Saturday, June 22, 2024
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जन्म दिवस 22 अक्टूबर: भूख के अहसास से रौशनी के बांकपन तक के कवि थे अदम

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krishna pratap singhवे सौभाग्यशाली थे कि यह असली सम्मान उनके हिस्से में भी खूब आया। यों, कवि के तौर पर उनका एक ही सपना था। अपनी एक गजल में वे उसे इस प्रकार बता गए हैं: एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें, झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो। वे ताजिन्दगी दुखी रहे कि उन्हें यह रास्ता हमवार होता देखना नसीब नहीं हुआ। उलटे आसम लोगों के लिए स्थिति यह हो गई कि चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें, चूल्हे पे क्या उसूल पकायेंगे शाम को? जनकवि अदम गोंडवी को, जिनकी आज जयंती है, इस संसार को अलविदा कहे अभी बारह साल ही बीते हैं, लेकिन हिन्दी काव्य-संसार ने उन्हें इस तरह भुला दिया है कि उनकी यादों पर पड़ी विस्मरण की धूल उनकी जयंतियों व पुण्यतिथियों पर भी नहीं झाड़ता। यह और बात है कि उनकी कई गजलें अभी भी जन अभियानों व आंदोलनों की सहचरी बनी हुई हैं। साथ ही, उनमें पूछे गए सवालों को अभी भी जवाब की दरकार है। लेकिन जहां तक जवाब की बात है, वह तो इस सवाल का भी नहीं ही मिल रहा कि क्या अदम ऐसे विस्मरण के पात्र थे? अलबत्ता, यह सवाल उनकी उस चिंता को जायज करार देता है, जिससे वे अपनी अंतिम सांस तक जूझते रहे। वह चिन्ता थी देश में बेहतर समाज निर्माण के सारे संघर्षों को बीच में छोड़ दिये जाने की।

जब भी मौका मिलता, वे संत कबीर-सी फक्कड़ शैली में कहते थे, ‘बेतिर समाज निर्माण के सारे संघर्ष पटरी से उतर गये हैं। इसलिए हमारा समाज बेहतर होने के बजाय और बीमार होता जा रहा है। लोग पहले से ज्यादा आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों में भी कई तरह की बीमारियाँ घर कर गई हैं। इस कारण उनका सृजन भी संघर्ष की आंच में तपकर और बेहतर होकर नहीं आ रहा।’

प्रसंगवश, अदम 1947 में आजादी मिलने के महज दो महीने बाद 22 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में आटापरसपुर गांव के गजराजसिंह पुरवा में जन्मे और 64 साल लंबे जीवन संघर्षों के बाद 2011 में 18 दिसम्बर को लखनऊ के एक अस्पताल में दुनिया को अलविदा कह गए। इस अलविदा से पहले उन्होंने आर्थिक तंगी के साथ लंबी बीमारी का त्रास झेला। लेकिन उस त्रास के बीच भी उनके पास कई खुशनुमा यादें थीं, जिन्हें वे खुशी खुशी लोगों के साथ बांटते।

उनका मां-बाप का दिया नाम था रामनाथ सिंह और खुशकिस्मत थे कि अपनी पहली रचना ‘चमारों की गली’ छपकर आते ही वे हिंदी के समकालीन काव्यसंसार में चारों ओर छा गए। फिर तो अपनी गजलों की मार्फत शेरो-सुखन को भूख के अहसास, मुफलिसों की अंजुमन, बेवा के माथे की शिकन, रहबरों के आचरण और रोशनी के बांकपन तक ले चलने का आह्वान करते देश भर में घूमते रहे।

लेकिन साठ साल के होते-होते उन्हें कई तरह की बीमारियों व अभावों ने घेर लिया। उनसे निजात के भरसक प्रयासों के बावजूद अशक्तता बढ़ती ही गई तो रोष, क्षोभ और असंतोष के बीच अपने गांव गजराजसिंह पुरवा में ही दिन काटने लगे। फिर भी स्वाभिमान ऐसा कि उन्होंने अपने निधन से कुछ ही महीनों पहले इन पंक्तियों के लेखक से हुई बातचीत में निजी सुख-दु:ख पर बात करने से कतई मना कर दिया था।

फिर बताया था, ‘मैं पैदा हुआ तो देश में नई-नई आई आजादी का उल्लास था। लेकिन होश सम्भाला तो पाया कि इस उल्लास का कोई मतलब ही नहीं। क्योंकि शोषण और अत्याचार तो खत्म होने को ही नहीं आ रहे। कम से कम जिस ग्रामीण परिवेश का मैं हिस्सा था और जीवन भर रहा, वहां तो आज भी बदहाली ही राज करती आ रही है।’

वे स्कूल गए तो इसी बदहाली के कारण ज्यादा औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाए। फिर भी उन्होंने प्राइमरी शिक्षा के दौरान ही यशपाल, प्रेमचन्द और रांगेयराघव जैसे रचनाकारों को पढ़ डाला था। बाद में वे ‘मेरा दागिस्तान’ और ‘रामचरितमानस’ से भी बहुत प्रभावित हुए। वे बताते थे कि जब भी वे इन रचनाकारों को पढ़ते, उनके दिल व दिमाग में कई सवाल कुलबुलाने लगते। बाद में उन्होंने इन्हीं सवालों को अपने पाठकों व श्रोताओं से पूछना शुरू कर दिया। मसलन-सौ में सत्तर आदमी जब देश में नाशाद है, दिल पे रखकर हाथ कहिये देश ये आजाद है? बताने की जरूरत नहीं कि उन्होंने जिस तरह का तकलीफों भरा जीवन जिया, उसमें इस तरह के अनेक सवाल उनके आसपास और जेहन में आजीवन बिखरे रहे।

हम जानते हैं कि दुष्यन्त से पहले गजल आशिक और माशूक के बीच ही सिमटी रहती थी। दुष्यन्त उसकी बेड़ियां तोड़कर नई जमीन पर ले आए और उसको बदलाव का औजार बनाया तो अदम ने उन्हीं की परम्परा में ‘कुछ अलग’ करके अपनी अलग जगह बनाई। हां, किसी भी तरह की रूमानियत से प्रभावित हुए बिना।

उनकी मान्यता थी कि समाज और सृजन का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है, इसलिए दोनों का एक दूसरे पर असर होता है। अच्छा सृजन सामाजिक संघर्षों व आन्दोलनों से ही निकलकर आ सकता है। हाँ, अच्छे सृजन के लिए उपयुक्त समाज बनाने की जिम्मेदारी भी सर्जना करने वाले की ही है। इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना अपनी प्रतिबद्धताओं से विचलित होना है।

अपने आखिरी दिनों में प्रतिबद्ध रचनाकारों के लिए स्थितियों के बेहद दारुण और अपमानजनक होती जाने के लिए वे पथ से विचलित रचनाकारों को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराते थे। उनका कहना था, ‘विचलित रचनाकार समझौते करके ‘सफल’ हुए जा रहे हैं और जिन रचनाकारों ने ऐसे समझौते से परहेज किया है, उनके सामने आज भी कटोरा लेकर घूमने की स्थिति है। अर्थशास्त्र का वह नियम यहाँ भी लागू हो रहा है कि खोटे सिक्के खरे सिक्कों को प्रचलन से बाहर कर देते हैं। सो, खोटों के सिक्के चल रहे हैं।’

लेकिन अपने बुरे हाल में भी आम जनता के प्रति उनकी लहजा कतई शिकायती नहीं हुआ। वे कहते थे कि जनता को तो बेचारगी के हवाले कर उसके हाल पी छोड़ दिया गया है। वह बेहद अपमानजनक स्थितियों में जी रही है। जो लोग भी इस जनता के साथ रहेंगे, उनको तब तक अपमान झेलना पड़ेगा जब तक जनता की मुक्ति नहीं हो जाती। अभी तो जनता की आवाज ही राजसत्ता तक नहीं पहुंच रही और पहुंच भी रही है तो उसकी अनसुनी कर दी जा रही है।’

प्रसंगवश, मध्य प्रदेश सरकार ने 1998 में उनको पहला दुष्यन्त कुमार पुरस्कार दिया तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि उन्हें अच्छा लगा कि इस पुरस्कार की शुरूआत उनके जैसे जनकवि से हुई और वे उम्मीद करते हैं कि आगे चलकर शोषितों के पक्ष में खड़े रचनाकारों के सम्मान की स्वस्थ परम्परा कायम होगी। उन्होंने माना था कि पुरस्कार और कुछ नहीं तो एक तरह का संतोष तो प्रदान करते ही हैं, लेकिन यह कहना भी जरूरी समझा था कि वे पुरस्कारों को ज्यादा अहमियत नहीं देते क्योंकि किसी रचनाकार का असली सम्मान तो उसकी रचनाओं को अपनी जनता द्वारा स्वीकार किया जाना है।
वे सौभाग्यशाली थे कि यह असली सम्मान उनके हिस्से में भी खूब आया। यों, कवि के तौर पर उनका एक ही सपना था। अपनी एक गजल में वे उसे इस प्रकार बता गये हैं: एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें, झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो। वे ताजिन्दगी दुखी रहे कि उन्हें यह रास्ता हमवार होता देखना नसीब नहीं हुआ। उलटे आसम लोगों के लिए स्थिति यह हो गई कि चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें, चूल्हे पे क्या उसूल पकायेंगे शाम को?


अदम गोंडवी की गजलें

घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओं कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है

भटकती है हमारे गांव में गूंगी भिखारन-सी
ये सुब्हे-फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है

बगावत के कंवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में
मैं जब भी देखता हूं आँख बच्चों की पनीली है

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे
मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है

पहले जनाब कोई शिगूफा उछाल दो
फिर कर का बोझ की गर्दन पर डाल दो

रिश्वत को हक समझ के जहां ले रहे हों लोग
है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो

औरत तुम्हारे पांव की जूती की तरह है
जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो

चीनी नहीं है घर में लो मेहमान आ गए
महंगाई की भट्ठी में शराफत उबाल दो


janwani address 7

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