
लोकसभा में बुधवार को गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किए गए संविधान (130वां संशोधन) विधेयक ने भारतीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विधेयक का मुख्य प्रावधान यह है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसकी कुर्सी स्वत: चली जाएगी। पहली नजर में यह व्यवस्था अपराध और राजनीति के गठजोड़ को खत्म करने का प्रयास प्रतीत होती है, लेकिन इसके राजनीतिक और संवैधानिक निहितार्थ बेहद गहरे हैं।
सबसे पहले इस बिल के उद्देश्य की बात करें। सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अपराध के गंभीर आरोप झेल रहे नेता सत्ता में बने रहकर अपनी स्थिति का दुरुपयोग न कर सकें। पिछले वर्षों में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जैसे बड़े नेताओं के जेल जाने के बाद भी पद पर बने रहने या लंबे समय तक सत्ता संरचना पर प्रभाव बनाए रखने की घटनाएं हुई हैं। इस तरह के मामलों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या राजनीति को अपराधमुक्त बनाने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता नहीं है। इस दृष्टि से यह विधेयक साफ-सुथरी राजनीति की दिशा में एक साहसिक कदम माना जा सकता है।
लेकिन लोकतंत्र केवल इरादों से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन से चलता है। विपक्ष का तर्क है कि यह बिल लोकतंत्र विरोधी और असंवैधानिक है। संविधान का मूलभूत सिद्धांत है कि ‘जब तक दोष सिद्ध न हो, कोई भी निर्दोष माना जाएगा।’ यहां केवल गिरफ्तारी और 30 दिन हिरासत के आधार पर किसी को पद से हटाना न्याय के इसी सिद्धांत के खिलाफ है। गिरफ्तारी राजनीतिक बदले की भावना से भी हो सकती है। एजेंसियों जैसे सीबीआई और ईडी पर पहले से ही पक्षपात और सत्ता के दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि सत्ता में बैठी सरकार इस कानून का इस्तेमाल विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने और नेताओं को बदनाम करने के लिए कर सकती है।
एक और बड़ा सवाल संघीय ढांचे पर उठता है। यदि यह कानून लागू हो जाता है, तो केंद्र के पास यह शक्ति होगी कि वह राज्य के किसी भी मुख्यमंत्री को 30 दिन की हिरासत के बहाने पद से हटवा दे। इससे राज्यों की स्वायत्तता और संघीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ओवैसी का यह कहना कि यह बिल केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ाएगा, काफी हद तक सही प्रतीत होता है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी यह सवाल उठाया कि जब गिरफ्तारी का फैसला जांच अधिकारी पर ही निर्भर करेगा, तो लोकतंत्र में “जांच अधिकारी ही बॉस” बन जाएगा।
संसद में इस बिल को लेकर जो घटनाक्रम हुआ, वह भी बेहद नाटकीय रहा। विपक्षी सांसदों ने बिल की प्रतियां फाड़ दीं और उन्हें गृह मंत्री की ओर फेंका। यह घटना दिखाती है कि विपक्ष इस प्रावधान को लेकर कितना आशंकित और आक्रोशित है। अमित शाह ने अंतत: बिल को संयुक्त समिति को भेजने का प्रस्ताव किया, ताकि इस पर गहन विचार हो सके। यह कदम एक तरह से सरकार की रणनीति भी है, जिससे विपक्ष की आशंकाओं को शांत करने का प्रयास किया जा सके।
इस पूरे विवाद का निष्कर्ष यह है कि राजनीति और अपराध के गठजोड़ को तोड़ने की दिशा में यह बिल स्वागत योग्य पहल है, लेकिन इसकी प्रक्रिया और प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। यदि इसे जल्दबाजी में लागू किया गया तो लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा-न्याय, स्वतंत्रता और संघीय संतुलन-को नुकसान पहुंच सकता है। बेहतर होगा कि समिति में इस पर गहन विमर्श हो, विपक्ष की आपत्तियों को गंभीरता से लिया जाए और ऐसा संतुलित समाधान निकाला जाए जिससे अपराधी नेताओं पर नकेल कसी जा सके लेकिन निर्दोष नेताओं के राजनीतिक अधिकार सुरक्षित रहें।
संक्षेप में कहा जाए तो यह विधेयक भारतीय राजनीति के लिए एक दो धार वाली तलवार है-यह राजनीति को अपराधमुक्त भी कर सकता है और अगर सावधानी न बरती गई तो लोकतंत्र को अस्थिर भी कर सकता है।

