Wednesday, April 22, 2026
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भाजपा ने राष्ट्रवाद को हिंदुत्व में ढाला

Nazariya 22


SATYENDRAचार राज्यों-मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के नतीजे ऊपरी तौर पर यह बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के समर्थन आधार में विस्तार का सिलसिला अभी रुका नहीं है। तेलंगाना में एक हैरतअंगेज उलटफेर में कांग्रेस ने भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को हरा दिया, लेकिन उसका भाजपा की सियासत के लिए कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा। असलियत तो यह है कि वहां भी भाजपा के समर्थन आधार में विस्तार ही हुआ है। तो प्रश्न है कि आखिर यह परिघटना क्यों बेरोक आगे बढ़ रही है? क्या इसे विपक्ष की कुछ बुनियादी नाकामियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? इन नाकामियों में सर्व-प्रमुख तो संभवत: यही है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भाजपा ने देश की राजनीति का संदर्भ बिंदु जिस मूलभूत रूप में बदल दिया है, विपक्ष ने संभवत: अभी तक उसके समझने की शुरुआत भी नहीं की है। वह अभी तक अपनी रणनीतियां इन्कम्बैंसी-एंटी इन्कम्बैंसी और जातीय-सामाजिक समीकरणों के पुराने संदर्भ बिंदुओं पर ही बना रहा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के ताजा चुनाव नतीजों के बाद यह महत्त्वपूर्ण सवाल फिर प्रासंगिक हो गया है कि भाजपा आखिर लगातार जीत क्यों रही है? इस प्रश्न पर चर्चा से पहले ये तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि आज भी भाजपा का मुख्य गढ़ हिंदी भाषी प्रदेश और देश के पश्चिमी राज्य ही हैं। इसलिए उसकी ताकत पर चर्चा के संदर्भ में यहां के सियासी रुझान ही सबसे अहम हैं। मुमकिन है कि इन क्षेत्रों में भी कभी-कभार कुछ स्थानीय समीकरणों और कारणों से भाजपा हार जाती हो। इसके बावजूद तथ्य यही है कि उस हाल में भी उसके अपने ठोस समर्थन आधार में ज्यादा सेंध नहीं लगती। यहां तक कि दक्षिण राज्य कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में भी अन्य समीकरणों के कारण भले भाजपा हार गई, लेकिन अपने वोट आधार (36 प्रतिशत) की रक्षा करने में वह वहां भी सफल रही थी।

तो विपक्ष मोटे तौर पर कहीं भी भाजपा के समर्थन आधार में विस्तार को क्यों नहीं रोक पा रहा है? इसकी एक वजह यह बताई जा सकती है कि भाजपा के पास आज अकूत संसाधन हैं। वह देश के कॉपोर्रेट सेक्टर का प्रमुख सियासी औजार बनी हुई है, जिससे उसे असीमित पैसा और प्रचार तंत्र उपलब्ध हो जाता है। इसके अलावा संवैधानिक एवं वैधानिक संस्थाओं पर उसका पूरा नियंत्रण बन चुका है, जिसका लाभ भी उसे मिलता है। इस रूप में विपक्ष को चुनावी मुकाबले का समान धरातल नहीं मिलता। शुरू से ही यह धरातल भाजपा की तरफ झुका होता है। लेकिन यह आज का एक सच है और विपक्षी पार्टियां इसे स्वीकार करते हुए ही चुनाव मैदान में उतरती हैं। इस तथ्य से वे वाकिफ हैं कि अब भारत में चुनाव भले स्वतंत्र होते हों, लेकिन ये निष्पक्ष नहीं होते। मगर उन्हें इस बात से भी वाकिफ होना चाहिए भाजपा अगर आज सिस्टम को अपने अनुकूल ढाल सकी है, तो पहले उसने ऐसा कर सकने की अपनी स्थिति बनाई। असल सवाल यह है कि आखिर उसकी वो स्थिति कैसे बनी? अगर अंग्रेजी के दो शब्दों से इस सूरत का चित्रण करना चाहें, तो इस रूप में ये सवाल इस तरह पूछा जाएगा कि भारतीय राजनीति में भाजपा वह निर्णायक मोड़ लाने में कैसे सफल हुई, जिससे वह चुनाव जीतने योग्य मतदाताओं और संस्थाओं का ठोस समर्थन तैयार कर पाई? विपक्ष और गैर-भाजपा समूह अगर इस सवाल का सही उत्तर नहीं ढूंढ पाते हैं, तो निकट भविष्य में भाजपा को किसी चुनाव में हराना अगर असंभव नहीं, बेहद मुश्किल जरूर बना रहेगा। भाजपा अपनी हिंदुत्व की विचाराधारा को भारत में प्रमुख राजनीतिक विचार के रूप में स्थापित में सफल हो गई है। इस आधार पर वह अपने पक्ष में मतदाताओं की इतनी ठोस गोलबंदी कर चुकी है कि चुनावों में उसे परास्त करना बेहद कठिन हो गया है। इस गोलबंदी का एक कारण संभवत: यह भी है कि राष्ट्रवाद को हिंदुत्व के नजरिए से परिभाषित करने में भाजपा काफी हद तक सफल हो चुकी है। इससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों के मन-मस्तिष्क में हिंदुत्व की पैठ बन गई है। प्रत्यक्ष लाभ बांटने को उसने विकास नीति का पर्याय बना दिया है। चूंकि उसके हाथ में सत्ता है, इसलिए इस कथित रेवड़ी संस्कृति में उससे होड़ कर पाना विपक्ष के लिए चुनौती भरा हो गया है। ये सब इसलिए हुआ है, क्योंकि इन तमाम बिंदुओं पर भाजपा चुनौती विहीन अवस्था में है। मतलब यह कि उसे इन बिदुंओं पर चुनौती देने वाली कोई ताकत मौजूद नहीं है। ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो ऐसा करने का प्रयास करती दिखे। प्रत्यक्ष लाभ बांटने के वादा में विपक्षी दल भाजपा का मुकाबला करने की कोशिश जरूर करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इस बिंदु पर भी भाजपा ने उनके लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ी है।

जातीय प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं को भाजपा ने अपनी हिंदुत्ववादी राजनीति के बड़े तंबू के अंदर समेट लिया है। इस तरह वह 1990 के दशक में उभरी मंडलवादी राजनीति की काट तैयार कर ली है। आज हकीकत यह है कि उत्तर भारत में ओबीसी मतदाताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा का मतदाता है। दलित और आदिवासी समुदायों में भी उसकी पैठ अब काफी मजबूत हो चुकी है। इस हकीकत के बीच समय के चक्र को पीछे लौट कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। राजनीति में आगे का एजेंडा पेश करने के बजाय अतीत में कभी कारगर रही रणनीति की तरफ लौटना एक तरह का सियासी खोखलापन है। कांग्रेस को इस खोखलेपन की महंगी कीमत चुकानी पड़ी है।


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