Saturday, April 13, 2024
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ईसाइयों से प्रेम दर्शाना मजबूरी या अवसरवाद

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Nazariya 22


TANVIR ZAFARIईसाई समुदाय से जुड़े क्रिसमस त्योहार ने इस वर्ष कुछ विशेष सुर्खियां बटोरीं। इसकी दो वजह थीं। एक तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईसाई समुदाय को संबोधित करते हुए ईसाई समुदाय के साथ ‘अपना आत्मीयता का रिश्ता’ बताना। दूसरे राष्ट्रीय स्वयं संघ द्वारा क्रिसमस के दिन यानी 25 दिसंबर को कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रिसमस भोज का आयोजन करने की ‘खबर का प्रचारित’ होना। यह पहली बार था जब भाजपा सरकार के केंद्रीय सत्ता में रहते हुए इस तरह के आयोजन की खबरें प्रचारित हो रही थीं। इन्हीं खबरों में अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री जॉन बारला द्वारा मेघालय हाउस में कथित तौर पर क्रिसमस भोज की मेजबानी करने, राष्ट्रीय ईसाई मंच की ओर से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चर्च प्रमुखों को आमंत्रित करने तथा संघ के कई प्रमुख नेताओं के इस आयोजन में शामिल होने की बातें विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुर्इं। इन खबरों पर लोगों की खास तवज्जोह की वजह यह भी थी कि पिछले कुछ महीनों से देश का मणिपुर राज्य ईसाई विरोधी हिंसा से जूझ रहा है। खबरों के अनुसार मणिपुर में ईसाइयों के दर्जनों चर्च भी जला दिए गए हैं। पिछले कुछ समय से देश के और भी कई इलाकों से पादरियों, चर्चों और ईसाइयों के कुछ संस्थानों पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का ईसाई प्रेम दर्शाने और संघ द्वारा क्रिसमस भोज दिए जाने की ‘खबर’ के प्रचारित व प्रकाशित होने पर आम लोगों का नजर रखना भी स्वभाविक ही था।

दरअसल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक व पूर्व सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ गुरूजी ने 1966 में प्रकाशित अपनी एक पुस्तक ‘बंच आॅफ थॉट्स ‘ में ऐसी कई विवादित बातें लिखी हैं, जिनसे शायद संघ अब स्वयं को असहज महसूस कर रहा है और इनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। गौरतलब है कि 1940 से लेकर लगातार 33 वर्षों (अपनी मृत्यु) तक संघ प्रमुख रहे माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ गुरूजी ने अपनी पुस्तक ‘बंच आॅफ थॉट्स ‘ में लिखा है कि ‘उन्हें नाजी जर्मनी से प्रेरणा मिली है’। उन्होंने भारतीय ईसाइयों को ब्लडसकर या खून चूसने वाला बताया और मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को देश के लिए आंतरिक खतरा करार दिया है। इसी पुस्तक के दूसरे भाग में राष्ट्र और उसकी समस्याएं नाम का चैप्टर है। इसमें आंतरिक खतरे नामक शीर्षक के अध्याय में मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट नामक उपशीर्षक हैं, जिनमें विस्तृत तौर पर यह बताया गया है कि किस प्रकार यही तीन समुदाय भारत के लिए खतरा पैदा करते हैं।

परंतु ऐसा लगता है कि 2014 में संघ संरक्षित भारतीय जनता पार्टी की सरकार के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद संघ, भाजपा व इससे जुड़े कई प्रमुख नेता ‘बंच आॅफ थॉट्स’ में प्रकाशित ‘गुरु जी’ के इन विवादित बयानों से अब अपना पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं । उदाहरण के तौर पर केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह से कई वर्ष पूर्व बीबीसी ने जब उनसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक व पूर्व सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के विवादित विचारों के बारे में जानना चाहा जो उन्होंने अपनी पुस्तक ‘बंच आॅफ थॉट्स’ में व्यक्त किए हैं, तो राजनाथ सिंह ने बड़े ही आश्चर्यजनक रूप से गुरुजी के ऐसे किसी ‘विचार’ के प्रति पूरी तरह अपनी अनभिज्ञता जताई। इसी तरह दिसंबर 2015 में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन महासचिव व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव ने अल-जजीरा टेलीविजन चैनल को दर्शकों से भरे हुए एक हॉल में एक इंटरव्यू दिया। इसमें जब राम माधव से पूछा गया कि ‘क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को भारत के लिए आंतरिक खतरा मानते थे? क्या गोलवलकर ईसाइयों को खून चूसने वाला मानते थे?

इस सवाल के जवाब में राम माधव ने भी इस बात का खंडन किया। बावजूद इसके कि इस पुस्तक के अब तक अनेक एडिशन प्रकाशित हो चुके हैं। राम माधव जैसे संघ के रणनीतिकार व पूर्व प्रवक्ता जब साफ तौर पर ‘गुरुजी’ के इन विचारों से पूरी तरह पल्ला झाड़ने लग जाएं, इसका आखिर क्या अर्थ निकाला जाना चाहिए? इसी साक्षात्कार में अलजजीरा पत्रकार ने राम माधव से यह भी पूछा था कि-संघ के पूर्व प्रमुख गोलवलकर को आप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना प्रेरणा स्रोत बताया है। लेकिन गोलवलकर कहते हैं कि उन्हें नाजी जर्मनी से प्रेरणा मिली है, साथ ही उन्होंने भारतीय ईसाइयों को ब्लडसकर या खून चूसने वाला बताया और मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को देश के लिए आंतरिक खतरा करार दिया है? इस पर राम माधव यह कहकर लीपापोती करने लगे कि आपने उन्हें ‘मिसकोट’ किया। जबकि यह पुस्तक दस्तावेजी शक्ल में हर जगह उपलब्ध है।

रहा सवाल बीते दिनों कश्मीर से केरल तक संघ द्वारा क्रिसमस पार्टी के आयोजन से जुड़ी खबरों का, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य द्वारा इस तरह के किसी भी आयोजन को सिरे से खारिज करते हुए कहा गया है कि इस तरह के किसी भी कार्यक्रम की कोई योजना नहीं है और जो आयोजन किए भी जा रहे हैं, उनका संघ से कोई संबंध नहीं है। परंतु प्रधानमंत्री द्वारा क्रिश्चियन प्रेम दर्शाने और संघ क्रिसमस के अवसर पर पार्टी आयोजित करने की सत्य या अर्ध सत्य खबरों के आलोक में यह सवाल उठना तो स्वभाविक है ही कि ‘गुरूजी’ के विवादित विचारों से पीछा छुड़ाने की कोशिश संघ का विचार परिवर्तन है, अवसरवादिता, मजबूरी या महज कयास या अफवाह?


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