
बाबू जी, आपका पर्स गिर गया था। लो आपका ही है, मेरी आंखों के सामने उस रिक्शे वाले को पैसे देते समय गिरा था।
अपने पर्स को पहचान कर लगभग झपटते हुए से बोला-हां मेरा ही तो है। अगले ही क्षण उस फटे हाल जर्जर चिथड़े पहनी दस वर्षीय बच्ची पर उसकी नजर गई, तो आश्चर्य मिश्रित निगाह से उसे देखते हुए पर्स खोला। राशि यथावत थी|
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जो अभी वह बैंक से लोन के रूप में लेकर आया था। अपना शक और उस लड़की पर की जाने वाली आशंका निराधार सिद्ध हुई। अपने भाव बदलते हुए वह शख्स सहसा बोल उठा, बेटी इन रुपयों की तुम्हें ज्यादा जरूरत है। तुमने क्यों लौटाए? अपने पास भी तो रख सकती थी।
कुछ रुपये अपने हाथ में लेकर उसने बालिका की ओर बढ़ाए, लो तुम्हारी ईमानदारी का इनाम समझकर रख लो।
लेकिन उसने इनकार करते हुए कहा-हमें रुपए की नहीं, रोटी की जरूरत है। उस लड़की के जवाब ने उस शख्स के कानों में जैसे तेजाब घोलकर डाल दिया हो।
वह लड़की बोली, रोटी लेकर जाऊंगी तो भाई और मां हाथ से झपट कर खा लेंगे। रुपए लेकर घर गई, तो बाबा मार-मार कर, झपट लेंगे और दारू के ठेके पर ले जाएंगे। मुझे रुपए नहीं चाहिए, रोटी दिला दो, बाबू जी!
विजय जोशी ‘सुतांशु’


