Friday, June 5, 2026
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सस्ती मेडिकल शिक्षा का मोह

 

Samvad 3


Dr. Vishesh Guptaरूस और यूक्रेन के युद्ध के बीच भारत के हजारों छात्र अभी भी यूक्रेन और उसकी आस-पास की सीमाओं के पास फंसे हैं। यूक्रेन के शिक्षा और विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि वहां इस समय 80 हजार विदेशी छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे है। इनमें तकरीबन 20 हजार भारतीय छात्र हैं। निश्चित ही यूक्रेन में भारतीय छात्रों की संख्या वहां सबसे अधिक है। यही वजह है कि आज भारतीय छात्रों की यूक्रेन से सकुशल वापसी एक बड़ा मुद्दा बना है। साथ ही यह भी ज्ञात हुआ है कि भारत ने इस युद्ध के बीच जब से नाटो से अपनी तटस्थता व्यक्त की है, तब से पोलैंड़ और रोमानिया के बॉर्डर पर भारतीय छात्रों के साथ दुर्व्यवहार की खबरे तेजी से प्रसारित हो रही हैं। अभी फिलहाल भारत सरकार को इन छात्रों को पूर्ण सुरक्षित निकालने की चिंता अधिक है।

ज्वलंत मुद्दा यह भी है कि आखिर देश छोड़कर इन छा़त्रों को अपनी मेडिकल की पढ़ाई के लिए रूस, यूक्रेन, कनाड़ा, ब्रिटेन, चीन और तजाकिस्तान क्यों जाना पड़ रहा है? असल बात यह है कि देश में मेडिकल शिक्षा में अवसरों की कमी के कारण छा़त्रों को दूसरे देशों में जानें को मजबूर होना पड़ता है। तथ्य बताते हैं कि आज भारत में 596 मेड़िकल कालेज हैं। इनमें 278 सरकारी मेडिकल कालेज तथा 318 प्राइवेट कॉलेज हैं। दिसंबर 2021 को स्वास्थ्य मंत्रालय के द्वारा संसद में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार देश में एमबीबीएस की कुल 89875 सीटें तथा बीडीएस की कुल 27498 सीटें है। इस तरह सरकारी और प्राइवेट कालेजों को मिलाकर देश में मेडिकल की कुल 1,17,373 सीटें हैं।

वास्तविकता यह है कि इन सीटों के सापेक्ष मेडिकल शिक्षा में प्रवेश हेतु यहां 2021 की नीट परीक्षा में 17 लाख छात्र पंजीकृत हुए। इनमें से मात्र 88 हजार यानि मात्र 5-6 फीसदी छात्रों को ही प्रवेश मिला। बड़ा सवाल यह है कि नीट परीक्षा के कम अंकों वाले छात्र आखिर कहां जाएं। यही वजह है कि उनके लिए प्राइवेट मेडिकल संस्थानों में प्रवेश लेना मजबूरी होता है। एनआरआई तथा मैनेज्मेन्ट कोटे की फीस को मिलाकर भी प्राइवेट मेड़िकल कॉलेजों का कुल खर्च 80 लाख से एक करोड़ तक रहने से छात्र के पास दो ही विकल्प बचते हैं।

पहला या तो वह महंगी पढ़ाई से वंचित हो जाए अथवा उन देशों में पलायन कर जाए जहां मेडिकल की पढ़ाई सस्ती और अच्छी है। यही खास वजह है कि रूस, यूक्रेन, चीन और कनाडा जैसे देश मेड़िकल की पढ़ाई के लिए हॉटस्पाट बन रहे हैं। इन देशों में तकरीबन 40 हजार से भी अधिक बच्चे हर साल मेडिकल शिक्षा लेने के लिए जाते हैं।

यूक्रेन की मेडिकल शिक्षा के ढांचे पर नजर ड़ालने से ज्ञात होता है कि वहां की कुल आबादी पांच करोड़ के आस-पास है तथा मेड़िकल कालेज की संख्या 25 है। अर्थात इस छोटे से देश में पौने दो लाख लोगों पर एक मेडिकल कॉलेज है। दूसरी ओर भारत की कुल आबादी 138 करोड़ है और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 596 है। यानि यहां तकरीबन 26 लाख की आबादी पर एक मेडिकल कॉलेज है। केवल इतना ही नहीं, यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा में प्रवेश के नियम भी काफी लचीले हैं। वहां का कुल खर्च भी दो लाख रुपये सालाना के आधार पर मात्र 15-20 लाख तक ही आता है। दूसरी ओर भारत के प्राइवेट मेडिकल कॉलज में यह खर्च 80 लाख से एक करोड़ तक चला जाता है।

वहां से लौटने वाले छा़त्रों का कहना है कि भारत के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की तुलना में यूक्रेन के मेड़िकल कॉलेजों का अकादमिक ढांचा, शिक्षण और तकनीक और शोध का स्तर उच्च श्रेणी का है। यही वजह है कि वहां पांच साल की मेडिकल की पढ़ाई करने के बाद उनकी डिग्री की स्वीकारोक्ति अन्तर्रराष्ट्रीय स्तर पर होती है। खास बात यह है कि उनकी यह डिग्री डब्ल्यूएचओ और एमसीआई तक से पूर्ण मान्यता प्राप्त होने से इन देशों में कहीं भी मेडिकल व्यवसाय करने में भी सुलभता होती है।

भारत सरकार देर सवेर यूक्रेन में फंसे छात्रों को निकालने में कामयाब हो ही जाएगी। मगर यह समाधान तब तक अधूरा है, जब तक यहां लाए गए छात्रों की आधी-अधूरी पढ़ाई और वहां से पढ़ाई पूर्ण कर चुके छात्रों का ठीक से पुनर्वासन नहीं हो जाता। यूक्रेन से भारत लौटे अधिकांश छात्रों और उनके परिवारजनों से हुए संवाद और साक्षात्कार से पता चला है कि इनमें से अधिकांश छात्र मध्यम वर्गीय आमदनी वाले परिवारों से आते हैं। भारत में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में गलाकाट प्रतिर्स्पधा के चलते उन सभी ने अपने बेटे-बेटी को विदेश से मेडिकल की पढ़ाई का निर्णय लिया।

कड़वा सच यह है कि इस पढ़ाई के लिए मां-बाप ने बैकों से भारी कर्ज लेकर अपने पाल्यों को विदेश भेजा था। अब यह उभरती हुई नई द्वन्द्वात्मक कठिनाई यह है कि एक ओर इन बच्चों की अभी आधी-अधूरी पढ़ाई है तो दूसरी ओर इनके मां-बाप के कंधों पर बैंक का कर्ज है। नियम यह है कि बैंकों का कर्ज तभी चुकाया जाएगा, जब इन छात्रों का पाठ्यक्रम पूरा होकर वे रोजगार से लग जाएं। लगता है इन दोनों ही परिस्थितियों से पूरे परिवार को एक नए मानसिक तनाव से गुजरना पड़ेगा। इसके लिए भारत सरकार को बिना समय गंवाये मेडिकल शिक्षा से जुड़े छात्रों की इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिया जाना अपरिहार्य है।

इस समय जरूरी है कि यूरोप के एकेडमिक क्रेडिट सिस्टम के अनुसार फिलहाल इन छात्रों की छूटी पढ़ाई यूक्रेन के अलावा यूरोप के अन्य देशों में शुरू हो, ताकि इन छात्रों के अभी तक के ग्रेड्स का नुकसान न हो। इसके लिए भारत सरकार को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। दूसरे, कर्ज लिए बैंकों को भी इस मुसीबत में इन प्रवासित छात्रों के पक्ष में खड़े होने की मानवीय आवश्यकता है। तीसरे, जो छात्र विदेश से मेडिकल की पढ़ाई पूर्ण करने के कगार पर हैं, उनको फिलहाल देश में डाक्टर्स व सहायक स्टाफ की कमी से जूझ रहे अस्पतालों में रखा जाना स्वास्थय सेवाओं के हक में होगा।

विदेश से लौटे छात्रों को स्टार्ट अप इंडिया योजना से जोड़कर उन्हें स्वास्थय के क्षेत्र में ही नेतृत्व करने का अवसर प्रदान किया जा सकता है। इसके साथ-साथ आगे से विदेश जाने वाले छात्रों को फर्जीवाड़े से बचाने के लिए सरकार के जरिये यह जानकारी छात्रों को जरुर मिले कि विदेश में मेडिकल शिक्षा के लिए कौन-कौन से संस्थान प्राधिकृत और गुणवत्ता से परिपूर्ण हैं। मेडिकल शिक्षा से जुड़ी समस्या के स्थायी समाधान के लिए लौटकर अपने देश में ही आना होगा, जहां हमारे छात्रों को कम फीस में एक अच्छे ढांचे के साथ गुणवत्ता से परिपूर्ण शिक्षा मिले। इसके लिए शिक्षा के स्वदेशी विकल्प पर ही अधिक जोर देना होगा।

डॉ. विशेष गुप्ता


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