Monday, March 23, 2026
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प्रियंका के लिए बड़ा मौका, संगठन बनेगी कमजोरी

  • देश की वर्तमान राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार से जनवाणी की विशेष बातचीत

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: क्या कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी का एग्रेसिव चेहरा मुफीद साबित हो सकता है। यही नहीं, कांग्रेस के नए सफर के लिए फिर से तैयारी का दंभ भी भर सकता है। बड़ा सवाल यह है कि प्रियंका गांधी का वास्तविक चेहरा क्या है? क्या यह उनका अग्रेसिव अवतार है?

क्या वह कांग्रेस की इस मुश्किल घड़ी में कांग्रेस की नैया को पार लगा सकेंगी और कांग्रेस पार्टी का मोर्चा संभाल सकती हैं। यदि संभालती है तो उसका देश की राजनीति पर और 2024 में होने वाले आम चुनाव पर क्या असर पड़ेगा? इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए ‘जनवाणी’ ने लंबे समय तक राजनीति की रिपोर्टिंग करने वाले धुरंधर वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत की।

वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा ने कांग्रेस का नेतृत्व कोई भी करें, चाहे प्रियंका गांधी करें, लेकिन जो जोश वर्तमान में हैं, इसे निरंतर कांग्रेस रख पाएंगी, इसमें सभी को शंका हैं। उसमें निरंतरता नहीं रहती, जिसके चलते क्षिण-भिन्न हो जाती हैं। मुद्दा तो उठाया जाता हैं, लेकिन उसे आगे नहीं बढ़ाया जाता हैं। आपदा को अवसर के रूप में भुनाने की जरुरत हैं। हाथरस कांड के बाद भी प्रियंका पहुंची थी।

इसे वोट में कैसे तब्दील कर सकते हैं? कारण निरंतरता नहीं दे पाना हैं। राजनीतिक पर्यटन करने के लिए प्रियंका यूपी में आती हैं, ऐसे तो कांग्रेस जिंदा नहीं हो पाएंगी। बहु अच्छा बोलती हैं, लेकिन पार्टी का संगठन नहीं हैं। कैसे वोट में तब्दील हो पाएंगे। जैसे कि मुम्बई में शिवसेना, उद्धव ठाकरे का कांग्रेस से गठबंधन है, लेकिन वह पदयात्रा के दौरान वीर सावरकर पर उनकी विचारधारा को लेकर राहुल गांधी बयानबाजी कर देते हैं,

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तो अवसर में आपदा तलाशने वाली बात कांग्रेस एवं राहुल गांधी पर सटीक बैठती है। यही वजह है कि सोनिया,राहुल एवं प्रियंका की भावना वोट में तब्दील नहीं हो पाती, जिसमें सबसे प्रमुख कारण कांग्रेस का संगठन जिला व बूथ स्थर पर कमजोर होना माना जा सकता है। यदि संगठन मजबूत नहीं है तो वह वोटर तक कैसे पहुंच पायेंगे?

वरिष्ठ साहित्यकार व्यंगकार निर्मल गुप्ता ने कहा कि राहुल गांधी की संसदीय सदस्यता खत्म की गई है, उसके द्वारा भारतीय जनता पार्टी के द्वारा जो कदम उठाया गया है। ये एक तरह से भाजपा ने कांग्रेस को पुनर्जिवित होने का मौका दिया है, लेकिन कांग्रेस के पास जमीनी संगठन मजबूत नहीं है। जिसके चलते कांग्रेस किसी भी आपदा में मिले अवसर का लाभ नहीं उठा पाती।

प्रियंका, राहुल, सोनिया जोकि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी एवं राहुल गांधी के बलिदान को लेकर जनता की भावना को तो पार्टी के प्रति जगा देती है, लेकिन कमजोर संगठन के कारण इस भावना को वोटो में परिवर्तित नहीं कर पाती। जिस तरह से आज विपक्ष एकजुट है।

उसकी एकजुटता 2024 के चुनाव तक बना पायेंगे या नहीं। कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कोई दूसरी पार्टी के कुछ नेता सीरीयस पॉलिटिशियन नहीं मानते। कांग्रेस भावना को वोटों में परिवर्तित कमजोर संगठन के कारण नहीं का पाती, यह एक उसकी हार का प्रमुख कारण माना जा सकता है।

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वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार प्रभात कुमार रॉय ने बताया कि देश की आजादी से पूर्व ही कांग्रेस का देश में मजबूत संगठन अस्तित्व में था। कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और देश की आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री कांग्रेस से ही स्व. पंडित जवाहर लाल नेहरू बने। वह कांग्रेस नेहरू या राहुल गांधी के विचारों वाली पार्टी नहीं थी, बल्कि महात्मा गांधी के विचारों वाली पार्टी थी।

देश की आजादी के बाद से 55 वर्षों तक कांग्रेस ने देश की सत्ता पर राज किया। जिसमें 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी में निरंतर गिरावट होती चली गई। कांग्रेस किसान, मजदूर वर्ग की पार्टी थी, जोकि उनके द्वारा किसान, मजदूर व उद्यमियों के बीच तालमेल न बैठाकर उद्यमियों को अधिक बढ़ावा देना-सभी के बीच बैलेंस न बनाना एवं किसान मजदूर की उपेक्षा करना ही कांग्रेस के पतन का कारण होता चला गया।

जब तक कांग्रेस पुन: महात्मा गांधी वाली कांग्रेस पर नहीं लौटेगी, तब तक कांग्रेस का देश की सत्ता में आसीन होना आसान काम नहीं होगा। कांग्रेस सर्कुलर पार्टी खुद को बताती है, लेकिन वह सर्कुलर भी नहीं दिखाई देती। वह दो नाव में सवार करने वाली पार्टी दिखाई देती है, जोकि भाजपा का एजेंडा साफ है कि वह राममंदिर जैसा मामला हो वह खुलकर जनता के बीच अपनी बात बेबाकी से रख देती है।

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उसमें चाहे हिंदू राष्ट्र वाली ही बात क्यों न हो? हिंदू-मुस्लिम का विवाद देश की आजादी से पूर्व था, लेकिन कांग्रेस की चुप्पी उसके पतन का कारण बनी। उसमें चाहे शिक्षा का दोहरीकरण नहीं बल्कि तीहरी करण कहा जाये या फिर डा. महनमोहन सिंह की आर्थिक नीति रही हों। कांग्रेस को अपनी मूल पार्टी के सिद्धांतों पर लोटने के बाद ही केंद्र में सत्ता पर आसीन होने का ख्वाब देना होगा।

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