Sunday, May 3, 2026
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भगत सिंह भी गांधी की तरह थे अहिंसावादी

 

Nazariya 15


Rohit Koshikपंजाब के मुख्यमंत्री के कार्यालय में लगी भगत सिंह और अंबेडकर की तस्वीरें इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पंजाब मुख्यमंत्री कार्यालय से महात्मा गांधी की तस्वीर को हटा दिया गया है। सवाल यह है कि क्या भगत सिंह की तस्वीर लगाने के लिए गांधी की तस्वीर हटाना जरूरी है? हर साल भगत सिंह की पुण्यतिथि और जन्मदिवस पर भगत सिंह चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। इस दौरान देश के कुछ बुद्धिजीवी भगत सिंह और गांधी जी के मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर उन्हें विवादित व्यक्तित्व बना देते हैं। ऐसे मौकों पर अनेक लोग पुराना राग अलापते हुए बार-बार भगत सिंह की फांसी के लिए महात्मा गांधी को जिम्मेदार ठहराते हैं।

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ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने का प्रयास किया था। यह कुछ बुद्धिजीवियों की सोची-समझी साजिश है। दरअसल समाज का एक वर्ग भगत सिंह को उग्र राष्ट्रवादी के तौर पर प्रस्तुत कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करना चाहता है।

आमतौर पर हमारे समाज में यह एक भ्रम है कि महात्मा गांधी और भगत सिंह एक-दूसरे के धुर विरोधी थे। दरअसल भगत सिंह प्रारम्भ से ही गांधी जी से प्रभावित रहे। शुरू में गांधी जी के आ’ान पर ही उनका स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव हुआ। असहयोग आंदोलन के दौरान भगत सिंह जलसों में जाकर नेताओं के भाषण सुनते थे, लेकिन जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया। इसके बाद महात्मा गांधी के विचारों का उनके मानस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और वे सब कुछ छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1922 में चौरी-चौरा की घटना से दुखी होकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इस फैसले के लिए गांधी जी को जनता का विरोध सहना पड़ा। गांधी जी के इस फैसले से भगत सिंह आहत हुए और उन्हें लगा कि अहिंसात्मक तरीके से आजादी हासिल नहीं की जा सकती।

इसके बाद भगत सिंह ने सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। लेकिन उनकी क्रान्ति में हिंसा होते हुए भी कहीं न कहीं अहिंसा का भाव था। क्रान्ति के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा-‘हमारा उद्देश्य ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर दे। क्रान्ति में घातक संघर्षों का अनिवार्य स्थान नहीं है ,न उसमें व्यक्तिगत रूप से प्रतिशोध लेने की गुंजाइश है। क्रान्ति बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रान्ति से हमारा प्रयोजन यह है कि अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए।’

भगत सिंह द्वारा परिभाषित क्रान्ति का यह स्वरूप अहिंसात्मक ही है।
भगत सिंह ने जब असेंबली में बम फेंके तो उनके मन में कोई हिंसात्मक भाव नहीं था। इसलिए उन्होंने जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम न फेंककर खाली पड़ी हुई बेंचों पर फेंके और पिस्तौल से दो हवाई फायर किए। इसके बाद भी भगत सिंह वहां से भागे नहीं, बल्कि चेतावनी भरे शब्दों मे अंग्रेजी सरकार को संबोधित पर्चे अपनी जेब से निकालकर असेंबली हाल में फेंकने शुरू कर दिए और अन्तत: इन्कलाब जिंदाबाद के नारों के साथ हंसते-हंसते अपनी गिरफ्तारी दे दी। अगर वे चाहते तो बम फेंककर अनेक लोगों को मौत के घाट उतार सकते थे लेकिन भगत सिंह ऐसी हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे। यही कारण है कि वे एक सत्याग्रही की तरह हंसते-हंसते गिरफ्तार हो गए। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक बार एक सच्चे सत्याग्रही की तरह व्यवहार किया।

भगत सिंह जब असेंबली बम कांड़ में जेल काट रहे थे तो जेल में बेहतर सुविधाएं देने की मांग को लेकर उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। भूख हड़ताल की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई और पूरा देश क्रान्तिकारियों के पक्ष में आ खड़ा हुआ। इसी दौरान यतींद्रनाथ दास भूख हड़ताल करते हुए शहीद हो गए। इस तरह भगत सिंह तथा उनके कुछ अन्य साथी क्रान्तिकारियों ने सत्याग्रह के रास्ते पर चलते हुए एक तरह से गांधीवादी रवैया ही अपनाया।

दरअसल गांधी जी अहिंसा के समर्थक थे। गांधी जी ताउम्र जिस अहिंसा की वकालत करते रहे वह कायरता के नहीं बल्कि बहादुरी के तत्व से ओत-प्रोत थी। वे मुख्यत: अन्याय के विरोधी थे। उनका कहना था-‘किसी भी हालत में अन्याय मत सहो। अहिंसा को अपनाने की हर संभव कोशिश करो। लेकिन यदि तुम अहिंसा को अपनाकर अन्याय सह रहे हो तो उस अहिंसा का कोई मतलब नही है। अन्याय को दूर भगाने के लिए यदि तुम्हें हिंसा का भी सहारा लेना पड़े तो उसमें कुछ गलत नहीं है।’ अन्याय दूर करने के लिए भगत सिंह भी एक तरह से गांधीवादी रास्ते पर ही चले। असेंबली बम कांड मुकदमे की सुनवाई के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कहा -‘हम मानव जीवन को अकथनीय पवित्रता प्रदान करते हैं और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने के बजाय मानव जाति की सेवा में हंसते-हंसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे।’

अहिंसा की वकालत करते हुए उन्होंने लिखा-‘हिंसा तभी न्यायोचित है, जब किसी विकट आवश्यकता में उसका सहारा लिया जाए। अहिंसा सभी जनान्दोलनों का अनिवार्य सिद्धान्त होना चाहिए।’ बहरहाल भगत सिंह को उग्र राष्ट्रीयवादी  के तौर पर प्रस्तुत करने वाले बुद्धिजीवी गांधी और भगत सिंह को भले ही अलग-अलग ध्रुवों पर खड़ा करने की कोशिश क्यों न कर लें, लेकिन भगत सिंह के अहिंसात्मक रवैये को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हिंसात्मक होते हुए भी उनका रवैया गांधीवादी ही रहा। आज जरूरत इस बात की है कि पंजाब में आप पार्टी की सरकार भगत सिंह और अंबेडकर के साथ गांधी की तस्वीर लगाकर गांधी को भी उचित सम्मान दे।


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