग जैसी दिक्कत नहीं आती। जिसके चलते उसकी ज्यादातर खराबी को मौके पर ही ठीक करके बस को गंतव्य तक भेज दिया जाता है।

बीएस-4 और इससे ऊंचे माडल की बसों की संख्या बढ़ी है, ऐसी गाड़ियों में ज्यादातर वायरिंग और पम्प से जुड़े फाल्ट आते हैं। जिन्हें मौके पर डिटेक्ट करने का काम मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बसों को मोदीपुरम स्थित मुख्य वर्कशॉप में लाकर तसल्ली से कंप्यूटराइज्ड मशीनों से फाल्ट को डिटेक्ट करने का काम किया जाता है।

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कभी-कभी इसमें बहुत अधिक समय लग जाता है, जिसके कारण डिपो वर्कशॉप या मौके पर काम करने के बजाय ऐसी ब्रेकडाउन होने वाली बस को मुख्य वर्कशॉप में लाकर ठीक कराया जाता है। उन्होंने माना कि एक-दो बसों के ब्रेकडाउन होने का औसत प्रतिदिन आ जाता है। -लोकेश राजपूत, सेवा प्रबंधक, मेरठ परिक्षेत्र

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