जब रेल पटरी से उतरने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। उस पर रेलमंत्री का आए दिन बिहार चले जाना, सोने में सुहागा है। रेलों में क्या नहीं हो रहा। दुष्कर्म तो मामूली सी घटना बनकर रह गया है। खुलेआम सामूहिक दुष्कर्म और रेल प्रशासन मुआवजे तक बात सीमित कर बात को रफा-दफा कर लेना चाहता है। जिस हिसाब से रेलों की गति बढ़ी है, अपरोधों का ग्राफ भी उसी गति से बढ़ रहा है। आदमी रेल टिकिट लेता है और सुरक्षा के नाम पर मिलती है तोहमत। सुरक्षित रेल यात्रा अब मुश्किल लगने लगी है। जैसे आजकल लोग नाइट शो देखने नहीं जाते हैं, उसी तरह रात्रि में रेलयात्रा एकदम असुरक्षित हो गई है। रेलें अपराध स्थल तो बन ही गई हैं, साथ ही साथ रोज टकरा रही हैं और पटरियों से उतरकर मौत का ताण्डव कर रही हैं। रेलों की व्यवस्था कैसे सुधरे, इस पर सरकार और रेलमंत्री को एक साथ ध्यान देना चाहिए।
रेलों की गति और संख्या बढ़ाये जाने से कोई सुव्यस्थित कार्य योजना नहीं बनती है। गुण्डों, लुच्चे, लफंगों को रेलों में बैठने से रोकना होगा और कानून की सख्ती से उन्हें कड़े रूप में दण्डित करने की आवश्यकता है। रेलमंत्री किसी उस आदमी को बनाया जाना चाहिए, जो संवेदनशील हो। किसी ने दबाव बनाया कि मुअे रेलमंत्री बनाओ और प्रधानमंत्री ने उसे रेल मंत्रालय आफर कर दिया, यहां यही चिंतनीय है। प्रधानमंत्री ऐसे हो गए हैं, जैसे उन्हें उनकी सरकार के अन्य मंत्रालयों से कोई लेना-देना नहीं है। अपने प्रधानमंत्री तक सीमित होकर रह गए हैं। ऐसा गठबंधन तैयार हुआ है कि सबको मनमर्जी से कुछ भी करने की आजादी मिल गई है। ऐसे दबावों से सरकारें नहीं चला करतीं। जो लोग सही काम नहीं कर रहे, उन्हें हटा देना चाहिए। केवल सीधे-सादे सज्जनता का लेबल लगाए रखने से देश नहीं चलता। रेलें रोज लाखों लोगों को उनके गन्तव्य तक पहुंचाने का महती कार्य करती हैं। यही कार्य सुरक्षित नहीं है तो इसके दुरूस्त करने की व्यावहारिक रूप से आवश्यकता है।
रेलमंत्री बने तो क्रान्तिकारी परिवर्तन की बात कर रहे थे और जब अर्सा बीत गया तो कुल्हड़ में हुल्लड़ की छूट दे दी गई। यात्रियों को यह देंगे, वह देंगे, किराया कम लेंगे, कुल्हड़ में चाय देंगे, लेकिन जो बिहार से लाए थे, वह पूरा का पूरा रेल में झोंक दिया। खुद की रेल पटरी पर दौड़ती रहे और पटरी वाली रेल जाये भाड़ में। पत्नी से सत्ता छिन जाने का इतना मलाल कि रेलों में फैल रहे अपराध और अव्यवस्थाए उन्हें दिखाई ही नहीं दे रहीं। गठबंधन की नेता भी चुप हैं, उनसे ऐसे मंत्रणा करती दिखाई देती हैं, मानों वे किसी ज्ञानी पुरूष से संवाद कर रही हों। जिसे सबने रिजेक्ट कर दिया, उसे आपने एडजस्ट कर लिया। चलो ठीक है उनका रेलमंत्री बने रहना तालमेल की दृष्टि से जरूरी लगता है तो उन्हें रेलों में प्रशासनिक तंत्र ठीक करने को तो कहो। रेल की बात कम और बिहार की ज्यादा। वहां सत्ता बदल गई तो पेट में दर्द हो रहा है कि वे कहीं बिहार को नया नहीं बना दें। अरे क्यों चिंता करते हो बिहार तो बिहार ही रहने वाला है। आप तो रेल संभालो और दुष्कर्मों को रोको।

