Wednesday, March 25, 2026
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बाबा शाहमल: जिन्होंने लंबे अरसे तक अंग्रेजों को चैन से सोने नहीं दिया

  • जिनकी शहादत पर अंग्रेजों ने सिर को भाले पर टांगकर लगाई थी प्रदर्शनी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: जिले के समस्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में अंग्रेजों के लिए भारी खतरा उत्पन्न करने वाले बाबा शाहमल ऐसे क्रांतिदूत थे, जिन्होंने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए लम्बे अरसे तक अंग्रेजों को चैन से नहीं सोने दिया था। पहले से ही अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन चुके बाबा शाहमल ने मेरठ से उठी प्रथम क्रांति के समय अपनी सेना के साथ अंग्रेजों से आमने-सामने की जंग की। इसी जंग में 18 जुलाई 1857 को अपने साथियों के साथ शहादत हासिल करने वाले शाहमल का सिर काटकर अंग्रेजों ने भाले पर टांगते हुए पूरे इलाके में घुमाते हुए सार्वजनिक रूप से इसकी प्रदर्शनी लगाई थी।

डॉ. महेंद्र नारायण शर्मा और डॉ. राकेश शर्मा ने एक पुस्तक ‘सन सत्तावन का क्रांतिवीर बाबा शाहमल जाट’ के नाम से प्रकाशित करते हुए उसमें प्रमुख तथ्यों का उल्लेख किया है। इस पुस्तक समेत विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक बाबा शाहमल सिंह तोमर का जन्म बिजरौल गांव में 11 फरवरी 1797 को चौधरी अमीचंद तोमर किसान के घर हुआ था। आजादी के मतवाले बाबा शाहमल की देशभक्ति और नेतृत्व क्षमता की बात दिल्ली दरबार में बादशाह तक पहुंची।

बादशाह के दिशा-निर्देशन में शाहमल ने न केवल अंग्रेजों के संचार साधनों को ठप किया, बल्कि अपने इलाके को दिल्ली के क्रांतिवीरों के लिए आपूर्ति क्षेत्र में बदल दिया। अपनी बढ़ती फौज की ताकत से उन्होंने बागपत के नजदीक जमुना पर बने पुल को नष्ट कर दिया। उनकी इन सफलताओं से उन्हें 84 गांवों का आधिपत्य मिल गया। जिसे आज तक देश खाप की चौरासी कह कर पुकारा जाता है। वह एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में संगठित करके जमुना के बाएं किनारे का राजा बन बैठे।

जिससे कि दिल्ली की उभरती फौजों को रसद जाना कतई बंद हो गया और मेरठ के क्रांतिकारियों को मदद पहुंचती रही। इस प्रकार वह एक छोटे किसान से बड़े क्षेत्र के अधिपति बन गए। दिल्ली दरबार और शाहमल की आपस में संधि को देखते हुए अंग्रेजों ने समझ लिया कि दिल्ली की मुगल सता को बर्बाद करना है तो शाहमल की शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आवश्यक है। उन्होंने शाहमल को जिन्दा या मुर्दा उसका सर काटकर लाने वाले के लिए 10 हजार रुपये का इनाम घोषित किया।

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बाबा शाहमल ने सभी वर्ग के लोगों का नेतृत्व किया। 10 मई को मेरठ से शुरू विद्रोह की लपटें हर तरफ फैल गई। शाहमल ने जहानपुर के गूजरों को साथ लेकर बड़ौत तहसील पर चढ़ाई कर दी। उन्होंने तहसील के खजाने को लूट कर उसकी अमानत को बरबाद कर दिया। 12 और 13 मई 1857 को बाबा शाहमल ने सर्वप्रथम साथियों समेत बंजारा व्यापारियों पर आक्रमण कर काफी संपत्ति कब्जे में ले ली, और बड़ौत तहसील और पुलिस चौकी पर हमला बोल की तोड़फोड़ व लूटपाट की।

दिल्ली के क्रांतिकारियों को उन्होंने बड़ी मदद की। क्रांति के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण की भावना ने जल्दी ही उनको क्रांतिवीरों का सूबेदार बना दिया। छपरा गांव के त्यागियों, बसोद के जादूगर और बिचपुरी के गूर्जरों ने भी शाहमल के नेतृत्व में क्रांति में पूरी शिरकत की। अम्हेड़ा के गूर्जरों ने बड़ौत व बागपत की लूट व एक महत्वपूर्ण पुल को नष्ट करने में हिस्सा लिया। 18 जुलाई 1857 में क्रांतिकारी नेता शाहमल को पकड़ने के लिए अंग्रेजी सेना संकल्पबद्ध हुई।

लेकिन लगभग सात हजार सैनिकों सशस्त्र किसानों व जमींदारों ने डटकर मुकाबला किया। शाहमल के भतीजे भगत के हमले से बाल-बाल बचकर सेना का नेतृत्व कर रहा डनलप भाग खड़ा हुआ और भगत ने उसे बड़ौत तक खदेड़ा। इस समय शाहमल के साथ दो हजार शक्तिशाली किसान मौजूद थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में विशेष महारत हासिल करने वाले शाहमल और उनके अनुयायियों का बड़ौत के दक्षिण के एक बाग में खाकी रिसाला से आमने सामने घमासान युद्ध हुआ।

इसी युद्ध में शाहमल तलवार के गिर जाने पर अपने भाले से दुश्मनों पर वार करते रहे। इस दौर में उनकी पगड़ी खुल गई और घोडे के पैरों में फंस गई। जिसका फायदा उठाकर एक फिरंगी सवार ने उन्हें घोड़े से गिरा दिया। अंग्रेज अफसर पारकर ने शाहमल के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करवा दिए और उनका सर काट कर एक भाले के ऊपर टंगवाकर पूरे इलाके में परेड कराई गई।

बाबा शाहमल ने 1857 की जनक्रांति में तत्कालीन जनपद के तहसील बड़ौत और उसके आसपास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका भूमिका निभाई थी। मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले बाबा शाहमल का यह बलिदान एक आदर्श के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा। इस शहादत के एक महीने बाद ही 23 अगस्त 1857 को शाहमल के पौत्र लिज्जामल जाट ने क्रांति की मशाल को जलाया। और अपने 32 साथियों के साथ फांसी के फंदे को चूम लिया था।

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