
दिल्ली में कारों की तादाद बीते 20 सालों से तिगुनी- चौगुनी हो गई हैं। कल्पना की जा सकती है कि अगर मेट्रो न होती, तो क्या होता? तय है कि दुनिया के हर शहर में रेल और मेट्रो का शानदार नेटवर्क होने के बावजूद बसों का उत्तम नेटवर्क होना लाजमी है। बसों की व्यवस्था चरमरानी नहीं चाहिए, वरना मेट्रो का सारा नेटवर्क जाया चला जाएगा। बीसेक साल पहले दिल्ली में जब मेट्रो दौड़ी, तो उम्मीद थी कि दिल्ली की यातायात व्यवस्था सुचारू हो जाएगी, ट्रैफिक जाम के दिन- प्रतिदिन के सिरदर्द से छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन संभावना से उलट हुआ। मेट्रो का जाल भी फैलता गया, और सड़कों पर ट्रैफिक भी घटने की बजाय बराबर बढ़ता गया।