Tuesday, March 24, 2026
- Advertisement -

नागरिकता देने वाला कानून

Samvad 51


AASHISH e1618057478329नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को लेकर पूरे देश में एक बार फिर से चर्चा तेज हो गई है। जनवरी 2020 में राष्ट्रपति की मुहर लगने के साथ यह कानून अस्तित्व में आ गया था। सीएए कानून को लेकर उस वक्त देशभर में खूब विरोध प्रदर्शन हुआ था। विशेषकर पूर्वोत्तर के राज्यों में सीएए का सबसे ज्यादा विरोध देखने को मिला था। पूर्वोत्तर के सात राज्य सीएए कानून से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वहां तोड़फोड़ की कारण करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। चार वर्ष की देरी के बाद यह प्रतीक्षा पूरी होने जा रही है। दरअसल, बीते दिनों कई अवसरों पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया है कि कि लोकसभा चुनाव से पहले सीएए को देश में लागू कर दिया जाएगा। यह कानून मुख्य रूप से गैर मुस्लिम देशों में प्रताड़ित होकर भारत आने वाले नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान करेगा। इस कानून के लागू होने से भारत के तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए उन लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी, जो दिसंबर 2014 तक अपने देशों में किसी न किसी प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आ गए हैं। इन लोगों में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शामिल हैं। दरअसल, ये लोग उन देशों में अल्पसंख्यक हैं। जाने किस त्रास या संकट में उन्हें उन देशों को छोड़ कर आना पड़ा। यहां के नागरिक न होते हुए भी दिक्कतों, मुसीबतों को गले लगाकर यहां जीवन बिताना पड़ रहा है। इसलिए इन सबको नागरिकता देकर यहां यानी भारत में सम्मान दिए जाने के इरादे से यह कानून लाया जा रहा है।

ऐसे में अब प्रश्न उठता है कि यह कानून भलाई के रूप में सामने लाया जा रहा है तो अब तक इसे टाला क्यों जाता रहा? इसका विरोध क्यों किया जा रहा है? या विरोध कर कौन रहा है? दरअसल, पूर्वोत्तर के राज्य इसका विरोध इसलिए कर कर रहे हैं क्योंकि उनका तर्क है कि इन बाहर के लोगों को नागरिकता देने से उनके राज्य में भीड़ बढ़ जाएगी और उनकी परंपराएं, संस्कृति और तमाम रीति-रिवाजों पर बड़ा फर्क पड़ेगा। वे सब बिखर जाएंगे। वहीं सीएए का विरोध मुस्लिम समुदाय भी कर रहा है। वास्तव में, इस कानून में इन तीन देशों से आए मुसलमानों को नागरिकता देने से बाहर रखा गया है। कई आलोचकों का मानना है कि इस कानून से मुसलमानों से भेदभाव हो रहा है और ये भारत में समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है।

विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध यह है कि इसमें खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो समानता के अधिकार की बात करता है। बता दें कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक बड़े वर्ग का कहना है कि अगर नागरिकता संशोधन कानून 2019 को लागू किया जाता है तो पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा। जानकारों की मानें तो इस कानून में किसी भी भारतीय, चाहे वह किसी मजहब का हो, की नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत के मुस्लिमों या किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों की नागरिकता को इस कानून से कोई खतरा नहीं है।

यह कानून उन लोगों पर लागू होगा, जो 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए थे। इसमें प्रवासियों को वह अवधि साबित करनी होगी कि वे इतने समय में भारत में रह चुके हैं। उन्हें यह भी साबित करना होगा कि वे अपने देशों से धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आए हैं। वे लोग उन भाषाओं को बोलते हैं, जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। उन्हें नागरिक कानून 1955 की तीसरी सूची की अनिवार्यताओं को भी पूरा करना होगा। इसके बाद ही प्रवासी आवेदन के पात्र होंगे। लंबे समय से भारत में शरण लेने वालों को इससे बड़ी राहत मिलेगी।

जहां तक विपक्ष के विरोध का सवाल है उसका कहना है कि इस कानून में मुस्लिमों को वंचित क्यों रखा गया? यह समानता के कानून का उपहास उड़ाने की तरह है। सरकार का कहना है कि जिन देशों के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया जा रहा है, वहां मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं, बल्कि बहुसंख्यक हैं। इसलिए उन्हें इस देश में यानी भारत में नागरिकता देने का कोई मतलब नहीं है। वो उनके देश हैं, वे वहां खुशी से रहें। भारत सरकार वंचितों की मदद करना चाहती है, इसलिए इन तीनों देशों के वे गैर मुस्लिम नागरिक जो वर्षों पहले यहां आ गए थे उन्हें सम्मान दिया जा रहा है। इसमें गलत क्या है? लेकिन अब विपक्ष के इस विरोध में ज्यादा दम नहीं रहा। यही वजह है कि जल्द ही इस कानून को लागू करने की कवायद की जा रही है। हो सकता है इसी महीने।

संसद ने दिसंबर 2019 में संबंधित विधेयक को मंजूरी दी थी और बाद में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इसके विरोध में देश के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। सीएए को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। कई राजनीतिक दलों ने भी इसका विरोध किया था। इस वजह से सरकार ने रूल्स फ्रेम करने में देरी की थी पर अब सीएए रूल्स का नोटिफिकेशन होम मिनिस्ट्री ने जारी करने की पूरी तैयारी कर ली है।

सीएए बिल के संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद 4 राज्य इसके विरोध में विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर चुके हैं। सबसे पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने दिसंबर 2019 में सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि यह धर्मनिरपेक्ष नजरिए और देश के ताने-बाने के खिलाफ है। इसमें नागरिकता देने से धर्म के आधार पर भेदभाव होगा। इसके बाद पंजाब और राजस्थान की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। चौथा राज्य पश्चिम बंगाल था, जहां इस बिल के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया। 2019 में संसद द्वारा पारित सीएए का ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी विरोध कर रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था- बंगाल में हम सीएए, एनपीआर और एनआरसी की अनुमति नहीं देंगे।

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने दिसंबर 2021 में राज्यसभा में बताया था कि वर्ष 2018, 2019, 2020 और 2021 के दौरान पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुल 3,117 अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता दी गई। हालांकि आवेदन 8,244 मिले थे। वहीं गृह मंत्रालय की 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-दिसंबर 2021 में कुल 1,414 विदेशियों को भारतीय नागरिकता दी गई। मीडिया से मिल रही जानकारी के अनुसार नियम तैयार हैं और आॅनलाइन पोर्टल भी तैयार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया आॅनलाइन होगी। आवेदकों को वह वर्ष बताना होगा, जब उन्होंने यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश किया था। आवेदकों से कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा।


janwani address 3

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

UP Cabinet Decisions 2026: किसानों को MSP में बढ़ोतरी, गोरखपुर बनेगा सोलर सिटी

जनवाणी ब्यूरो | लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक...

हमारी धार्मिक अवधारणाएं विज्ञान सम्मत

राजेंद्र बज वर्तमान दौर में सारी दुनिया हमारी अपनी गौरवशाली...

गैस को देखने का अपना अपना नजरिया

समस्या गैस की हो, तो प्राथमिक स्तर पर परीक्षण...
spot_imgspot_img