
एक नजर डाल कर किसी को भी देख लीजिए। किसी न किसी उधेड़बुन, जोड़तोड़ में लगा पाएंगे। आपाधापी का ही दूसरा नाम आज जिंदगी हो गया है। किसी को चैन नहीं। घड़ी भर रुकने व सांस लेने की फुर्सत नहीं। भागमभाग मची है। आज का इंसान-इंसान रहा ही नहीं। मनुष्यत्व के आधारभूत गुणों, मूल्यों, विशिष्टताओं को उसने तिलांजलि ही दे दी है। वह एक चूहा दौड़ में शामिल हो कर लगातार दौड़ता जा रहा है, बस दौड़ता ही जा रहा है-सरपट, बेतहाशा, बदहवास, एक ऐसी दौड़, जिस का कोई अंत नहीं, कोई मंजिल नहीं, कोई अभिप्राय नहीं, जिस में विश्राम का कहीं नाम नहीं, कोई काम नहीं।
हम आज भौतिक इच्छाओं के ऐसे भंवर, मकड़जाल में जा पड़े हैं जिस का कोई ओर छोर नहीं, कोई किनारा नहीं, कोई निकास नहीं। देखा देखी हम उन वस्तुओं व सुविधाओं की प्राप्ति और संग्रह में जुट गए हैं, जिन की न कोई सीमा है न अंत। साइकिल है तो मोपेड की इच्छा, मोपेड है तो मोटरसाइकिल चाहिए। मोटरसाइकिल है तो कार की लालसा, कार है तो वातानुकूलित होनी चाहिए। विदेशी, आयातित होनी चाहिए।
बात कपड़े की हो, जूते की हो या मकान की, बच्चे के लिए स्कूल के चुनाव की हो या कन्या के लिए वर की तलाश की, हम किसी से भी पीछे नहीं रहना चाहते। अपने साधनों और सामर्थ्य की भी अनदेखी कर देते हैं। चूहा दौड़ से बाहर रहना हमें कुबूल नहीं। सयाने समझदार विवेकशील हो कर भी हम यह नहीं सोचते कि हम किस-किस की बराबरी करेंगे। कहां तक करेंगे। क्या जीवन भर हांफते-कांपते इस भ्रमजाल में स्वयं को जकड़े रहेंगे। क्या अमूल्य मनुष्य योनि हमें इसी हेतु मिली थी। क्या जीवन का उद्देश्य मात्र यही काठ कबाड़ जमा करना भर है। मनीषियों ने बहुत सोच विचार के बाद सादा जीवन उच्च विचार का मूल मंत्र हमें दिया था। खेद है कि हम उस बहुमूल्य सूत्र को भी भुला बैठे।
इस चूहा दौड़ के परिणामस्वरूप हम रक्तचाप बढ़ाते हैं। मधुमेह का राजरोग पालते हैं। हृदय रोग से ग्रस्त होते हैं। अन्य भांति भांति की व्याधियों व विकारों का शिकार बनते हैं। जीवन का सहज सुलभ आनन्द गंवा बैठते हैं। इन भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति हेतु साधन जुटाने में अथक परिश्रम करके अपने शरीर के साथ अत्याचार करते हैं। अनुचित साधन अपनाते हैं। एक ऐसे दुष्चक्र में घिर जाते हैं जिस से निकल पाना दुष्कर होता है।
मजे की बात तो यह है कि जिन सुविधाओं को जुटाने में हम रात दिन एक किए रहते हैं, उन्हीं का उपयोग करने के लिए न हमारे पास समय ही रह पाता है न ही सामर्थ्य। हमारी नियति एक कोल्हू के बैल की सी हो कर रह जाती है। कैसी विडंबना है कि हम और और के मायाजाल में फंसे उस का भी आनंद नहीं ले पाते जो हमारे पास सहज उपलब्ध है। खेद है कि होश उस वक्त आता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। जब पछताने से भी कुछ हासिल नहीं होता। तब बोध होता है कि ईश्वर का दिया अमूल्य जीवन बेकार खो दिया, नष्ट कर दिया। जीवन भर एक मृगतृष्णा के पीछे भागते रहे। जीवन में उद्योग, उद्यम, उपक्र म, संघर्ष का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता। सफल जीवन, सहज जीवन यापन, परिवार के सुचारू पालन पोषण हेतु प्रयास आवश्यक हैं, मगर चूहा दौड़ में शामिल होना कतई जरूरी नहीं। करोड़पति सेठ और बीसियों मिलों का मालिक उद्योगपति भी खाता तो गेहूं की दो रोटी ही है। अक्सर वह भी नहीं पचा पाता। फिर यह दिन रात की हाय-हाय क्यों और किस लिए।
जीवन में सब्र और संतोष को सब से बड़ा धन माना गया है। संतोष की प्रवृत्ति को जीवन में प्रविष्ट करके तो देखिए। एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति होगी। सुख की नींद सोएंगे। मन-मस्तिष्क हल्का फुल्का रहेगा। जीवन वास्तव में जीने योग्य लगने लगेगा। निकल आइए इस चूहा दौड़ से समय रहते। भौतिक धन-संपदा से कहीं अधिक मूल्यवान है संतोष धन। एक बार अनुभव कर के तो देखिए।


