
एक अधीक्षक, प्राय: दरवाजे से सटे बरामदे में टहल रहा था। हल्की रिम-झिम बरसात चल रही थी। एक भिक्षुक पड़ोस में भोजन मांग रहा था। पड़ोसी न जाने किस उलझन में था, उसने दुत्कार दिया। भिक्षुक अनसुनी करता हुआ आगे बढ़ता गया। अधीक्षक ने नौकर को रोटी लेकर भेजा, परन्तु भिक्षुक ने इनकार करते हुए कहा-जो रिश्वत लेते हैं, उनके घर का भोजन मैं नहीं करता। नौकर बड़बड़ाता हुआ लौटा और उसने अधीक्षक से ज्यों का त्यों कह दिया। पहले तो अधीक्षक को क्रोध आया और वह ना जाने क्या-क्या कह गया, परन्तु बाद में उसे अपने पर बहुत ग्लानि आयी। कई दिनों किसी काम में मन न लगाता, रात्रि को नींद न आती। मन रिश्वतवृत्ति को धिक्कारता। उसने रिश्वत-त्याग का संकल्प ले लिया। अधिकारी को रिश्वत न पहुंचने से प्रोन्नति रुक गई। पत्नी और बच्चे भी नाराज होते, परन्तु अन्तरंग में संतोष और प्रसन्नता बढ़ती ही जाती। कर्तव्य-पालन से प्राप्त संतुष्टि से सहनशक्ति भी ऐसी होती गयी कि कोई कुछ भी कहे, कोई असर नहीं और न उत्तेजना। केवल मन्द मुस्कान चेहरे पर खेलती रहती। थोड़े दिनों में सब सहज हो गया। उच्च अधिकारी को समाचार मिले, उसने भी ईमानदारी का गुप्त परीक्षण किया और प्रभावित होकर प्रोन्नति भी की और सार्वजनिक सम्मान भी। एक दिन वही भिक्षुक दरवाजे पर भिक्षा मांगने लगा। अधीक्षक महोदय बोले- तुम तो रिश्वत लेने वाले के यहां भोजन नहीं लेते। भिक्षुक हंसंते हुए बोला-देवता! आप रिश्वत नहीं लेते। आपका अन्नग्रहण कर मैं अपने को धन्य समझूंगा और खूब भगवद्भक्ति कर जीवन सफल करूंगा। अधीक्षक महोदय, विस्मयपूर्वक उसकी ओर देखने लगे और हर्षित होकर, उसे भरपेट भोजन कराया। भिक्षुक भी आशीर्वाद देता हुआ चला गया।


